रविवार, 22 फ़रवरी 2026

नमस्कारवित्तीय वर्ष का आखरी महीने में आपका स्वागत है। अगले वित्तीय साल के लिए बजेट और प्लान्स बनेंगे। परन्तु उसमे वातावरण को सुरक्षित रखने का कोई प्लानिंग क्या हम कर रहें हैं ?

21 मार्च… कैलेंडर में यह एक साधारण सी तारीख लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह हमारी सांसों, हमारे स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी हुई है। हर वर्ष 21 मार्च को अंतरराष्ट्रीय वन दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 नवंबर 2012 को इस दिन को आधिकारिक मान्यता दी और पहली बार इसे 21 मार्च 2013 को मनाया गया। उद्देश्य साफ था—दुनिया को यह याद दिलाना कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।

हम सब जानते हैं कि हमें जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन क्या हम यह समझते हैं कि हमारी हर सांस सीधे-सीधे पेड़ों और जंगलों से जुड़ी है? पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। यही कार्बन डाइऑक्साइड जब वातावरण में बढ़ जाती है, तो न केवल ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक बन जाती है। दमा, एलर्जी, फेफड़ों की बीमारियाँ—इन सबके पीछे प्रदूषण की बड़ी भूमिका है।

हर साल दुनिया भर में लगभग 1.3 करोड़ हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाते हैं—लगभग इंग्लैंड के आकार के बराबर क्षेत्रफल। सोचिए, कितनी तेजी से हमारी हरियाली खत्म हो रही है! जंगलों के साथ-साथ वहां रहने वाली वनस्पतियाँ और जीव-जंतु भी समाप्त हो रहे हैं। धरती की 80 प्रतिशत जैव विविधता जंगलों पर निर्भर है। जब जंगल कटते हैं, तो केवल पेड़ नहीं गिरते—पूरी पारिस्थितिकी तंत्र हिल जाता है।

जलवायु परिवर्तन की बात करें तो वनों की कटाई दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 12 से 18 प्रतिशत हिस्सा है। यह आंकड़ा वैश्विक परिवहन क्षेत्र से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड के लगभग बराबर है। दूसरी ओर, स्वस्थ जंगल ‘कार्बन सिंक’ की तरह काम करते हैं—वे वातावरण से कार्बन को सोखकर धरती को संतुलित रखते हैं।

आज भी दुनिया की 30 प्रतिशत से अधिक भूमि पर जंगल फैले हुए हैं और इनमें 60,000 से अधिक प्रकार के पेड़ पाए जाते हैं। लगभग 1.6 अरब लोग—खासकर गरीब और आदिवासी समुदाय—अपनी रोजी-रोटी, भोजन, दवा और पानी के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। यानी जंगल केवल पर्यावरण नहीं, अर्थव्यवस्था और समाज के भी आधार हैं।

लेकिन सवाल यह है—हम क्या कर रहे हैं?

अक्सर हम सोचते हैं कि जंगल बचाना सरकार या बड़ी संस्थाओं का काम है। लेकिन बदलाव की शुरुआत घर से होती है। यदि हर परिवार साल में कम से कम एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल करे, तो कुछ ही वर्षों में तस्वीर बदल सकती है। पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे बड़ा करना जिम्मेदारी है। बच्चों को सिखाइए कि पौधे भी जीवित हैं, उन्हें पानी चाहिए, सुरक्षा चाहिए और प्यार चाहिए।

आज के डिजिटल युग में एक और छोटा लेकिन प्रभावी कदम है—कागज की बचत। जितना हो सके डिजिटल माध्यम अपनाइए। ऑनलाइन बिल, ई-पुस्तकें, डिजिटल नोट्स—ये सब न केवल सुविधाजनक हैं बल्कि पेड़ों को कटने से भी बचाते हैं। याद रखिए, हर कागज के पीछे एक पेड़ खड़ा होता है।

हमें यह भी समझना होगा कि विकास के नाम पर अंधाधुंध वनों की कटाई अंततः हमारे ही भविष्य को खतरे में डालती है। यदि किसी व्यावसायिक परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं और उससे पर्यावरण को नुकसान होने की आशंका है, तो हमें आवाज उठानी चाहिए। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और जनजागरूकता हमारे अधिकार भी हैं और कर्तव्य भी।

साफ हवा, संतुलित जलवायु और स्वस्थ जीवन कोई विलासिता नहीं—यह हमारा मूल अधिकार है। और इस अधिकार की रक्षा का सबसे सरल उपाय है—पेड़ों और जंगलों की रक्षा।

अंतरराष्ट्रीय वन दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। जब हम अगली बार गहरी सांस लें, तो एक पल रुककर सोचें—यह सांस हमें किसने दी? जवाब है—प्रकृति ने, पेड़ों ने, जंगलों ने।

तो आइए, इस 21 मार्च को एक संकल्प लें।
एक पौधा लगाएं।
कागज बचाएं।
बच्चों को प्रकृति से जोड़ें।
और जहां जरूरत हो, जंगलों की रक्षा के लिए आवाज उठाएं।

क्योंकि अगर जंगल सुरक्षित हैं, तो हमारी सांसें सुरक्षित हैं। और अगर हमारी सांसें सुरक्षित हैं, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित है।  हरियाली ही असली समृद्धि है। 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026


नमस्कार . पलक झपकने के पहले ही हम इस साल के दूसरे महीने में पहुँच गए हैं। 

फ़रवरी का महीना अपने आप में बड़ा दिलचस्प है। एक तरफ़ 12 फ़रवरी को जन्मे चार्ल्स डार्विन, जिनकी एक लाइन ने पूरी दुनिया की सोच बदल दी— Survival of the fittest। और दूसरी तरफ़ 14 फ़रवरी, यानी Valentine’s Day, जो प्रेम, रिश्तों और भावनाओं का प्रतीक बन चुका है। पहली नज़र में विज्ञान और रोमांस दो अलग-अलग दुनिया लगती हैं, लेकिन अगर गहराई से देखें तो दोनों एक ही बात कह रहे हैं— जो समय के साथ खुद को ढाल लेता है, वही टिकता है।

डार्विन ने बाद में साफ़ किया था कि यह “सबसे ताक़तवर” की नहीं, बल्कि सबसे adaptable की जीत होती है। यही बात रिश्तों पर भी लागू होती है। प्रेम केवल आकर्षण से शुरू हो सकता है, लेकिन टिकता वही है जो बदलती ज़रूरतों, परिस्थितियों और अपेक्षाओं के साथ खुद को अपडेट करता रहता है।

कोविड ने हमें यह सबक बहुत साफ़ तरीके से सिखाया। जिन लोगों, रिश्तों और संस्थाओं ने बदलाव को स्वीकार किया, वही आगे बढ़े। जो अड़ गए—“हम तो ऐसे ही हैं”—वे पीछे छूट गए। आज का प्रेम भी यही सवाल पूछता है— क्या आप अभी भी relevant हैं?

रिश्तों में relevance क्यों ज़रूरी है?

आज की दुनिया तेज़ है। काम के तरीके बदले हैं, संवाद के माध्यम बदले हैं, प्राथमिकताएँ बदली हैं। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति भावनात्मक रूप से वहीं अटका है जहाँ वह दस साल पहले था, तो रिश्ता दम घुटने लगता है। प्रेम में बने रहने के लिए केवल “मैं तुम्हें चाहता हूँ” कहना काफ़ी नहीं, बल्कि यह दिखाना ज़रूरी है कि मैं आज भी तुम्हारी ज़िंदगी में उपयोगी हूँ, समझदार हूँ और साथ चल सकता हूँ।

 आज के समय में relevant रहने के 4  सूत्र

1. सीखते रहिए, उम्र नहीं पूछती
जो सीखना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। नई टेक्नोलॉजी, नए विचार, नई सोच—इनसे डरने के बजाय इन्हें अपनाइए। चाहे डिजिटल पेमेंट हो, ऑनलाइन मीटिंग या मानसिक स्वास्थ्य की समझ—सीखना आपको सिर्फ़ प्रोफेशनल नहीं, बल्कि एक बेहतर साथी भी बनाता है।

2. सुनना सीखिए, सिर्फ़ बोलना नहीं
आज की सबसे बड़ी emotional skill है— active listening। पार्टनर क्या महसूस कर रहा है, किस दौर से गुज़र रहा है, यह समझना बहुत ज़रूरी है। पुराने ज़माने की तरह “मैं सब जानता हूँ” वाला रवैया अब रिश्तों को तोड़ देता है। relevance का मतलब है— सामने वाले की वर्तमान ज़रूरत को समझना।

3. लचीलापन रखिए, जिद नहीं
कोविड ने सिखाया कि प्लान A हमेशा काम नहीं करता। रिश्तों में भी यही सच है। अगर परिस्थितियाँ बदल रही हैं तो रोल्स भी बदलेंगे। कभी आपको ज़्यादा देने वाला बनना होगा, कभी सहारा लेने वाला। जो व्यक्ति हर हाल में rigid रहता है, वह अकेला पड़ जाता है।

4.  खुद को neglect मत कीजिए
जो खुद को emotionally, physically और mentally fit रखता है, वही दूसरों के लिए भी attractive और dependable बनता है। Self-care कोई selfish काम नहीं, बल्कि long-term relationship investment है।

इस Valentine’s Day पर केवल गुलाब और चॉकलेट ही नहीं, यह सवाल भी पूछिए— क्या मैं अपने रिश्ते में आज भी relevant हूँ?

और अगर जवाब पूरी तरह “हाँ” नहीं है, तो घबराइए मत। डार्विन भी यही कहेंगे— बदलाव ही जीवन है।

याद रखिए, प्रेम की दुनिया में वही survives करता है जो समय के साथ evolve करता है।
Strong बनिए, लेकिन उससे भी ज़्यादा adaptable।


 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

 

नया साल, नए संकल्प: इच्छा नहीं, दिशा चुनिए

नमस्कार। २०२६ आपके और अपनों के लिए आनंदमय हो यही दुआ है 
हर नया साल अपने साथ एक उम्मीद लेकर आता है। कैलेंडर बदलते ही हम भी खुद को थोड़ा बेहतर बनाने का सपना देखने लगते हैं।
इसी सपने का नाम है—न्यू ईयर रेज़ोल्यूशन, यानी नया साल का संकल्प। लेकिन सवाल यह है कि संकल्प वास्तव में होता क्या है?
क्या यह सिर्फ़ इच्छा है, या फिर जीवन को दिशा देने का एक सचेत निर्णय?

संकल्प इच्छा से अलग होता है। इच्छा कहती है—“काश ऐसा हो जाए”, जबकि संकल्प कहता है—“मैं इसके लिए कुछ बदलूँगा।”
मेरी समझ में  संकल्प कोई भारी-भरकम प्रतिज्ञा नहीं, बल्कि अपने जीवन के साथ की गई एक ईमानदार बातचीत है।
यह वह छोटा-सा फैसला है जो हमें भीड़ से अलग नहीं, बल्कि खुद के करीब ले जाता है।

अब प्रश्न आता है कि संकल्प चुनें कैसे? एक अच्छा संकल्प कुछ कसौटियों पर खरा उतरता है।
पहली कसौटी—वह आपका होना चाहिए, समाज या सोशल मीडिया का नहीं।
दूसरी—वह स्पष्ट होना चाहिए; “स्वस्थ रहूँगा” से बेहतर है “हर दिन 20 मिनट पैदल चलूँगा।”
तीसरी—वह यथार्थवादी हो। बहुत ऊँची छलांग अक्सर गिरा देती है।
और चौथी—वह आपके जीवन के किसी अर्थपूर्ण हिस्से को बेहतर बनाए, न कि सिर्फ़ आपकी टू-डू लिस्ट बढ़ाए।

फिर भी हम में से अधिकांश लोग फरवरी आते-आते अपने संकल्प भूल क्यों जाते हैं?
इसका कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि समझ की कमी होती है।
हम अक्सर एक साथ बहुत कुछ बदलना चाहते हैं।
हम परिणाम पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन प्रक्रिया से दोस्ती नहीं करते।
कभी-कभी हम दूसरों से तुलना करने लगते हैं, और कभी एक छोटी चूक को पूरी हार मान लेते हैं।
सबसे बड़ा कारण यह है कि हम खुद से बहुत कठोर भाषा में बात करते हैं—“मैं कभी नहीं कर पाऊँगा।”

तो फिर संकल्प पर टिके कैसे रहें? इसका उत्तर भी सरल है, लेकिन गहरा।
पहला—संकल्प को आदत में बदलने की कोशिश करें, बोझ में नहीं।
दूसरा—प्रगति को मापें, पर खुद को जज न करें।
तीसरा—अपने संकल्प को किसी अपने के साथ साझा करें, ताकि जवाबदेही बने।
और चौथा—हर सप्ताह खुद से पूछें: “क्या यह संकल्प अभी भी मेरे लिए मायने रखता है?”
जरूरत पड़े तो उसमें सुधार करना असफलता नहीं, समझदारी है।

याद रखिए, संकल्प का उद्देश्य परफेक्ट बनना नहीं, बल्कि थोड़ा बेहतर बनना है।
नया साल कोई जादुई बटन नहीं है, लेकिन यह एक अच्छा रिमाइंडर ज़रूर है कि जीवन को ऑटो-पायलट पर नहीं छोड़ना चाहिए।
अगर इस साल आप सिर्फ़ एक ही संकल्प लें—खुद के प्रति थोड़ा अधिक सजग, थोड़ा अधिक दयालु बनने का—तो शायद वही सबसे बड़ा संकल्प होगा।

नया साल मुबारक हो।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

नमस्कार। २०२५ के आखिरी महीनें में आप सब का स्वागत है। दिसंबर के महीने में हम आने वाले साल में और सफल होने का प्रयास करते हैं। उम्मीद है आप भी इस प्रस्तुति में लगे होंगे। मैंने सोचा की आने वाले समय को ख्याल में रखते हुए आप से आपकी तैयारी के विषय में कुछ बातचीत करूँ। 

आगे का समय काफी जटिल होगा। विश्व राजनीति ,बिज़नेस का हाल , ए आई का प्रभाव और बदलता हुआ काम का वातावरण एक ही दिशा में हमारा पथ दिखा रहा है। फुर्तिला होना अभी जरूरी नहीं ,मजबूरी है ,इस दुनिया में आगे बढ़ने के लिए। फुर्तिला बनने के लिए सबसे अच्छी प्रेरणा चीता से मिलता है। 

जब हम गति, चपलता और लक्ष्य पर केंद्रित रहने की बात करते हैं, तो प्रकृति में चीते से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई हो। चीता केवल तेज़ नहीं होता—वह रणनीतिक, संतुलित, अनुशासित और अत्यंत जागरूक होता है। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में करियर और प्रगति के लिए जो गुण आवश्यक हैं, वे सब हमें इस अद्भुत प्राणी से सीखने को मिलते हैं। हमारा प्रयास रहा है कि प्रकृति के सिद्धांतों को समझकर उन्हें जीवन और पेशे में लागू करना। आइए देखें कि चीता हमें कौन-से जीवन-परिवर्तनकारी सबक देता है।


1. लक्ष्य पर अटल फोकस 

चीते की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी गति नहीं, बल्कि उसका फोकस है। जब वह शिकार चुनता है, तो उसकी निगाह सिर्फ एक लक्ष्य पर टिक जाती है। इसी तरह, करियर में सफलता का पहला मंत्र है—स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण
बहुत से लोग एक साथ कई दिशाओं में दौड़ने की कोशिश करते हैं, और परिणामस्वरूप कहीं भी पूर्णता नहीं पाते। चीता हमें सिखाता है कि एक समय में एक लक्ष्य पर पूरी ऊर्जा लगाओ।
अपने करियर में भी, यह तय करें कि आपका प्राथमिक लक्ष्य क्या है—कौशल विकास, प्रमोशन, करियर बदलना या व्यवसाय शुरू करना—और फिर उसी दिशा में लगातार आगे बढ़ें।


2. चपलता : बदलती परिस्थितियों में तुरंत ढलने की क्षमता

चीता केवल तेज़ नहीं दौड़ता, बल्कि ज़बरदस्त मोड़ भी ले सकता है। यह चपलता उसकी सफलता का आधार है।
आज की प्रोफेशनल दुनिया में भी agility यानी परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना बेहद ज़रूरी है।
नई टेक्नोलॉजी, नए काम करने के तरीके, बदलती बाज़ार मांग—इन सबके साथ तालमेल बैठाना वही कर पाता है जो चीते की तरह लचीला हो।
अगर पुरानी सोच में अटक गए, तो तेज़ी से बदल रही दुनिया आपको पीछे छोड़ देगी।


3. प्रतिस्पर्धा को स्वीकार करना 

चीता जंगल में अकेला शिकारी होता है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि हर शिकार ज़रूरी है, और हर प्रयास में पूरी ताकत लगानी होगी।
हम भी करियर में प्रतिस्पर्धा से बच नहीं सकते। लेकिन सीख यह है—प्रतिस्पर्धा से डरना नहीं, बल्कि उसे प्रेरणा का स्रोत बनाना है।
जिस तरह चीता दूसरों से नहीं, बल्कि अपने पिछले प्रयास से बेहतर होने की कोशिश करता है, हम भी खुद से मुकाबला करें।
सीखें, अभ्यास करें, सुधारें—और अपनी ही गति को हर बार थोड़ा बेहतर बनाएं।


4. फिटनेस और तैयारी 

चीता अपने शिकार से पहले अपनी ऊर्जा बचाकर रखता है। उसका शरीर, सांसों का नियंत्रण और मांसपेशियों की ताकत—सब संतुलित और तैयार रहती हैं।
हमारे लिए यह संदेश है कि उच्च प्रदर्शन के लिए शरीर और मन दोनों का फिट होना अनिवार्य है।
नियमित व्यायाम, अच्छे भोजन की आदत, पर्याप्त नींद और मानसिक शांति—ये करियर का बुनियादी आधार हैं।
थका, तनावग्रस्त या अस्वस्थ व्यक्ति चाहे कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, लंबे समय तक सफल नहीं रह सकता।


5. सही समय की पहचान 

चीता पूरे दिन नहीं दौड़ता। वह अवसर का इंतज़ार करता है—सही दूरी, सही पथ और सही क्षण।
करियर में भी, सही समय पहचानना महत्वपूर्ण है—कब नौकरी बदलनी है, कब नेतृत्व की भूमिका लेनी है, कब बोलना है और कब शांत रहना है।
सही निर्णय का सही समय आपके विकास को कई गुना तेज़ कर देता है।


6. छोटी दौड़, बड़ी जीत 

चीता लंबे समय तक लगातार नहीं दौड़ सकता। वह छोटी, लेकिन अत्यधिक प्रभावी दौड़ें लगाता है।
हम भी हर दिन 12 घंटे अधिकतम उत्पादक नहीं रह सकते।
इसलिए अपने काम को high-performance sprints में बांटें—
30–50 मिनट का फोकस्ड काम → छोटा ब्रेक → फिर नई ऊर्जा से अगला चरण।
यह तरीका आपकी कार्यक्षमता को चीते की गति जैसा बना देगा—तीव्र, सटीक और प्रभावी।


7. असफलता से तुरंत सीखना

शिकार हमेशा सफल नहीं होता। लेकिन चीता निराश नहीं होता; वह अपनी रणनीति बदलकर फिर से प्रयास करता है।
करियर में भी असफलता अंत नहीं—सुधार का अवसर है।
गलतियों का विश्लेषण करें, सीखें और दोबारा प्रयास करें।


 चीते जैसा बनें

  • लक्ष्य एक, फोकस अटल।

  • सोच में चपलता, हर बदलाव के लिए तैयार।

  • प्रतिस्पर्धा से दोस्ती, डर नहीं।

  • शरीर और मन की मजबूती सर्वोपरि।

  • सही समय पर सही कदम।

  • छोटी लेकिन शक्तिशाली कोशिशें।

  • हर असफलता को अगली सफलता की रणनीति बनाना।

जीवन और करियर की दौड़ में सबसे तेज़ वही है जो स्पष्ट सोच, संतुलित ऊर्जा और सटीक निर्णय लेकर आगे बढ़ता है। चीता हमें यही मंत्र देता है—तेज़ नहीं, सही दिशा वाली तेज़ी मायने रखती है। 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

नमस्कार। २०२५ के समाप्ति की ओर हम बढ़ रहें हैं। त्योहारों का समय समाप्त हो चुका है और हम सर्दी के मौसम का 
आनंद लेने के लिए तैयार हो रहे हैं। इसी महीने हमारे देश के प्रथम प्रधान मंत्री के जन्म दिवस को बाल दिवस के रूप में 
मनाते  हैं। चूँकि यह दिवस एक लीडर के जन्मदिन पर है और बच्चों के लिए है , इसलिए मैं यह प्रश्न आपके पास कर रहा
हूँ कि क्या आपके बच्चे में नेतृत्व के गुण हैं?

हर माता-पिता अपने बच्चे को सफल देखना चाहते हैं। कोई चाहता है कि वह डॉक्टर बने, कोई इंजीनियर, कोई कलाकार। 
लेकिन आज के समय में सिर्फ़ अकादमिक सफलता ही नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता (Leadership Qualities) भी बच्चों के 
विकास का अहम हिस्सा बन गई है। सवाल है—क्या आपके बच्चे में नेतृत्व के गुण हैं? और अगर हैं, तो आप उन्हें कैसे 
निखार सकते हैं?

आप कैसे आपके  बच्चे में नेतृत्व के संकेत पहचान सकते हैं ? 
नेतृत्व किसी किताब से नहीं सिखाया जा सकता, यह एक स्वभाविक प्रवृत्ति के रूप में बचपन से दिखाई देने लगता है। 
कुछ संकेत बताते हैं कि आपका बच्चा नेतृत्व के रास्ते पर चल सकता है:

जिम्मेदारी उठाने की प्रवृत्ति:अगर आपका बच्चा खेल के मैदान में या स्कूल प्रोजेक्ट में अपने साथियों को व्यवस्थित करने 
की कोशिश करता है, सबको जोड़ता है, या निर्णय लेने में आगे रहता है—यह एक बड़ा संकेत है। ऐसे बच्चे दूसरों के 
भरोसे को समझते हैं और जिम्मेदारी निभाने में संतुष्टि महसूस करते हैं।

सहानुभूति और सुनने की कला:नेता आदेश देने वाला नहीं, समझने वाला होता है। जो बच्चा अपने दोस्तों की भावनाओं को 
समझता है, विवादों को सुलझाने की कोशिश करता है, और सबकी बात ध्यान से सुनता है—वह भविष्य में टीम बनाने और 
उसे संभालने की क्षमता रखता है।

सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास:कठिन परिस्थितियों में बच्चे का व्यवहार बहुत कुछ बताता है। अगर आपका बच्चा हार 
के बाद भी सीखने की बात करता है, समस्याओं का समाधान ढूंढने की कोशिश करता है, तो यह “growth mindset” 
का संकेत है—जो हर सफल नेता की नींव होती है।

स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता: नेतृत्व वहीं से शुरू होता है, जब बच्चा खुद सोचता है और अपने फैसलों के परिणामों को 
स्वीकार करता है। ऐसे बच्चों को “क्या करना है” बताने के बजाय “क्यों करना है” पूछना ज़रूरी होता है।

नेतृत्व के बीज तो बच्चे में पहले से होते हैं, लेकिन उन्हें पोषित करने का काम परिवार करता है। इस संदर्भ में माता-पिता
क्या कर सकते हैं? 

स्वतंत्रता दीजिए, नियंत्रण नहीं:  हर छोटी बात में दखल देने के बजाय बच्चे को निर्णय लेने का अवसर दें। उदाहरण के लिए,
उसे अपने कपड़े या प्रोजेक्ट की दिशा खुद तय करने दीजिए। गलतियाँ होंगी, पर यही अनुभव उसकी सोच को परिपक्व 
बनाएगा।
संवाद का माहौल बनाइए: लीडर बनने के लिए संवाद कौशल बेहद ज़रूरी है। परिवार में “बात करने” और “सुने जाने” की
संस्कृति बनाइए। जब बच्चा महसूस करता है कि उसकी राय की अहमियत है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।

सहानुभूति और सहयोग सिखाइए: बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि नेतृत्व का मतलब दूसरों पर हुकूमत नहीं, बल्कि 
उन्हें आगे बढ़ाने की क्षमता है। सामाजिक कार्यों, समूह गतिविधियों, या छोटे-छोटे घर के ज़िम्मेदारी भरे कामों में उसे
शामिल कीजिए।

प्रेरणा, दबाव नहीं:  हर बच्चा नेता नहीं बनेगा, लेकिन हर बच्चे में नेतृत्व की संभावनाएँ होती हैं। उसकी तुलना दूसरों से 
करने के बजाय उसकी ताकतों को पहचानिए और उसे प्रेरित कीजिए कि वह अपनी मौलिकता में चमके।

 
नेतृत्व का मतलब सिर्फ़ पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि आत्म-प्रेरणा, संवेदनशीलता और दूसरों को साथ लेकर चलने की क्षमता है। अगर हम माता-पिता अपने बच्चों को सुनना, समझना और भरोसा करना सीख जाएँ—तो नेतृत्व के बीज स्वाभाविक रूप से अंकुरित हो जाते हैं।  

अगली बार जब आप अपने बच्चे को देखें, तो सिर्फ़ यह न सोचें कि वह कितना “स्मार्ट” है, बल्कि यह भी देखें कि वह
 दूसरों को कितना “स्मार्ट महसूस कराता” है। यही असली नेतृत्व की शुरुआत है।   

 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025


नमस्कार! साल दर साल, 10 अक्टूबर को हम विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाते हैं। यह सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण मौका है जब हम अपने शरीर के सबसे महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखे हिस्से—मन—पर ध्यान दें। यह मन ही है जो हमारे हर निर्णय, हर रिश्ते और जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। अगर मन स्वस्थ है, तो जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियाँ भी छोटी लगने लगती हैं। आज हम मानसिक स्वास्थ्य के दो सबसे मजबूत स्तम्भों पर बात करेंगे: विपरीत हालातों में भी धैर्य बनाए रखना, और सामाजिक अपेक्षाओं के जाल से निकलकर खुद के लिए जीना

जब राहों पर रोड़े पड़ें: हार नहीं माननी ज़िंदगी किसी सीधी सड़क जैसी नहीं होती; यह उतार-चढ़ाव, तूफ़ान और शांत किनारों का एक मिश्रण है। जब परिस्थितियाँ हमारे प्रतिकूल हो जाती हैं—नौकरी में असफलता, रिश्ते में तनाव, या कोई अप्रत्याशित संकट—तो हमारा मन सबसे पहले आत्मसमर्पण की मुद्रा में आता है। यही वह क्षण होता है जब हम 'प्लॉट खोने' (Losing the plot) के सबसे करीब होते हैं।

मानसिक मजबूती का मतलब यह नहीं है कि आपको कभी दुख या निराशा महसूस नहीं होगी। इसका अर्थ है कि दुख के क्षणों में भी आप अपनी 'इच्छाशक्ति' को ज़िंदा रखते हैं। कल्पना कीजिए कि आप तूफ़ान में फंसी एक नाव के कप्तान हैं। आप लहरों को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी नाव की पतवार को तो संभाल सकते हैं। मुश्किल हालात से निकलने का यही मंत्र है। बड़ी समस्या को देखकर घबराइए मत, बल्कि उसे छोटे, प्रबंधनीय भागों में बाँटिए।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि असफलता कोई गंतव्य नहीं, बल्कि एक प्रतिक्रिया है। अपनी प्रतिक्रियाओं पर काम करें, घटनाओं पर नहीं। अपनी आशा और विश्वास को अपना सबसे बड़ा कवच बनाइए। जब सब कुछ बिखर रहा हो, तब भी एक चीज़ याद रखिए: यह समय भी गुज़र जाएगा। आपका धैर्य ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है।


किसी और के लिए नहीं: अपना 'असली मैं' जिएँ मानसिक स्वास्थ्य का दूसरा मूल मंत्र है 'स्वयं की प्रामाणिकता'। हम अक्सर समाज, परिवार या दोस्तों की अपेक्षाओं का एक भारी बोझ अपने कंधों पर लेकर चलते हैं। हम दूसरों को खुश करने, उनकी तारीफ पाने या उनके द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए अपनी असली पहचान पर एक मुखौटा ओढ़ लेते हैं।

जब हम लगातार दूसरों की लिखी कहानी के अनुसार जीने की कोशिश करते हैं, तो हम भीतर ही भीतर खालीपन महसूस करने लगते हैं। यह एक ऐसी मानसिक थकान है, जो हमें अवसाद (Depression) और चिंता (Anxiety) की ओर धकेलती है। मानसिक शांति तभी मिलती है जब हमारे विचार, शब्द और कर्म एक-दूसरे के साथ तालमेल में हों।

यह समझना आवश्यक है कि 'खुद की देखभाल' (Self-care) स्वार्थ नहीं, बल्कि एक अनिवार्य ज़िम्मेदारी है। आप तब तक किसी और की मदद या ख़ुशी में योगदान नहीं दे सकते, जब तक आप खुद अंदर से मज़बूत और संतुष्ट न हों। अपनी पसंद, नापसंद और अपनी मूल्य-प्रणाली के प्रति सच्चे रहें। अगर आपको किसी काम के लिए 'ना' कहना है, तो बिना अपराधबोध (Guilt) के कहें। जब आप 'असली मैं' (The Real Me) बनकर जीते हैं, तो आपकी ऊर्जा बचती है और आपका मन स्वतंत्र महसूस करता है। इस स्वतंत्रता से ही आत्म-प्रेम और आत्म-सम्मान जन्म लेता है।

खुद से करें यह वादा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर, हम सभी को अपने मन को सर्वोपरि रखने का संकल्प लेना चाहिए। याद रखें, आपका मन एक कीमती खजाना है। विपरीत हवाओं में भी अपनी पतवार थामे रखें, और सबसे महत्वपूर्ण—दूसरों की अपेक्षाओं को दरकिनार करते हुए, अपनी शर्तों पर जीवन जिएँ। अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। और अगर आपको ऐसा महसूस हो कि आपको विशेषज्ञ का सहायता जरूरत हो उनसे जरूर संपर्क करें और उनके दिए हुए सलाह का पालन करें। इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है। क्योंकि यह आपके ज़िन्दगी का प्रश्न है। हमेशा याद रखियेगा -स्वस्थ मन, स्वस्थ जीवन!

 

शनिवार, 6 सितंबर 2025

#unfiltered -यह है मेरी नई सीख। नमस्कार। सितम्बर के महीने में आपका स्वागत। त्योहारों  का समय आ रहा है और नई फिल्मों का भी। ऐसे एक हिंदी फिल्म में एक छोटी बहन ने अपनी बड़ी बहन को यह सलाह दी। मुझे लगा कि उस बच्ची ने एक महत्वपूर्ण सीख दी है। 

हमने बहुत इंसान को अपने लिए नहीं ,दूसरों के लिए जीते देखा है। जिसके कारन ये इंसान अपनी भावनाओं को  फ़िल्टर लगाकर व्यक्त करते हैं। औरों की ख़ुशी इनके लिए अपनी ख़ुशी से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इसी वजह से अपने मन की बात और इच्छा को दबा देते हैं। 

आपने कई फिल्मों में देखा होगा कि हीरोइन चाहती किसी को है परन्तु शादी अपने घर वालों को खुश करने के लिए किसी और से शादी करती है। फिर क्या। लाखों कोशिश के बावजूद ना खुद खुश हो पाती और ना ही दूसरों को उतना खुश कर सकती है जितना कि चाहती है। 

हर इंसान का एक मौलिक अधिकार होता है अपने अधिकारों का रक्षा करना और रक्षा करने के दौरान जहाँ जरूरत पड़े 'ना' बोलने का अधिकार को प्रयोग करना जरूरी है। जो लोग 'ना ' नहीं बोल सकते हैं ,जब जरूरत है , यह भूल जाते हैं कि अगर वह खुद खुश नहीं रहेंगे , वह दूसरों को खुश नहीं कर पाएंगे। आखिर उसी कारन उन्होंने 'हाँ ' बोला था जब उनको 'ना ' बोलना था। 

जरूरत पड़ने पर ना बोलना कोई गलती नहीं है। ना सुनने वाले को ना सुनते वक़्त बुरा लग सकता है। परन्तु ना बोलने वाले का अपने दिल और दिमाग से बोझ कम हो जाता है क्योंकि वह अपनी दिल की बात को सुन कर दिमाग से काम ले रहा है। यही ज़िन्दगी से अधिक आनंद पाने के लिए अति आवश्यक है। 

फिल्म के अंत में यह छोटी बच्ची अपनी बड़ी बहन को अपनी दिल की बात को सुन कर निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित और मदत करती है जिसका मूल सन्देश है -यह ज़िन्दगी नहीं मिलेगी दुबारा -जो कि आज के युवा पीढ़ी का बोलने का तरीका है -YOLO -You Only Live Once !

हमें कितनी नई लिंगो सीखनी पड़ेगी। शायद त्योहार के समय और कुछ नया सीख सकूँ। आप सब को त्यौहार के लिए अग्रिम शुभेच्छा। खुश रहिये।