शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

नमस्कार। देखते देखते इस साल के छह महीने बीत गए। लोकडाउन के बाद तीन महीने गुज़र गए। हर महीने हम उम्मीद करते हैं कि अगले महीने से ज़िन्दगी स्वाभाविक हो जाएगी। परन्तु ऐसा नहीं हो रहा है। कई विश्वविद्यालय के अध्यन ने जून के महीने के अंदर परिस्थिति नियंत्रण में आ जाने का पूर्वाभास किया था। नियंत्रण में आने के विपरित परिस्तिथि बिगड़ रही है। कब ज़िन्दगी स्वाभाविक होगी कुछ पता नहीं। लेकिन ज़िन्दगी को आगे बढ़ाना है। हर देश की सरकार डट कर मुक़ाबला कर रही है। बिज़नेस प्रतिष्ठान खुल रहें हैं। लोगों का मनोबल क्रमश बढ़ रहा है। इन हालातों में बिज़नेस के मालिक दो सवालों से जूझ रहे हैं। इस समय बिज़नेस के लिए क्या करना चाहिए और आगे क्या करना चाहिए।
हमारे पेशे में हम बिज़नेस संस्थाओं को सलाह देते हैं व्यवसाय को किस तरीके से बढ़ाया जाय और मुनाफा की बढ़ोतरी कैसे हो। इन तीन महीनों में हमने चार  सीख अर्जन की है। इसकी चर्चा आज के लेख का विषय है।
पहली सीख आज के लिए जिओ। व्यावसायिक निर्णय आज की परिस्थिति के आधार पर लो। आगे की सोचो परन्तु निर्णय आज के वास्तव पर लो। एक संस्था सरकार के स्किल डेवलपमेंट के प्रयास से जुड़ी हुई है। सौ से अधिक सेंटर के माध्यम से बच्चों को प्रशिक्षण दे कर नौकरी दिलवाती है। सेंटर बंद परे थे। क्या करती यह संस्था। उन्होंने वास्तव का सहारा लिया। अपने कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाला। बिना तनख्वा के छुट्टी पर भेज दिया। लोग समझते है इस मज़बूरी को। इस महीने से सरकार ने सेंटर खोलने का निर्देश जारी किया है। इस वक़्त यह कम्पनी केवल इतना सोच रही है कि कैसे सेंटर को शुरू करना है और बच्चोँ को कैसे वापस लाना है। इसके लिए कितने कर्मचारियों को काम पर बुलाना है। और कुछ नहीं। सेंटर खुलने के बाद आगे का सोचा जाएगा। अनिश्चयता के दौरान आज के लिए जिओ। कल के लिए कल सोचेंगे।
दूसरी सीख है ब्रैंड का महत्व। हमारा गत १६ सालों से एक शहर के एक नंबर ज्वेलर के साथ ब्रैंडिंग बढ़ाने के सलाह देने का काम चल रहा है। यह ब्रैंड धनतेरस के अलावा साल में कभी भी डिस्काउंट नहीं देता है। शादी का गहना सबसे बड़ा मार्केट है ज्वेलर के लिए। चूँकि काफी परिवार ने शादी स्थगित कर दिया है और सोने का दाम क्रमश बढ़ रहा है ;जून के महीने में इस संस्थान ने पहली बार अपने ८० साल के इतिहास में डिस्कॉउंट ऑफर का एलान किया है। लकडाउन के कारण बंद रहने के बाद इस ऑफर के माध्यम से इस संस्था को उम्मीद से कहीं ज़्यादा सफलता मिली है। हमने एक नया फार्मूला बनाया है ब्रैंडिंग को बेहतर बनाने का। इस फार्मूला का प्रयोग इस उदाहरण में झलकता है।
तीसरी सीख है कि कठिन समय अपने साथ कुछ मौका भी लाता है। एक अस्पताल जो कि १६ वर्षों से हमारा क्लाइंट है करीब आठ साल पहले पूर्वोत्तर भारत में एक आधुनिक अस्पताल का निर्माण किया है। अस्पताल अच्छा चल रहा था। परन्तु उम्मीद ज़्यादा थी। लकडाउन के दौरान ट्रेन और फ्लाइट्स बंद हो जाने के ठीक पहले हमने सही अनुमान लगाया कि मरीज़ जो उस शहर के बाहर बड़े शहरों में चिकित्सा के लिए चले जाते थे मजबूरन इस अस्पताल में आएंगे। पहले से डॉक्टर और स्टाफ उस शहर में बढ़ा दिए हमने। हमारा अनुमान सही रहा। बिज़नेस लगभग दुगना हो गया है। इस वक़्त प्रयास यही है कि मरीजों का आस्था जीत लिया जाय ताकि आगे भी वह शहर से बाहर अपनी चिकित्सा के लिए नहीं जायें।
चौथी सीख है कि इस कठिन समय में किसी भी बिज़नेस का सबसे महत्वपूर्ण समपद है उस बिज़नेस के कर्मचारी। कई बिज़नेस ने मजबूरन थोड़ी बहुत छटाई की है। लेकिन जिनको रखा है उनसे और कैसे प्रोडक्टिविटी बढ़ाए यही जरूरी है। हमने एक संस्था के मैनेजर लोगों की ट्रेनिंग ली। इस बदलते हुए परिस्थितिओं में हम कैसे खुद को बदलेंगे और हमारे टीम के सदस्यों को बदलने में मदत करेंगे। बिज़नेस के नए अवसर को कैसे ढूंढ कर निकालेंगे और उसका फायदा उठाएँगे। मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि इस कंपनी ने जल्द नए बिज़नेस को पहचाना और उसका भरपूर फायदा उठा रहें हैं।
आपके इस प्रिय पत्रिका INEXT के साथ मिलकर हम आपके बिज़नेस की बढ़ोत्तरी के लिए एक बेहतरीन उपाय ला रहें हैं। इसका भरपूर फायदा लेने के लिए INEXT ऑफिस में excelerate प्रोग्राम की जानकारी के लिए संपर्क कीजिए। आपका बिज़नेस और आपकी सफलता का जिक्र मैं इस लेख के माध्यम से लाखोँ पाठकों तक पहुँचाना चाहता हूँ। मेरे साथ आप फेसबुक के माध्यम से भी बातचीत कर सकते हैं। सावधान रहिये। अभी ज़िन्दगी को नॉर्मल होने में समय लगेगा। 

गुरुवार, 28 मई 2020

नमस्कार। उम्मीद करता हूँ कि आप हर कोई स्वस्थ और सुरक्षित हैं। कठिन समय पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही है। हमारे देश में कॅरोना वायरस से संक्रमित लोगों की सँख्या बढ़ती ही जा रही है। पूरी दुनिया में परिस्तिथि हमारे देश की तरह ही है। हर देश की सरकार एक दुविधा से गुज़र रही है। क्या हम लकडाउन को और मजबूती के साथ आगे बढ़ाए ताकि अधिक लोगों की जान बचे या लकडाउन को शिथिल करके वाणिज्यिक और अर्थनैतिक कार्यक्रम की शुरुआत करे ताकि अर्थव्यवस्ता बेहतर बने और लोगों को काम और आय करने का मौका मिले। दोनों निर्णय के लिए कुछ वजह अनुकुल हैं और कुछ विपक्ष में। क्या करना चाहिए इस स्थिति में ? यही आज के लेख का विषय है।
ग्रीस में इस असमंजस को Protagoras Paradox के नाम से परिचित है। करीब २००० साल पहले प्रोटागोरस नामक एक वकील के दुविधा से इस प्रोटागोरस पैराडॉक्स का जन्म हुआ था। कहानी कुछ ऐसी है। प्रोटागोरस एक मशहूर वकील था। वकालत सीखने वाला एक विद्यार्थी प्रोटागोरस के साथ काम सीखने की उम्मीद से उसके साथ जुड़ना चाहता था। परन्तु उसके पास गुरु दक्षिणा देने के लिए कोई पैसे नहीं थे। दोनों ने मिलकर एक निर्णय लिया। जिस दिन यह विद्यार्थी अपना पहला केस जीत लेगा वकालती का ,वह गुरु दक्षिणा के पैसे प्रोटागोरस को देगा -अपनी पहली कमाई से। 
विद्यार्थी की ट्रेनिंग समाप्त हो जाने के बाद कई साल गुज़र गए परन्तु उसने प्रोटागोरस को एक भी पैसा नहीं दिया। प्रोटागोरस ने विद्यार्थी के खिलाफ न्यायालय में मुकदमा दाखिल कर दिया। उनका सोच था कि अगर मैं मुकदमा जीत जाऊँगा तो मुझे अपना गुरू दक्षिणा मिल जाएगा क्योंकि मुक़दमे का मूल विषय ही यही था। अगर प्रोटागोरस मुकदमा हार जाता है तो विद्यार्थी को जो पैसे मिलेंगे उसे प्रोटागोरस को वापस देना पड़ेगा क्योंकि यही बात तय हुई थी कि विद्यार्थी अपनी पहली जीत का पैसा गुरु दक्षिणा की खातिर प्रोटागोरस को देगा। 
यही Protagoras Paradox के नाम से मशहूर हुआ। दोनों पक्ष सही है। चिकित्सा में अक्सर यह दुविधा होती है -ऑपरेशन करे तो खतरा है ,ना ऑपरेशन करो तो मरीज़ के बचने की उम्मीद घट जाती है। बच्चों को घर के पास पढ़ने भेजा जाय ताकि उन पर नज़र बनी रहे ,या दूर के शहर भेजा जाय जहाँ नौकरी बेहतर मिल सकती है। 
अभी यही असमंजस के साथ पूरी दुनिया जूझ रही है। दोनों पक्ष सही हैं। समय ही बता सकता है कि क्या होगा आगे चल कर। इस सन्दर्भ में मैं येल विश्वविद्यालय के द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च का ज़िक्र करूँगा। यह रिसर्च दो विषय पर आलोकपात करता है। पहली बात कि पूरी दुनिया में जिस रफतार से नए मरीज़ की संख्या बढ़ रही है , उसके कारण सोशल डिस्टैन्सिंग पर लोगों का विश्वास कमजोड़ होता जा रहा है। निराश मत हो जाईये। सोशल डिस्टैन्सिंग ही वायरस के फैलने को रोकने का प्रथम और प्रधान तरीका है। आँकड़े बता रहें हैं कि कुछ दिन बाद इन्फेक्शन का फैलना धीमा हो जाएगा अगर हम सोशल डिस्टैन्सिंग का पालन करते रहें। 
दूसरी बात इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम सब एक छत के नीचे एक परिवार की तरह जी रहें हैं। इस को एक सोशल यूनिट का दर्जा दिया गया है। इसी तरह अलग -अलग परिवार अलग -अलग सोशल यूनिट है। लकडाउन शिथिल होने की वजह से अगर एक सोशल यूनिट का कोई सदस्य किसी दूसरे सोशल यूनिट के सदस्य के साथ अपना हाथ मिलाता है तब इन्फेक्शन एक सोशल यूनिट से दूसरे सोशल यूनिट में फैल कर हर सदस्य को वायरस दे सकता है। यह वायरस अदृष्य है जिसके कारण और भी खतरनाक है। इस सावधानी को बरतना बहुत जरूरी है। 
२०२० का छटा महीना आज शुरू हो गया। आधा साल गुजरने को चला। समय तेज रफतार के साथ भाग रहा है। परन्तु हमें धैर्य के साथ परिस्थिति का मुकाबला करना पड़ेगा। सोच समझ कर दिमाग से निर्णय लीजिए -अपने लिए और अपने सोशल यूनिट के लिए। इसी में सब का मंगल है। खुश रहिये। सही सलामत रहिए। यही मेरी दुआ है। मजे की बात यह है कि Protagoras Paradox का अभी भी समाधान नहीं मिला है और वकालती सिखाते वक़्त हर यूनिवर्सिटी में इसका केस लड़ा जाता है विद्यार्थी को सिखाने के लिए !

शुक्रवार, 1 मई 2020

नमस्कार। मैंने जब से आपके साथ संपर्क बनाया है इस लेख के माध्यम से मैंने नमस्कार के जरिये लेख शुरू की है। कोरोना ने नमस्कार को विश्व व्यापी सम्बोधन का तरीका बना दिया है। क्या यह कोरोना के बाद भारत का पूरे विश्व पर बढ़ते हुए प्रभाव का नमूना है ? शायद हम सही सोच रहें हैं।
आज सुबह ख़बरों में लकडाउन का दो हफ्तों के लिए बढ़ाये जाने का संदेश मिला। इस लकडाउन के दौरान कई मजेदार वीडियो व्हाट्स एप के माध्यम से मुझे मिले हैं। आज एक वीडियो में एक महिला ने बेहतरीन अंदाज़ में अपने बढ़ते हुए टेंशन का ज़िक्र किया है। किस बात का टेंशन। इतनी प्रतिभा जो उभर कर आ रही है। लोग गाना ,बजाना ,नृत्य, योगा और खाना बनाने का वीडियो बना रहे हैं। यह महिला किसी भी विषय में निपुण नहीं है। और यही कारण है उनके टेंशन का। वीडियो के अंत में उन्होंने अपने एक प्रतिभा का मजेदार अंदाज़ में ज़िक्र किया है -झगड़ने का। मजा आ गया यह वीडियो देख कर। मिजाज को हल्का कर दिया।
आप में भी कोई प्रतिभा जरूर होगी। अपने प्रतिभा को मुझ तक पहुंचाहिये फेसबुक के माध्यम से। मैं आपके प्रतिभा को और अधिक लोगों तक पहुँचाने का वादा करता हूँ।
मेरे पिछले महीने के लेख में मैंने आप से अनुरोध किया था , फेसबुक के माध्यम से मुझे आप क्या कर रहें हैं बताने के लिए। कानपुर शहर से वर्णिका ने अपने विषय में लिखा है कि उन्होंने लकडाउन के समय अपने दोस्तों के साथ फ़ोन पर काफी बातचीत की है जिनके कारण उनके दोस्त बहुत खुश हैं। और उन्होंने योगा के विषय में चर्चा किया है और उसके बाद कई लोगों ने उनसे योगा के विषय में सलाह माँगने लगे हैं। दूसरे सज्जन जिन्होंने मुझे अपने विषय लिख कर भेजा है गोरखपुर के निवासी हैं जो कि इस समय प्रयागराज में वक़ालती के पेशे से जुड़े हैं। उनका नाम है आनन्द स्वरुप गौतम। आनंद जी ने पढ़ने लिखने में अपनी दिलचस्पी का ज़िक्र किया है। संगीत का आनंद लेते हैं और सामयिक मुद्दों पर अपना विचार व्यक्त करतें हैं फेसबुक के माध्यम से। धन्यवाद आप दोनों को मेरे अनुरोध का सम्मान करने के लिए।
मैं भी काफी समय बिता रहा हूँ पढ़ने में। अधिकतर लेख कोरोना के बाद ज़िन्दगी कैसी हो सकती है उसके विषय में पूर्वाभास करने का प्रयत्न कर रही है। कल मैं एक वीडियो देख रहा था हार्वर्ड बिज़नेस रिविउ के यूटुब चैनल पर। थॉमस फ्रीडमन जो की न्यू यॉर्क टाइम्स से जुड़े एक विश्व प्रसिद्द संवादिक हैं ने इस वीडियो में एक महत्वपूर्ण सलाह दी है -कोरोना के बाद जो इंसान सफलता और आनंद के साथ ज़िन्दगी जियेगा वह सबसे स्ट्रॉन्गेस्ट या स्मार्ट इंसान नहीं होगा -वह सबसे adaptive यानि जो परिस्थितिओं के साथ अपने आप को परिवर्तन कर सकेगा ,वही मुक़द्दर का सिकंदर होगा।
इस सन्दर्भ में मेरा अपना सोच है कि हर इंसान को अपने विषय में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ेगा -मैं किस विषय में best हो सकता हूँ। क्यूंकि आगे दुनिया बेस्ट का ही कदर करेगी। कैसे आप बेस्ट हो सकते हैं ? इसके लिए अपने हातों के पाँच उँगलियों पर ध्यान दीजिये। पहली बात कोई भी एक ही विषय में बेस्ट हो सकता है। दूसरी बात आप किस विषय में बेस्ट बनना चाहते हैं ? तीसरी बात ऐसे विषय को बेस्ट बनने के लिए चुनिए जिसमें आपका सहजात प्रतिभा है और उसमें आप इस वक़्त अच्छे हैं। चौथी बात आपके लिए बेस्ट की परिभाषा क्या है ? उदाहरण स्वरुप -हमारे देश के क्रिकेट कपतान ने फिटनेस में बेस्ट होने के लिए क्रिकेट के बाहर के खिलाड़ियों को अपना परिभाषा बनाया क्यूंकि उनके फिटनेस का मापदंड क्रिकेट के फिटनेस से ऊपर है। पाँचवी बात है आपका मापदंड कौन है। जिसको आप बेस्ट समझते हो और अक्सर सोचते हो कि अगर मैं इस विषय में इनके तरह बन सकूँ तो खुद को सफल मान लूँगा। उनके विषय में अध्यन कीजिये। उनके ज़िन्दगी से सीखिए। उनका अनुकरण कीजिए। नक़ल नहीं। वह आपके इंस्पिरेशन हैं। कौन जाने आप अपने प्रयास से उनसे भी बेहतर हो जाओ।
मैंने एक और दिलचस्प लेख पढ़ी है -प्रोटागोरस पैराडॉक्स -जो कि इस हर राष्ट्र के लीडर को एक कठिन निर्णय लेने में मजबूर कर रहा है -लकडाउन या इकोनॉमी ? अगले लेख में इसके विषय में लिखूँगा। तब तक सावधानी के साथ रहिए और अपने प्रतिभा का प्रदर्शन फेसबुक के माध्यम से मुझ तक पहुँचा दीजिए। इंतज़ार करूँगा आपके प्रतिभा का और लकडाउन से निकल आने का। 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

नमस्कार। कैसा रहा आपका वैलेंटाइन्स दिवस ? क्या आपको मेरे पिछले महीने के लेख से कुछ नई दिशा नज़र आई ?अपने ज़िन्दगी में आपने कोई बदलाव के विषय में सोचा है ? मार्च का महीना इस वित्तीय वर्ष का आखरी महीना है। खुद में बदलाव लाने के लिए यह महीना संकल्प बनाने के लिए आदर्श महीना है। ताकि अप्रैल में आप नई शुरुआत कर सकते हो।
पिछले महीने के लेख में मैंने अपनी ज़िन्दगी में चैन या सुकून का ज़िक्र किया था। मैं  जापान के लोगों से काफी सीखता हूँ। जापानी लोग अपनी ज़िन्दगी चैन से जीना चाहते हैं। मारी फुजिमोतो एक जापानी लेखक ने इस विषय पर कई सारी किताबेँ लिखी हैं जो कि कई भाषाओँ में अनुवाद किया गया है। बहुत सारे लोग उनकी लेख से प्रभावित हुए हैं। मैं भी काफी प्रभावित हूँ। पिछले महीने के लेख से मैं कुछ पंक्तियाँ दोहरा रहा हूँ। क्यूँकि वही मूल मंत्र है।
लेखक ने एक जापानी शब्द 'शिबूई 'का ज़िक्र किया है। यह जीवन का एक दर्शन है। अभिज्ञता और तजुर्बा हमें हर चीज़ को एक नए अंदाज़ में देखने और अनुभव करने में मदद करता है। वसंत ऋतु में पहली कलि या सुबह के चाय का रंग। हर चीज़ में चैन है अगर हम उसको ढूँढ निकाले। खुद के लिए समय निकालिए इस चैन को ढूँढने के लिए। लेखक का कहना है कि ज़िन्दगी में हम सब कोई ,हर वक़्त परफेक्ट होना चाहते हैं। क्या हम हो सकते हैं ? ना परफेक्ट होने का भी आनंद उठाना जरूरी है।
लेखक एक और जापानी शब्द का उल्लेख करती है -वाक़ेई सेजयकु -जो कि चार चिंताओं का मिश्रण है -वा यानि harmony यानि अनुरूपता या सामंजस्यता  ; केई यानि respect यानि इज़्ज़त ;सेई यानि  purity अर्थात शुद्धता ;जयकु यानि tranquility अर्थात शांति। ज़रा गौर फरमाईये  चार शब्दों पर - सामंजस्यता ; इज्जत , शुद्धता और शांति। ऐसा कोई है जो अपनी ज़िन्दगी में यह चार नहीं चाहता हो ? शायद अपने लिए नहीं। अपने स्वार्थ के लिए कभी -कभी इंसान दूसरों के ज़िन्दगी में इन चार में बेचैनी बढ़ाने का  कोशिश करते हैं। इतिहास , महाकाव्य ,कहानियाँ ,सिनेमा ,टीवी सीरियल -कहीं भी देखिए -ऐसी कहानियाँ हर जगह नज़र आएगी। जहाँ किसी इंसान ने अपने स्वार्थ के कारण किसी और इन्सान के इन चारों में किसी एक या अनेक चिंता पर बेचैनी पैदा की थी। रामायण में राजा दसरथ में बेचैनी कैकेयी ने किया था। जो कि रामायण का शुरुआत है।
जो पाठक मेरा यह लेख नियमित पढ़ते हैं ,उनको शायद याद होगा कि मैं एक विषय पर अत्याधिक ज़ोर देता हूँ -एक दूसरे का इज्जत करना। मेरा विचार है कि यही किसी भी रिश्ते का मूल आधार है। जरा सोचिए अगर हम हर एक इंसान के साथ इज्जत से वर्ताव करें तब क्या हमें भी इज्जत मिलेगा ? मुसीबत है कि हम अपने आप को किसी किसी इंसान से ऊँचा समझते हैं और इज्जत के साथ पेश नहीं आते हैं और इससे रिश्तों में दरार तैयार हो जाता है।
एक नई फिल्म इस विषय को बहुत ही सराहनीय ढंग से पेश किया है। एक व्यक्ति अपने बीवी को गुस्से में आकर एक थप्पड़ मार देता है। दोनों परिवार के बुजुर्ग का कहना है कि वैवाहिक जीवन का यह एक अभिन्न अंग है। औरत को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए और ज़िन्दगी में आगे बढ़ना चाहिए। परंतु क्यों ? अगर औरत ने अपने पति पर हाथ उठाया होता तो क्या यही बात होती ?कभी नहीं ? क्योंकि मर्द पर औरत हात नहीं उठा सकता है। अगर आप सोचिए एक थप्पड़ ने -सामंजस्यता ; इज्जत , शुद्धता और शांति- चारों का उलँघन किया है। और यही रिश्ते को तोड़ देता है। क्या किसी को चैन मिलता है ? या बेचैनी लोगों को गिरफ़्त कर लेती है ?
ज़िन्दगी जीने के लिए है। चैन से जीने का कोशिश कीजिये। चैन हमारे खुद के हातों में है। किसी और के पास नहीं। ख्याल रखिएगा कि किसी और के बेचैनी को बढ़ा कर कोई भी चैन से नहीं जी सकता है। गुस्सा और प्रतिशोध के भावनाओं से प्रभावित हो कर हम अक्सर , अनजाने में ऐसे कदम उठा लेते हैं ,अपनों के साथ भी। इसमें किसी को फायदा नहीं होता।
नए साल में नए संकल्प के साथ ज़िन्दगी में चैन से जीने का प्रयास कीजिए। सबसे अधिक लाभ आप ही का होगा। खुश रहिए और हमारे साथ फेसबुक के माध्यम से जुड़े रहिए। आप सब को होली के त्यौहार के लिए अग्रिम बधाई। सावधानी से रंगो के त्यौहार का आनंद लीजिये।

बुधवार, 29 जनवरी 2020

नमस्कार। फरवरी का महीना। वैलेंटाइन्स दिवस का महिना। वैलेंटाइन्स , यानि प्यार। प्यार लोगों से ,चीज़ों से या ब्रैंड्स से होता है। मेरा प्यार एक जापानी गाड़ी के ब्रैंड के साथ है। कुछ दिन पहले मैंने उसी ब्रैंड का सातवाँ गाड़ी ख़रीदा गत १५ वर्षों में। मैंने अपने आप से प्रश्न किया -क्यों मैं वापस उसी ब्रैंड को खरीदता हूँ ?मुझे एक ही कारण दिखा -मैं इस गाड़ी को खरीद कर चैन से रह सकता हूँ। मैंने चैन के विषय में थोड़ी बहुत पढ़ाई लिखाई की जो इस और अगले दो महीनों के लेख का मूल विषय रहेगा।
जापानी लोग अपनी ज़िन्दगी चैन से जीना चाहते हैं। मारी फुजिमोतो एक जापानी लेखक ने इस विषय पर कई सारी किताबेँ लिखी हैं जो कि कई भाषाओँ में अनुवाद किया गया है। बहुत सारे लोग उनकी लेख से प्रभावित हुए हैं। मैं भी काफी प्रभावित हूँ।
लेखक दो साल के उम्र में अपने पिता -माता के साथ एक छोटे गांव में रहने के लिए चली जाती है। क्यों ?क्यूँकि उनके पिताजी अपने माता -पिता के साथ रहना चाहते थे क्यूंकि दोनों करीब -करीब सौ साल के उम्र के थे। उनको अपने बेटे और बहु की ज़रुरत थी। नतनी की भी। उनके साथ रहना लेखक पर एक गज़ब का प्रभाव करता है और बुढ़ापे को 'जी' कर बिताने के लिए प्रेरित करता है। बुढ़ापा ज़िन्दगी का एक अभिन्न हिस्सा है। उससे मायूस नहीं होना चाहिए। हम उदास हो जाते हैं। भूल जाते हैं कितने लोगों को बुढ़ापे का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता है। जो सौभाग्यवान है बुढ़ापे का आनंद ना उठा कर यह सोचता रहता है कि मैं अपने युवा अवस्था के तुलना में क्या -क्या नहीं कर पाता हूँ। और इसी सोच के कारन मायूस हो जाता है। और बुढ़ापे के आनंद से वंचित हो जाता है।
जापान एक छोटा सा देश है। चारो ओर समुद्र से घिरा हुआ है। प्रकृति ने कई बार जापान को तहस -नहस कर दिया है अपने प्रकोप से। प्राक ऐतिहासिक दिनों में जापानी लोगों को कई ऐसे कठिन प्राकृतिक घटनाओ से जूझना परा है। ज़िन्दगी एकदम सहज नहीं हुआ करती थी। लेखक अपने जीवन में टाइफून और भयानक भूकंप का ज़िक्र करती है जिसकी वजह से उन्होंने लाखो लोगों को अपना प्राण गवांते हुए देखा है। जापानी शुरू में इस प्राकृतिक प्रकोप के कारण अपना हौसला खो बैठते थे और उनका मिजाज चिरचिराहट वाला होता था। समय के साथ जापानी लोगों ने यह समझा और निर्णय लिया कि प्रकृति के साथ जूझने के लिए प्रकृति के अच्छे और बुरे -दोनों को स्वीकार कर लेना जरूरी है। इसी में चैन है। और यही ज़िन्दगी है। इस एहसास ने जापानी लोगों को विनम्रता सिखाई है उनके बातचीत और शारीरिक भाषा में।
कभी आपने किसी तालाब के स्थिर पानी को देखकर आनंद लिया है ?गज़ब का चैन महसूस होता है। एक पत्थर फेक दीजिए उसी तालाब में। आपको बेचैनी दिखेगी। कुछ देर बाद फिर चैन। यही ज़िन्दगी है। पल -पल बदलती रहती है।
लेखक ने एक जापानी शब्द 'शिबूई 'का ज़िक्र किया है। यह जीवन का एक दर्शन है। अभिज्ञता और तजुर्बा हमें हर चीज़ को एक नए अंदाज़ में देखने और अनुभव करने में मदद करता है। वसंत ऋतु में पहली कलि या सुबह के चाय का रंग। हर चीज़ में चैन है अगर हम उसको ढूँढ निकाले। खुद के लिए समय निकालिए इस चैन को ढूँढने के लिए। लेखक का कहना है कि ज़िन्दगी में हम सब कोई ,हर वक़्त परफेक्ट होना चाहते हैं। क्या हम हो सकते हैं ? ना परफेक्ट होने का भी आनंद उठाना जरूरी है।
क्यूँकि -'हर पल जियो। कल हो ना हो'- खुश रहिए क्यूँकि ज़िन्दगी ही कभी ख़ुशी ,कभी गम। 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

सादर प्रणाम २०२० का। आशा है शुरुआत अच्छी रही। एक नए दशक के शुरुआत में हर कोई अपने ख्वाबों को तराश रहा होगा। कैसा रहेगा यह २०२० का दशक ?मुझे इस दशक में निम्लिखित दस परिवर्तन नजर आ रहे हैं।
१ ) टी २० भी दर्शकों के लिए धीमा पर जायेगा। टी १० का जमाना शीघ्र आ रहा है। समय और ध्यैर्य दोनों पर प्रेशर बढ़ रहा है। इंस्टेंट फ़ूड की तरह इंस्टेंट एंटरटेनमेंट का जमाना आ रहा है।
२ ) समय का उपयोग और बदल जाएगा। आँकड़े कहते हैं कि स्मार्ट फ़ोन वाला इंसान औसत १८०० घंटा फ़ोन के साथ बिताता है ३६५ दिनों में। हम नत मस्तक रहेंगे शेष जीवन। स्पोंडिलोसिस का रोग और बढ़ेगा।
३ ) मोबाइल डाटा जितना सस्ता होगा उतने लोग अपने आप को गूगल के भरोसे एक्सपर्ट समझेंगे। विद्यार्थिओं को सुविधा होगी। जिनके पास जिज्ञासा है वह खो जाने का संभावना रखता है -गूगल सर्च में। फलस्वरुप कॉन्फिडेंस से ज्यादा कन्फूशन बढ़ेगा।
४ ) जितना हम गूगल के साथ समय बिताएंगे उतना हम अपना प्राइवेसी के साथ कोम्प्रोमाईज़ करेंगे। साइबर क्राइम सबसे ज्यादा हमें नुकसान पहुँचाएगा। सतर्क रहना बहुत जरूरी है।
५  ) टीवी अपने समय पर चलेगा। हम अपने समय पर अपना मनपसंद प्रोग्राम देखेंगे। ज्यादा लोग मोबाइल फ़ोन पर। कहीं कम लोग टीवी स्क्रीन पर। विज्ञापनदाताओं का इस वजह से काफी असुविधा होगी। मार्केटिंग का विज्ञान और बदल जाएगा।
६ ) ऑनलाइन रेपुटेशन मैनेजमेंट ब्रैंड्स के लिए सरदर्द बन जाएगा। इसका एक फायदा रहेगा। ब्रैंड्स को और ज़्यादा जिम्मेवार बनना पड़ेगा। आपको ख्याल रखना पड़ेगा कि पॉलिटिशंस को भी अपना ब्रैंड बनाना मजबूरी है।
७  ) नए कैरियर चॉइस उभर कर सामने आ रहे हैं। पॉलिटिक्स एक कैरियर चॉइस बन कर सामने आएगा। युवा पॉलिटिक्स में ज़्यादा दिमाग लगाएगा। जिओपॉलिटिक्स का प्रभाव हर देश पर पड़ेगा। इसके कई पहलु होंगे। हर देश का नेता अपने आप को दुसरे देश के नेता से बेहतर दिखाने का कोशिश करेगा। इस सिलसिले में छोटे देशों का भूमिका अहम् होगा।
८ ) एनवायरनमेंट और पॉलूशन पर चर्चा बढ़ेगा। साथ में वातावरण में दूषणता भी बढ़ेगा। शब्द और मोटर प्रदूषण और तेजी से बढ़ेंगे हमारे देश में।
९ ) एक तरफ कुछ लोग ज़्यादा सेहत का ख्याल ,और कुछ लोगों का सेहत पर खर्च बढ़ेगा। स्ट्रेस या मानसिक तनाव एक भयानक परिमाण में बढ़ेगा।
१० ) तनाव बढ़ने का एक कारण होगा खुद पर फोकस। सेल्फी ,फेसबुक लाइक्स ,अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना हम सब में तनाव बनाएगा। इससे बचके रहना आवश्यक है।
मैंने क्या प्रतिज्ञा किया है अपने आप से ?
सुबह उठने के कम से कम दो घंटों के बाद ही मैं अपना मोबाइल फ़ोन देखूँगा। काम के वक़्त मोबाइल को साइलेंट कर के काम करूँगा।
फेसबुक के जरिए अब कई लोगों के जन्मदिन पर हमें अलर्ट मिल जाता है। लोगों के साथ फ़ोन पर बात करके जन्मदिन का बधाई बोलूँगा। हम एक दूसरे से दूर चले जा रहे हैं क्यूँकि हम बात नहीं कर रहे हैं एक दूसरे के साथ। रिश्ते कमजोर पर जा रहे हैं।
टेक्नोलॉजी हमारे लिए बना है। हम टेक्नोलॉजी के लिए नहीं। हमें टेक्नोलॉजी को प्रयोग करना है। उनका गुलाम नहीं बनना है। गूगल से जानकारी मिलती है। हमें वह जानकारी एक्सपर्ट नहीं बना सकती है।
चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए। २०२० से हम २०३० भी पहुँच जाएंगे। सब कुछ बदल सकता है। केवल एक चीज़ कभी नहीं बदलेगा किसी के लिए -दिन के २४ घण्टे। इसका सदुपयोग ही हर इंसान को आगे बढ़ाएगा। टेक्नोलॉजी का सहारा लीजिए। आगे बढ़ने के लिए। अपने लिए ,खुद के लिए समय निकालने के लिए। अपनों के साथ समय बिताइए। यही आनंदमय ज़िन्दगी का एक मात्र राज़ है।
खुश रहिए। और ज़िन्दगी अपने अंदाज़ में जीने का प्रयत्न कीजिए। इसी में हम सब का मंगल है। 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

नमस्कार। देखते देखते एक और साल के आखिरी महीने में हम पहुँच गए हैं। कैसा रहा अब तक का सफर ,इस साल ?दावे के साथ कह सकता हूँ कि सफलता ,असफलता और निराशा हर व्यक्ति के सफर का अभिन्न हिस्सा रहा होगा। खुशियाँ और गम दोनों ने अपना किरदार निभाया होगा। एक क्षण के लिए अपनी आँखें बंद कीजिये और गत इग्यारह महीनों के घटनाओं के विषय में सोचिए। कौन सी बात पहले दिमाग में आती है ?बहुत आनंददायक या निराशा वाली घटना ? मैंने एक रिसर्च किया था इस विषय पर। पचास में छत्तीस वक़्ति के मन में निराशा के घटना ने पहला अभिर्भाव किया। बाकि चौदह लोगों के ज़िन्दगी में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई थी जो कि बहुत खुशी वाली थी और जो कि कभी -कभी होती है। एक वक़्ति का पाँच साल के बाद नौकरी में प्रोमोशन मिला जिसके कारण वह मैनेजर बन गया। एक बुजुर्ग पहली बार दादा बनने का आनंद अनुभव किया।
साल के इस अंतिम लेख का विषय है हमारे सोच के विषय में , खुद के लिए। शुरुआत में चर्चा करते हैं अपने संकल्प के विषय में जो हमने किया था इस वर्ष के शुरू में। कितना सफल हुए हम ? सोचने पर असफलता पहले दिमाग में आता है, सफलता शायद ख्याल में उतनी जल्दी नहीं आता है। हम अपने भाग्य को कोसते हैं। दूसरों के सौभाग्य पर जलते हैं। और इसी वजह से और भी मायूस हो जाते हैं। मेरी पहली सलाह -इस साल जितनी भी सफलता आपने हासिल की है ;उसको अपने दिमाग में ज़्यादा जगह दीजिये। इस सफलता का आनंद लीजिए। जहाँ सफलता नहीं मिली उसका कारण निकालिए। असफलता के लिए हम अकसर हम अपने किसमत को दोष देते हैं। खुद को नही। सफलता का कारण मैं हूँ। असफलता के लिए मैं जिम्मेवार नहीं हूँ। मेरा भाग्य या कोई और जिम्मेवार है। इस सोच को बदलना पड़ेगा। मेरी सफलता या असफलता के लिए मैं ही जिम्मेवार हूँ। और कोई नहीं। जिस दिन आप अपने आप को इस विषय पर राज़ी करवा लोगे ;आपकी ज़िन्दगी बदल जाएगी। मैंने किया है काफी प्रयास के बाद। पहले अपने किसमत को कोसता था ;अब खुद को प्रोतसाहित करता हूँ। सबसे बड़ा फायदा है अपने आप पर विश्वास बढ़ गया है।
पिछले कई लेख में मैंने बॉलीवुड के फिल्मों से सीखी हुई बातों का ज़िक्र किया है। इस बार भी करूँगा। एक फिल्म पिछले महीने काफी हिट हुई है। इस फ्लिम के मुख्य अभिनेता के ज़िन्दगी में एक ही समस्या जो कि उनके कॉन्फिडेंस को हिला देती है -उनके झड़ते हुए बाल और उसके कारण हुई गंजापन। उनको अहँकार था अपने केश पर। सावंली लड़कियों पर हँसता था। खुद को हीरो समझता था। झड़ते हुए बालों ने उनका मनोबल पूरा तोड़ डाला। परंतु वह सावंली लड़की का खुद पर विश्वास कोई नहीं हिला सका। हर कोई उसके ना गोरे होने पर ताना देता था।
कई सीख इस छोटे से उदाहरण से हमें मिलती है। पहली सीख अहँकार का कोई स्थान नहीं है। आज का अहँकार कल कमजोरी बन सकती है। अच्छे समय बुरे समय में बदल सकता है। उस वक़्त अपना मनोबल बरक़रार रखना महत्वपूर्ण है।
दूसरी सीख यह है कि मेरा मनोबल मेरे सावंलेपन  या सर पर बाल कम होने से प्रभावित नहीं होगा। इसे हम अंग्रेजी भाषा में हैंडीकैप कहते हैं। क्या कोई भी एक उम्र के बाद अपनी लंबाई बढ़ा सकता है ? नहीं। नाटा व्यक्ति क्यों किसी लम्बे इन्सान से अपने आप को कम काबिल सोचेगा ? सर पर बाल कम है तो क्या हुआ ? हम अपने हैंडीकैप से इतना हौसला खो देते हैं कि अपनी काबिलियत को भूल जाते हैं। और इसी कारण हमें टेंशन और स्ट्रेस हो जाता है जिसके कारण हम पहले ही हार जाते हैं।
तीसरी सीख आती है मुख्य किरदार के पिता के चरित्र से। अपने बेटे का हौंसला बढ़ाने के लिए ; एक विग खरीद कर अपने बेटे को भेंट करता है। विग पहन कर बेटे का हौंसला वापस आ जाता है। परंतु एक वक़्त आता है , जब उसे अपने गंजेपन को स्वीकार करना परता है ,किसी मजबूरी के कारण। तब उसे एहसास होता है कि विग का कोई जरूरत नहीं हैं। क्योंकि उसे लोग प्यार करते हैं उसके बालों के लिए नहीं।  वह जैसा इंसान है , उसके लिए। इस साल के अंत में आपसे विनती करूँगा कि अपने हैंडीकैप पर विजय हासिल कीजिए और अपने आप पर विश्वास कीजिए -आप सफल या असफल खुद के लिए होते हैं। देखिए आपका मनोबल कैसे बढ़ जाता है।
अगली मुलाकात २०२० में होगी। जब तक आपने अपने लिए नए संकल्प बना लिए होंगे। २०२० के लिए अग्रिम मुबारक। फेसबुक के माध्यम से आपके फीडबैक का इंतज़ार करूँगा। खुश रहिए।