नमस्कार। वित्तीय वर्ष का आखरी महीने में आपका स्वागत है। अगले वित्तीय साल के लिए बजेट और प्लान्स बनेंगे। परन्तु उसमे वातावरण को सुरक्षित रखने का कोई प्लानिंग क्या हम कर रहें हैं ?
21 मार्च… कैलेंडर में यह एक साधारण सी तारीख लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह हमारी सांसों, हमारे स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी हुई है। हर वर्ष 21 मार्च को अंतरराष्ट्रीय वन दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 नवंबर 2012 को इस दिन को आधिकारिक मान्यता दी और पहली बार इसे 21 मार्च 2013 को मनाया गया। उद्देश्य साफ था—दुनिया को यह याद दिलाना कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।
हम सब जानते हैं कि हमें जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन क्या हम यह समझते हैं कि हमारी हर सांस सीधे-सीधे पेड़ों और जंगलों से जुड़ी है? पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। यही कार्बन डाइऑक्साइड जब वातावरण में बढ़ जाती है, तो न केवल ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक बन जाती है। दमा, एलर्जी, फेफड़ों की बीमारियाँ—इन सबके पीछे प्रदूषण की बड़ी भूमिका है।
हर साल दुनिया भर में लगभग 1.3 करोड़ हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाते हैं—लगभग इंग्लैंड के आकार के बराबर क्षेत्रफल। सोचिए, कितनी तेजी से हमारी हरियाली खत्म हो रही है! जंगलों के साथ-साथ वहां रहने वाली वनस्पतियाँ और जीव-जंतु भी समाप्त हो रहे हैं। धरती की 80 प्रतिशत जैव विविधता जंगलों पर निर्भर है। जब जंगल कटते हैं, तो केवल पेड़ नहीं गिरते—पूरी पारिस्थितिकी तंत्र हिल जाता है।
जलवायु परिवर्तन की बात करें तो वनों की कटाई दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 12 से 18 प्रतिशत हिस्सा है। यह आंकड़ा वैश्विक परिवहन क्षेत्र से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड के लगभग बराबर है। दूसरी ओर, स्वस्थ जंगल ‘कार्बन सिंक’ की तरह काम करते हैं—वे वातावरण से कार्बन को सोखकर धरती को संतुलित रखते हैं।
आज भी दुनिया की 30 प्रतिशत से अधिक भूमि पर जंगल फैले हुए हैं और इनमें 60,000 से अधिक प्रकार के पेड़ पाए जाते हैं। लगभग 1.6 अरब लोग—खासकर गरीब और आदिवासी समुदाय—अपनी रोजी-रोटी, भोजन, दवा और पानी के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। यानी जंगल केवल पर्यावरण नहीं, अर्थव्यवस्था और समाज के भी आधार हैं।
लेकिन सवाल यह है—हम क्या कर रहे हैं?
अक्सर हम सोचते हैं कि जंगल बचाना सरकार या बड़ी संस्थाओं का काम है। लेकिन बदलाव की शुरुआत घर से होती है। यदि हर परिवार साल में कम से कम एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल करे, तो कुछ ही वर्षों में तस्वीर बदल सकती है। पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे बड़ा करना जिम्मेदारी है। बच्चों को सिखाइए कि पौधे भी जीवित हैं, उन्हें पानी चाहिए, सुरक्षा चाहिए और प्यार चाहिए।
आज के डिजिटल युग में एक और छोटा लेकिन प्रभावी कदम है—कागज की बचत। जितना हो सके डिजिटल माध्यम अपनाइए। ऑनलाइन बिल, ई-पुस्तकें, डिजिटल नोट्स—ये सब न केवल सुविधाजनक हैं बल्कि पेड़ों को कटने से भी बचाते हैं। याद रखिए, हर कागज के पीछे एक पेड़ खड़ा होता है।
हमें यह भी समझना होगा कि विकास के नाम पर अंधाधुंध वनों की कटाई अंततः हमारे ही भविष्य को खतरे में डालती है। यदि किसी व्यावसायिक परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं और उससे पर्यावरण को नुकसान होने की आशंका है, तो हमें आवाज उठानी चाहिए। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और जनजागरूकता हमारे अधिकार भी हैं और कर्तव्य भी।
साफ हवा, संतुलित जलवायु और स्वस्थ जीवन कोई विलासिता नहीं—यह हमारा मूल अधिकार है। और इस अधिकार की रक्षा का सबसे सरल उपाय है—पेड़ों और जंगलों की रक्षा।
अंतरराष्ट्रीय वन दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। जब हम अगली बार गहरी सांस लें, तो एक पल रुककर सोचें—यह सांस हमें किसने दी? जवाब है—प्रकृति ने, पेड़ों ने, जंगलों ने।
तो आइए, इस 21 मार्च को एक संकल्प लें।
एक पौधा लगाएं।
कागज बचाएं।
बच्चों को प्रकृति से जोड़ें।
और जहां जरूरत हो, जंगलों की रक्षा के लिए आवाज उठाएं।
क्योंकि अगर जंगल सुरक्षित हैं, तो हमारी सांसें सुरक्षित हैं। और अगर हमारी सांसें सुरक्षित हैं, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित है। हरियाली ही असली समृद्धि है।