गुरुवार, 4 जून 2026

नमस्कार। जून के महीनें में आप का स्वागत। इस महीने में ग्लोबल पेरेंट्स डे मनाया जाता है। आज का निवेदन पेरेंट्स और उनके बच्चों के साथ उनके रिश्तों के विषय में है। 

माता-पिता और बच्चों का रिश्ता दुनिया का सबसे स्वाभाविक और सबसे जटिल रिश्ता भी है। इसमें प्रेम है, अपेक्षाएं हैं, सुरक्षा है, स्वतंत्रता की चाह है और कभी-कभी टकराव भी। बदलते समय में इस रिश्ते के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे को अपनी-अपनी दृष्टि से समझने की कोशिश करती हैं, जबकि आवश्यकता एक-दूसरे की दुनिया को समझने की है। शायद इसी कारण आज माता-पिता और बच्चों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है—एक-दूसरे को पर्याप्त ‘स्पेस’ देना।

आज के माता-पिता के लिए सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि वे अपने बच्चों के विकास और व्यवहार को उस कसौटी पर न परखें, जिस पर कभी वे स्वयं परखे गए थे। अक्सर घरों में सुनाई देने वाले वाक्य—“हम तुम्हारी उम्र में ऐसे नहीं थे”, “हमने कभी ऐसा नहीं किया”, “हम अपने माता-पिता से इस तरह बात नहीं करते थे”—अब बहुत प्रभावी नहीं रह गए हैं। इसका कारण यह नहीं कि आज की पीढ़ी गलत है, बल्कि यह है कि दुनिया पहले जैसी नहीं रही।

वास्तव में, जितनी तेजी से दुनिया पिछले दस-पंद्रह वर्षों में बदली है, उतनी शायद कई दशकों में भी नहीं बदली थी। जानकारी का पूरा संसार आज बच्चों की उंगलियों पर उपलब्ध है। किसी भी विषय पर उत्तर, सलाह और समाधान कुछ ही सेकंड में मिल जाते हैं। ऐसे माहौल में बच्चों के भीतर यह भावना विकसित होना स्वाभाविक है कि वे बहुत कुछ जानते हैं। इसलिए माता-पिता को यह समझना होगा कि आज का बचपन और युवावस्था उनके अनुभवों से भिन्न है। तुलना के बजाय संवाद अधिक उपयोगी होगा।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जानकारी और ज्ञान में अंतर होता है। इंटरनेट सूचना दे सकता है, लेकिन जीवन का अनुभव नहीं दे सकता। बच्चों को यह समझना होगा कि उनका व्यक्तित्व, उनकी सोचने-समझने की क्षमता और उनकी संज्ञानात्मक शक्ति उसी परिवार और उसी डीएनए की देन है, जिसका हिस्सा उनके माता-पिता हैं। यह मान लेना कि पुरानी पीढ़ी केवल पुरानी है, इसलिए अप्रासंगिक है, एक गंभीर भूल होगी।

माता-पिता के पास वर्षों के अनुभवों का वह खजाना होता है, जो किसी सर्च इंजन पर उपलब्ध नहीं है। असफलताओं से सीखना, रिश्तों को निभाना, कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना और जीवन के उतार-चढ़ाव को संतुलित करना—ये ऐसी शिक्षाएं हैं जो केवल अनुभव से प्राप्त होती हैं। इसलिए बच्चों को अपने माता-पिता की सलाह को केवल ‘पुरानी सोच’ कहकर खारिज करने के बजाय उसे सुनने और समझने का प्रयास करना चाहिए।

दूसरी ओर, माता-पिता को भी यह स्वीकार करना होगा कि हर सलाह आदेश नहीं हो सकती। आज के बच्चे अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, अपने निर्णय स्वयं लेना चाहते हैं और अपने जीवन की दिशा चुनने का अधिकार चाहते हैं। उन्हें मार्गदर्शन चाहिए, नियंत्रण नहीं। जब सलाह संवाद में बदलती है, तभी उसका प्रभाव भी बढ़ता है।

हर परिवार में मतभेद होना स्वाभाविक है। करियर, जीवनशैली, मित्रता, तकनीक या सामाजिक दृष्टिकोण—कई मुद्दों पर विचार अलग हो सकते हैं। समस्या मतभेदों में नहीं, बल्कि उन्हें लेकर अपनाए गए कठोर रुख में होती है। यदि माता-पिता केवल अपने अनुभवों को अंतिम सत्य मान लें और बच्चे केवल अपनी जानकारी को, तो संवाद के दरवाजे बंद हो जाते हैं। रिश्ते तब मजबूत होते हैं जब दोनों पक्ष सुनने का धैर्य रखते हैं।

अधिकांश माता-पिता की मूल अपेक्षाएं बहुत सरल होती हैं—सम्मान, पारिवारिक मूल्यों का आदर और नैतिकता के प्रति प्रतिबद्धता। वहीं बच्चों की अपेक्षा होती है कि उन पर विश्वास किया जाए और उन्हें अपनी पहचान विकसित करने की स्वतंत्रता मिले। यदि दोनों पक्ष इन अपेक्षाओं को समझ लें, तो टकराव की जगह सहयोग ले सकता है।

ग्लोबल डे ऑफ पेरेंट्स हमें यही याद दिलाता है कि परिवार कोई ऐसी संस्था नहीं है जहां एक पक्ष हमेशा सही और दूसरा हमेशा गलत हो। यह एक साझेदारी है, जिसमें अनुभव और ऊर्जा, परंपरा और नवाचार, मार्गदर्शन और स्वतंत्रता—सभी को साथ लेकर चलना होता है। रिश्तों में प्रेम तभी टिकाऊ बनता है जब उसके साथ सम्मान और स्पेस भी हो। शायद आज के समय में माता-पिता और बच्चों के बीच बेहतर संबंधों का यही सबसे प्रभावी मंत्र है।