शुक्रवार, 31 मार्च 2023

नमस्कार। नए वित्तीय वर्ष का अभिनंदन। वित्तीय वर्ष का  महत्व मेरे अनुसार ज़्यादा है। व्यवसाय , नौकरी , विद्यार्थी, अवसर प्राप्त हर कोई इस वित्तीय नए वर्ष का इंतेज़ार करता है। उम्मीद के साथ। बेहतर खबर प्राप्त करने के लिए। जरा सोचिये इन्क्रीमेंट कब मिलता है। नए कक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए परीक्षा के रिजल्ट्स कब निकलते हैं। सरकार नए इंटेरेस्ट रेट की घोषणा कब करती है। व्यवसाय में नए साल की शुरुआत कब होता है। अप्रैल के महीने में। 

इस साल मैं आप सब को तीन संभावनाओं के विषय में बताना चाहता हूँ जो कि इस वित्तीय वर्ष के लिए महत्वपूर्ण हैं। प्रथम संभावना है कि यह साल कोरोना के पूर्व व्यवसाय से ज़्यादा व्यवसाय हो सकता है। यह किसी भी व्यवसाय के लिए संभावना है। परंतु इस सुयोग का फायदा लेने के लिए हर व्यवसाय को कठिन मेहनत करना पड़ेगा  और अधिक  कम्पीटीशन से जूझना पड़ेगा। इसके लिए डिजिटल माध्यम का एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रहेगा। साधारण सी बात है। अगर आप का व्यवसाय डिजिटल दुनिया से हाथ नहीं मिलाएगा तो ग्राहक आपसे हाथ नहीं मिलाएंगे। मैंने खुद देखा है कि कुछ लोकप्रिय दुकानदार अभी भी यु पी आई के जरिए पैसे स्वीकार नहीं कर रहें हैं। इसमें उनका नुकसान है। अधिकतर युवा पीढ़ी इस माध्यम से अपनी खरीदारी का पेमेंट करती है। जो ऐसा व्यवसाय करते हैं ,जहाँ ग्राहक इंटरनेट के माध्यम से ढूंढ़ता है कि वह किस के पास जाएगा अपनी खरीदारी के लिए , अगर आपका व्यवसाय उनके इस सर्च में नहीं उभरता है ,फिर वह आपके पास नहीं आएगा। उदाहरण स्वरुप अगर आप एक सलोन के मालिक हो ,आपको डिजिटल दुनिया में उपस्थिति अब मजबूरी बन चुकी है जिसके बिना आप बिज़नेस में पीछे हो जाओगे। यही डिजिटल दुनिया आप  को घर से और घर पर बैठ कर व्यवसाय करने का मौका प्रदान करती है। 

दूसरी संभावना पहले का एक्सटेंशन है। चूँकि व्यवसाय का अवसर बढ़ने वाला है कम्पीटीशन भी उतना ही बढ़ेगा और एक दूसरे के ग्राहक को छीनने की कोशिश करेगा। एक उदाहरण स्वरुप मैं चर्चा करूँगा अभी ऑनलाइन में डिस्काउंट के साथ दवाई बेचने वाले कंपनीओं का। दवाई के दुकानदार क्या करेंगे इन परिस्थितिओं में। उनके ग्राहक तो उनसे भाग जायेंगे। यहीं पर रिश्ता बनाने का प्रयास जरूरी बन गया है। इस तरह का संभावना हर व्यवसाय के लिए है। ग्रोसरी की दुकानों का भी यही परिस्थिति है। उनके ग्राहकों को पकड़ कर रखने के लिए रिश्तों का साथ लेना पड़ेगा। ऐसा कुछ करना पड़ेगा जो कि ग्राहक को फायदेमंद लगता हो। क्या आप मेरी बात से सहमत हो ? क्या करोगे अपने व्यवसाय में ग्राहकों को पकड़ कर रखने के लिए ? आप मुझे फेसबुक के माध्यम से अपना सवाल पूछ सकते हैं इस विषय पर। मैं जरूर जवाब देने की कोशिश करूँगा। 

तीसरी संभावना है क्वालिटी और ट्रांसपेरेंसी का डिमांड -किसी भी क्षेत्र में। चाहे वह नौकरी के लिए एप्लीकेशन का ,सामग्री या सर्विस खरीदने में या किसी भी रिश्ते में जुड़ने में। यह भविष्य में और भी महत्वपूर्ण हो जायेगा। हम कुछ भी , जो कि सच नहीं है ,छुपा नहीं सकेंगे। और एक बार कोई सच्चाई को छुपाते हुए पकड़ा गया ,उससे रिश्ता तोड़ दिया जायेगा और दूसरों को सतर्क कर दिया जायेगा -इससे दूर रहो। मैंने कई इंटरव्यू के बायो डाटा में अक्सर देखा है कि लोग कुछ ऐसे तथ्य का जिक्र नहीं कर रहें हैं , जो आवश्यक है। क्योंकि उसको छुपाना चाहते हैं चूँकि वह उनकी कमजोरी है। कोई भी परफेक्ट इंसान या ब्रैंड नहीं हो सकता है। परन्तु हर कोई सच्चाई के साथ जरूर खुद को या किसी ब्रैंड को पेश कर सकता है। कर के देखिये और लोगों को आपके साथ जुड़ने का आनंद लीजिये। क्योंकि हर इंसान भरोसे का रिश्ता ढूंढ़ता है। 

आपका यह वित्तीय वर्ष सफल हो। यही मेरी दुआ होगी। आप लोग कई सालों से मेरे साथ इस लेख से जुड़े हुए हो। इसके लिए आप सबको दिल से धन्यवाद। इस महीने से आप मेरे फेसबुक पेज पर पुराने कुछ लेख का ऑडियो संस्करण सुन सकोगे। मैं हर वक़्त आपके सुझाव का इंतेज़ार करता हूँ। इंतेज़ार करता रहूंगा।   

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

नमस्कार। मार्च के महीने में आपका स्वागत। वित्तीय वर्ष का आखरी महीना। टैक्स बचाने के माध्यम का प्रयोग। होली का त्योहार और अंतर्जातिक  महिला दिवस का महीना। नौकरी और व्यवसाय में साल का टारगेट का तनाव और अगले वित्तीय वर्ष की प्रस्तुति। मार्च का महीना एक व्यस्त महीना। 

मै खुद से पूछ रहा था कि क्यों मैं साल के आखिरी महने तक इंतेज़ार करता हूँ टैक्स बचाने के लिए जो उपाय है उसमें निवेश करने के लिए। यह प्रश्न मैंने अपने धर्मपत्नी से किया। उनका सीधा जवाब -अगर मुझ पर भरोसा करते तो मैं हर महीने निवेश कर के मार्च के महीने पर इतना बोझ नहीं कर देता। पर तुम मर्द लोग तो हम पर वित्तीय मामलों पर भरोसा नहीं करते हो। यद्यपि हम तुम लोगों से इस विषय में ज्यादा माहीर हैं। मैं समझ गया हूँ उनकी बात। हम अकसर महिलाओं के काबिलियत को समझ नहीं पाते हैं या अपने मर्द होने के अहँकार की वजह से समझ कर भी स्वीकार करना नहीं चाहते हैं। 

शायद महिलाओं के सम्मान में इसी लिए 8 मार्च को अंतर्जातिक महिला दिवस के नाम से मनाया जाता है। मेरा प्रश्न है कि केवल एक दिन ही क्यों ? बाकी ३६४ दिन क्यों नहीं ? साल का एक दिवस पुरुष के नाम पर भी लिखा हुआ है ? क्या आप जानते हैं कौन सा दिन है वह ? मुझे पता नहीं था। गूगल करके पता चला कि 19 नवंबर अंतर्जातिक पुरुष दिवस है।  मेरा मानना है कि हम पुरुष लोग महिला दिवस के विषय में ज़्यादा जानते हैं और उसको सेलिब्रेट भी ज़्यादा करते हैं। इसका मनोविज्ञान है कि एक दिन सेलिब्रेट कर के हम महिलाओँ को एक अलग दर्ज़ा प्रदान करते हैं। मेरे ख्याल से हम यह गलत करते हैं। मैं तो यह समझता हूँ कि महिलाएँ हम पुरुष लोगों से किसी भी क्षेत्र में हमसे कम काबिल नहीं हैं। एक विषय हम पुरुष लोग हमेशा महिलाओं से पीछे रह जाएँगे -एक और इंसान को जन्म देने के क्षमता में। 

आपने देखा होगा कि भीड़ सड़क पर अगर कोई गाड़ी बंद पर जाये और चालक अगर महिला हो तो हम टिप्पणी करते हैं महिला चालक है इस लिए ऐसा हो सकता है। हम मर्दों से गाड़ी कभी बंद नहीं पड़ी है। ऐसे विचारों से ही शुरू होता है पुरुषों को खुद को महिलाओं से ज़्यादा काबिल होने का भ्रम। मैं तीन सोच के जरिए इस भ्रम से मुक्ति हासिल कर सका हूँ। पहला महिलाऐं  पुरुष से ज़्यादा काबिल होती हैं। किसी भी हद में कम काबिल नहीं होती हैं सिवाय फिजिकल लड़ाई के लिए। मानसिक लड़ाई में महिलाएँ जरूर आगे हैं। दूसरी बात महिलाओं के साथ इज्जत और बिना उनको कम काबिल सोच कर पेश आने पर उनकी तरफ से हमें कहीं ज़्यादा इज्जत और सम्मान मिलता है। और तीसरा उन पर भरोसा करके देखो। उस भरोसे का इज्जत और जिम्मेवारी किस तरह कोई महिला निभाती है ,प्रशंशनीय होता है। 

अंत में यही विनती करूँगा आप सभी से। महिलाओं को समान दर्जा दीजिए। इसमें सबसे अधिक फायदा हम पुरुषों का है। हमें अपने आप को महिलाओं से बेहतर और ज़्यादा काबिल प्रमाण करने के टेंशन से हमेशा के लिए मुक्ति हासिल कर सकते हैं। 

होली का त्योहार सावधानी के साथ एन्जोय कीजिये। आपके आनंद का कारन किसी के लिए नाराजगी का वजह ना बन जाए इसी का ख्याल रखिएगा। खुश रहिये। स्वस्थ रहिये। फिर मुलाकात होगी.वित्तीय साल के पहले महीने में। 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

नमस्कार। फ़रवरी का महीना। रोमांस का महीना। वैलेंटाइन डे का महीना। प्यार का महीना। किसको प्यार करतें हैं आप। अपने आप से कितना प्यार करते हैं। कभी आप ने खुद के साथ रोमांस किया है। क्या खुद के साथ रोमांस करना चाहिए। हम रोमांस में करते क्या है। किन भावनाओं से गुजरते हैं हम रोमांस के दौरान। क्या वैसी भावनायें खुद के साथ रोमांस में मौजूद है। आज का विषय खुद के साथ रोमांस करने का है। क्यूँकि यह अति आवश्यक है। यह मेरी समझ है। मेरा विश्वास है। 

किसी भी रोमांस का शुरुआत एक दूसरे को बेहतर समझने और जानने के साथ शुरू होता है। और इस जानने की चेष्टा में एक दूसरे के साथ समय बिताना और एक दूसरे को समझने का प्रयास अति आवश्यक होता है। बेहतर समझ के लिए जो बोला जा रहा है उसको सुनने के अलावा अनकही लव्जो को समझना बहुत जरुरी है। क्या हम अपने शरीर, दिल और दिमाग की बातों को सुनने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या ज़िन्दगी के इस भाग दौर में हमारे पास समय है खुद के लिए। कुछ समय अपने विषय पर सोचने के लिए। खुद के साथ बातचीत करने के लिए। खुद को समझने के लिए। यह आपके लिए रोमांस का पेहला कदम होगा। अगर हम खुद के साथ रोमांस नहीं कर सकते ,हम किसी और के साथ कैसे करेंगे। 

खुद को समझते हम किसकी पहले सुनेंगे -शरीर ,दिल या दिमाग। तीनों का सुनना पड़ेगा। क्योंकि यह एक ही त्रिभुज के तीन कोण हैं। एक उदाहरण लीजिए। किसी कारन आपको अगर टेंशन होता  है तो आपके सेहत पर असर होता है। आप ठंडे दिमाग से सोच  नहीं सकते हो। थोड़ा समय निकालिए अपने व्यस्त जीवन में खुद के साथ बातचीत करने के लिए। यह समझने की कोशिश कीजिये कि आपको आनंद या ख़ुशी किस चीज़ से मिलती है। और आपकी उदासी का कारण क्या हो सकता है। इस सन्दर्भ में दो चीज़ों का ज़िक्र करना जरूरी है। आपकी ख़ुशी किसी और के गम का कारण नहीं हो सकता है। दूसरी बात किसी और की ख़ुशी आपके उदासी का कारण नहीं बन सकता है। कई इंसान दूसरों के साथ तुलना में खुद को दुखी बना लेते हैं। यह कभी भी किसी के लिए फायदे मंद नहीं होता है। 

रोमांस करने के लिए सबसे अधिक ज़रुरत है समय का। अगर हम सात घंटे सो कर बिताते हैं ,तब हमारे पास १७ घंटे बचते हैं। हम अगर अवसर प्राप्त या रिटायर्ड नहीं हैं ,तब आठ घंटे निकल जाते हैं काम के लिए। बचते हैं नौ घंटे। प्रसाधन, खाना-पीना ,आना-जाना में करीब तीन से पाँच घंटे निकल जाते हैं। मुंबई ,दिल्ली जैसे बड़े शहरों में आने-जाने का समय ज्यादा होता है। बचे हुए तीन -चार घंटों को हम कैसे बिताते हैं , वही महत्वपूर्ण है। इस बचे हुए समय में हम कितना समय खुद के साथ बिताते हैं यह सबसे महत्वपूर्ण है। इसको अंग्रेज़ी में 'मी टाइम 'कहते हैं। यही रोमांस का समय है। खुद के साथ। ऐसा कुछ कीजिये जो आप करना चाहते हैं। यह अगर आप कर सकें तो आप का स्ट्रेस जरूर कम हो जायेगा। मुझे इस प्रथा से अत्यधिक फायदा हुआ है स्ट्रेस मैनेजमेंट में। दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपको भी होगा। रोमांस अगर बगैर स्ट्रेस का हो ,तो सोने पे सुहागा होता है। 

इस लेख के माध्यम से मेरा रिश्ता आपके साथ शुरू हुआ है। यह रिश्ता बरक़रार रहे और मजबूत बन जाये यही मेरी चेष्टा रहेगी। रिश्ते ही रोमांस के नीव होते हैं। और रोमांस में एक दूसरे को समझना। एक दूसरे में क्या अच्छा लगता है और कहाँ या करने से रोमांस और मजबूत और आनंदमय होगा इसका फीडबैक मिलना आवश्यक होता है। मुझे इस लेख को और बेहतर बनाने में आपके सुझाव का इंतेज़ार करूँगा फेसबुक के माध्यम से। वैलेंटाइन्स डे पर सब मेरा श्रद्धा से भरा हुआ स्वीकार कीजिए। खुश रहिए। यही तो जीने का सबसे महत्वपूर्ण रोमांस है। 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

नमस्कार। २०२३ के लिए बधाई और शुभकामनाएँ। हर किसी का मंगल हो इसी का प्रार्थना है ऊपर वाले के पास। सब अच्छा चल रहा था। परन्तु पिछले वर्ष के अंत में फिर कोरोना का वापस आना हमें सतर्क रहने का आह्वान कर रहा है। मेरे लिए इस नए साल का सबसे महत्वपूर्ण संकल्प या रेसोलुशन है कि मैं घर से बाहर मास्क पहनूँगा और भीड़ से दूर रहूँगा। सैनिटाइज़र वापस जेब में और निरंतर हातों की सफाई। आप से भी अनुरोध करूँगा कि घर से बाहर मास्क का प्रयोग अवश्य कीजिये। 

संकल्प या रेसोलुशन से एक ख्याल आता है। हम पहले जनवरी को ही क्यों संकल्प लेते हैं। और हम उस संकल्प पर कितने दिन डटे रहते हैं। क्यों हमारा संकल्प टूट जाता है। कभी आपने इन मुद्दों पर विचार किया है। आज इन विषयों पर कुछ सोच पेश करूँगा। 

हम पहले जनवरी के दिन ही क्यों अपना संकल्प बनाते हैं। मेरा सोच है कि हम एक नई शुरुआत करते हैं। परन्तु हर नया दिन हम सब के लिए हुए अवशिष्ट बचे हुए ज़िन्दगी का पहला दिन होता है। कल क्या होगा किसी को नहीं पता। अगर आप इस नजरिये से ज़िन्दगी को देखो तब हर रोज़ आप नए संकल्प कर सकते हो। 

मेरा तजुर्बा कहता है कि शुरू के कुछ दिन हम संकल्प पर डटे रहते हैं। फिर धीरे धीरे हम ढील देना शुरू करते हैं। और कुछ दिनों बाद हम अपने संकल्प से दूर चले जाते हैं। ऐसा आप के साथ होता है। इसका मूल वजह क्या होता है। शुरुआत से शुरू करते हैं। जरा सोचिए हम किस विषय पर संकल्प बनाते हैं। जो हम आसानी से हासिल कर सकते हैं उस पर हम संकल्प नहीं बनाते हैं। हम संकल्प या प्रतिज्ञा उन विषयों पर करते हैं जो हम करना चाहते हैं परन्तु कर नहीं पाते हैं। जो कि आसान नहीं होता है। जिसको हासिल करने के लिए एक मानसिक दृढ़ता आवश्यक होता है। एक फोकस जरूरत होता है। संकल्प हमारे लिए फायदेमंद है। यह हम जानते हैं। परन्तु फिर भी हमें जो करना चाहिए या ना चाहिए ,हम कर नहीं पाते हैं। उदाहरण स्वरुप जो लोग धूम्रपान करते हैं उनको पता होता है कि धूम्रपान कितना हानिकारक होता है स्वास्थ के लिए। ऐसे लोग धूम्रपान को त्याग करना चाहते हैं परन्तु अनेक चेष्टा के बावजूद असफल होते हैं। मैंने अपने जीवन कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने कुछ दिनों के लिए या कुछ वर्षों के लिए धूम्रपान छोड़ दिया है। और अचानक वापस धूम्रपान करने लगते हैं। ऐसा हमारे मानसिक ढील देने के कारन होता है। एक आध सिगरेट कभी कभी वापस आदत बन जाता है। 

मैंने एक उपाय निकाला है अपने संकल्प पर डटे रहने के लिए। साधारण उपाय है। हर रोज सुबह तय कर लो कि आज क्या करना या ना करना है अपने संकल्प को बरक़रार रखने के लिए। तब तक करते रहना है जब तक आदत ना बन जाए। इसी प्रयास ने मुझे धूम्रपान रोकने में सहायता किया है। तीस साल पहले मुझे बारह महीनों तक इस दैनिक संकल्प ने मुझे हर सुबह यह बताया है कि आज सिगरेट नहीं पीना है। और हर रात सोने के पहले मैं खुद को शाबाशी देता था कि आज मैं अपने संकल्प को बरक़रार रखने में सफलता पाई है। तब से अब तक मैंने एक भी सिगरेट नहीं पी है। क्यूंकि मुझे पता है कि एक कश भी मुझे वापस इस खतरनाक नशे के पास पहुँचा देगा। यह हुई संकल्प की बात। 

कैसा लगा आज का लेख। क्या आपको संकल्प करने और उसे निभाने में सहायता मिलेगा। क्या होगा संकल्प इस साल। मुझे जरूर बताएं फेसबुक के माध्यम से। आपका सफर स्वास्थ्पूर्ण और मंगलमय हो इसी के लिए दुआ है मेरी। मिलते रहेंगे हर महीने आपके साथ इस नए साल में। 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

नमस्कार। अगले महीने हम २०२३ में पहुँच जाएँगे। इस शताब्दी में हमने बाइस वर्षों का सफर तय कर लिया। मुझे अभी भी याद है y2k का समय जब हम १९९९ से २००० में दाखिल हुए। सब कुछ बदल गया। तारीख लिखने का बदलाव आई टी संस्था को वाणिज्य का एक विशाल मौका प्रस्तुत कर दिया था। आई टी में नौकरी ज्यादा और सही ज्ञान और तजुर्बे वाला कैंडिडेट कम। 

इन २२ सालों में बहुत कुछ बदल गया है। और बदलेगा। काफी तेज़ बदलाव आएगा। इस निरंतर और द्रुत बदलाव से जूझने के लिए हमें तीन  तरकीबों  का प्रयोग करना पड़ेगा। 

पहला तरकीब है निराशा से जूझने का साहस और उपाय। भारतीय क्रिकेट टीम का टी २० विश्व कप से लेकर फुटबॉल वर्ल्ड कप में कई देश के नागरिक अपने देश के परिणाम से निराश हुए हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि कोई भी टीम किसी भी खेल में वर्ल्ड कप में अपने देश के प्रतिनिधि बन कर हारना नहीं चाहता है। देश के लिए खेलने का गर्व ही ऐसा होता है। इन परिणामों का विश्लेषण करते वक़्त हम केवल जीत या हार से मतलब रखते हैं। फैन की हैसियत से हमारा सोच भी एकदम सही है। परन्तु हम किस्मत का पचास प्रतिशत के प्रभाव को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। हम भूल जाते हैं कि पचास प्रतिशत का हिस्सा हमारे जीत में उतना ही शामिल है जितना कि हार के समय। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यवहारिक अर्थनीति के पिता ,डेनियल कहनेमान ने अपनी किताब thinking fast and slow में इस मुद्दे पर काफी चर्चा किया है। उन्होंने प्रमाणित किया है कि success = skills + luck और great success = skills + lots of luck . इस रिसर्च को दुनिया में विज्ञान के क्षेत्र में सबसे श्रद्धेय मैगज़ीन Science में जिक्र किया गया है। डेनियल कहनेमान का लॉजिक एकदम सहज है -कोई भी चैंपियन एक बार हार जाने से बुरा खिलाड़ी नहीं बन जाता है। चैंपियन वही कहलाता है जो कि अपने कैरियर में अधिकतर जीता है। कभी कभार उसे हार का सामना भी करना पड़ा है। हमें भी इस सोच के साथ ज़िन्दगी जीना चाहिए। इस बदलते हुए समय में हार या असफलता हमारे सफर का अभिन्न साथी रहेगा। चैंपियन की तरह हमें ज़्यादा समय सफल होना पड़ेगा। और इसके लिए प्रयास और खुद को निरंतर डेवेलप करते रहना अब मजबूरी बन गया है। पचास प्रतिशत हार -जीत का संभावना हमारे कंट्रोल में नहीं है। भगवद गीता का सबसे महत्वपूर्ण सीख इसी कारण मेरे लिए है -कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर इंसान।

दूसरा तरकीब है नई चुनौतिओं का निडरता के साथ मुक़ाबला करना। परिस्थितियाँ बदलती रहेगी कई कारण से। विश्व का राजनितिक पटचित्र पर हर वक़्त कोई ना कोई नया चित्र उभर रहा है। ग्लोबलाइजेशन की वजह से हमारे देश पर  इसका असर महसूस हो रहा है। हमारा देश भी इस उभरते हुए नई दूनिया में एक अहम् भूमिका निभा रहा है। इस परिस्थितिओं से जूझने के लिए हमें अपने सेल्फ कॉन्फिडेंस को बढ़ाने पर ध्यान देना पड़ेगा। इस सेल्फ कॉन्फिडेंस को बढ़ाने के प्रयास को सठीक तरीके से करने के लिए हमें एक ऐसे आदर्श को सामने रखना पड़ेगा जो कि हमें प्रोत्साहित करे। उनका नक़ल नहीं करना है। उनको अनुकरण करना पड़ेगा। उन पर नहीं उनकी काबिलियत और गुणों को समझ कर खुद को संवारना पड़ेगा। 

तीसरा तरकीब  है  अपने टेम्परामेंट  को इस बदलते हुए दुनिया से जूझने के लिए स्टेबल करना पड़ेगा।  जो कि सेल्फ कॉन्फिडेंस पर अधिक निर्भर है। अनिश्चियता भरी दुनिया में उतार चढ़ाव भरा सफर हर किसी को तय करना पड़ेगा। चलते वक़्त गिर कर जल्दी उठने वाले मुसाफिर का ही जीत का संभावना अधिक होगा। हार कर जीतने वाला ही बाज़ीगर कहलायेगा। 

आशा ,उम्मीद और प्रार्थना करता हूँ कि २०२३ में हम सब के लिए इस लेख में जिक्र किया हुआ पचास प्रतिशत का संभावना अधिक बार जीत या सफलता का हो। इसके लिए भाग्य के भरोसे रहना बिलकुल गलत होगा। निरंतर सेल्फ डेवेलपमेंट ही एक मात्र उपाय आगे की ज़िन्दगी आनंदमय बनने के लिए। 

दुआ करता हूँ इस साल के बाकी दिन मंगलमय हो। और नया साल हम सब के किये अब तक के ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन हो। खुश रहिएगा। 

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

नमस्कार। पिछले महीने हमने बापू की चर्चा की और यह समझने का प्रयत्न किया कि बापू का सीखने के प्रति क्या अंदाज़ हुआ करता था। यह महीना है बच्चों के विषय में चर्चा करने का। आखिर १४ नवंबर बाल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। आज हमारी चर्चा बच्चों पर होंगी। बच्चों के सीखने पर होंगी। 

कुछ वक़्त के लिए हम फ्लैशबैक  में चलते हैं अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं। आपको कितने बचपन के विषय में याद है। मुझे पाँच  साल के उम्र वाली एक घटना याद है। जिस दिन मेरा स्कूल का सफर शुरू हुआ था। इतना रोया था मैंने कि मैं स्कूल में नहीं रहूँगा। घर वापस चला जाऊँगा। मुझे स्पष्ट याद है कि "सिस्टर" (हम मिशनरी स्कूल में टीचर को ऐसे सम्बोधन करते थे) ने मुझे गोद में उठा लिया और मेरे माँ को आश्वत किया कि आप घर चले जाईये ,चिंता मत कीजिये। तीन घंटो के बाद वापस ले जाईयेगा। 

मैं क्यों रो रहा था। अनजान जगह और अनजान लोगों से मैं डर गया था। मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन के बाहर कम्फ़र्टेबल नहीं था। और हमने अपने भावनाओं को बिना किसी झिझक के ज़ाहिर किया। सिस्टर ने क्या किया ? उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया जो कि उचित नहीं है। जैसा की हम घर में करते हैं रोते हुए बच्चों को फुसलाने के लिए। चॉक्लेट का प्रलोभन के साथ बच्चे को चुप कराने का सहारा लेते हैं। बच्चे को पता चल जाता है और वह रो कर चॉकलेट की माँग करता है। सिस्टर मुझे प्ले रूम ले गई। तरह तरह के 'नए 'खिलौने जो मैंने कभी नहीं देखा था। रंग बिरंगे खिलौने। कोई भी खिलौने को छूने में कोई बाधा नहीं थी। कुछ और बच्चे भी मेरी तरह रोने से मुस्कुराहट की ओर सफर कर रहे थे। मेरा दिल लग गया। आज जब सोचता हूँ यह समझ में आता है कि वह प्ले रूम सीखने का एक तरीका और माध्यम था। 

आज एडल्ट बन जाने के बाद यह महसूस होता है कि हम कई बार अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर नहीं निकल पाते हैं क्योंकि हमारे पास कोई सिस्टर नहीं है जो कि जबरदस्ती हमें उठा कर प्ले रूम में ले जाता है क्योंकि उस कम्फर्ट ज़ोन से निकलना हमारे फायदे के लिए है। हम सब को अपनी ज़िन्दगी में एक ऐसे 'सिस्टर 'की जरूरत है जो कि हमें कम्फर्ट जोन से निकलने में मदत करता है अपना सहारा दे कर। यह इंसान कोई भी हो सकता है -दोस्त , भाई ,बहन , माता , पिता ,बुजुर्ग , ऑफिस कॉलीग। 

पहले दिन स्कूल के छुट्टी होने के बाद जब मुझे वापस पिताजी और माँ के हाथ में सौंप दिया गया तब मुझे एक अद्भुत एहसास हुआ - मुझे लगा कि स्कूल का समय बहुत जल्दी समाप्त हो गया -और कुछ समय स्कूल में बिताने के लिए मैं तैयार था। समय होता ही ऐसा है -कभी हिलता नहीं है और कभी पता भी नहीं चलता कि कब ख़त्म हो गया है। एक उदाहरण स्वरुप आप सहमत होंगे कि जो सिनेमा दिलचस्प होती है 'तुरंत' ख़त्म हो जाती है और कुछ में हम सो जाते हैं। जिसमें हमें आनंद मिलता है ,समय यूँ बीत जाता है। अन्यथा घड़ी का काँटा हिलता ही नहीं है। 

दूसरे दिन क्या हुआ ? हमारे घर में एक 'मौसी 'काम करती थी जो कि मेरा देख भाल करती थी क्योंकि मेरे माता पिता दोनों नौकरी करते थे। यह मौसी मुझे स्कूल के लिए तैयार कर रही थी। और मैं अस्थिर हो रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था कि मौसी कुछ ज़्यादा ही समय ले रही थी मुझे तैयार करने में। अगर मैं समय पर स्कूल ना पहुँच पाया तो क्या होगा ? दिल लग जाने पर हम वापस जाने के लिए आग्रही हो जाते हैं। क्या हम इस वक़्त अपने कर्मस्थान के विषय में उतना ही आग्रही हैं ? खुद को पूछिए। शायद नहीं। 

बचपन का एक और खासियत था निडरता -असफलता के प्रति। इसका सीधा प्रभाव था नए प्रयत्न करने में कोई हिचकिचाहट नहीं। लोग क्या कहेंगे इसका कोई डर नहीं था। जो अब बहुत अधिक मात्रा में दिमाग को नई ,अनजानी अनुभवों को प्रयास करने में बाधा पहुँचाता है। परन्तु हम सब के अन्दर वह बच्चा मौजूद है। उसको थोड़ा प्रोत्साहन दीजिए। अपनी निडरता के लिए। 

बचपन का एक और खासियत है उत्सुकता। किसी भी चीज़ के प्रति। और यही उत्सुकता हमें प्रोत्साहित करती है हमारी जिज्ञासा को। हम जानने की कोशिश करते थे। उम्र और जिंदगी के तजुर्बे की बढ़त के कारण हम या तो यह सोच लेते हैं कि हमें पता है या अधिक जानने की जरूरत नहीं है। यही चिंतन हमारे सीखने में बाधा बन जाता है। इसी कारण हमारे अंदर के बच्चे को मौका देना चाहिए ताकि हमारी उत्सुकता बरक़रार रहे और सीखना जारी रहे। 

कैसा लगा हमारा यह लेख वयस्क लोगों के बचपन के विषय में ? अगर आपके घर में बच्चे हों तो उनको प्रोत्साहित कीजिए नई चेष्टा के लिए। अपना निर्णय उन पर मत डाल दीजिये। दुनिया बदल रही है। परन्तु मन और दिल को बचपन का साथ निभाने दीजिये। आपको ज़िन्दगी से ज्यादा आनंद मिलेगा। जो कि हम सब चाहते हैं। सर्दी का मौसम का आनंद लीजिए और स्वास्थ का ख्याल रखिये। अगले महीने फिर मुलाकात होगी इस साल के अंतिम महीने में। 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

आज गाँधी जयंती के पावन अवसर पर आप सब को सादर प्रणाम। हमारे राष्ट्रपिता के विषय में हम सब को काफी सारी जानकारी प्राप्त है। बापू के ज़िन्दगी और दर्शन से हम सब को इतनी सीख मिलती है कई किताबेँ कम होगी सब सीख को इखट्टे करने में। मुझे एक प्रश्न कुछ समय से परेशान कर रहा था। बापू जैसे इन्सान जिनसे हर कोई प्रेरित होता है और सीखता है , वह खुद कैसे सीखते हैं ? उनका दर्शन क्या होता है खुद नई चीज़ें सीखने के विषय में। मैंने कुछ रिसर्च किया इस विषय में और मुझे गाँधी जी के सीखने का दर्शन उनकी इस  बात से स्पष्ट हो जाता है।   Live as if you were to die tomorrow; learn as if you were to live forever. ऐसे जिओ कि कल ज़िन्दगी का आखरी दिन हो सकता है ,परन्तु सीखो इस जोश के साथ और यह सोच कर की आप चिरंजीवी हो। सीखने का कोई अंत नहीं होता है। जीना है तो सीखना है। अगर यह सच है और हम इस बात से सहमत हैं ,तब हम सीखने का प्रयास क्यों नहीं करते हैं ? काफी अध्यन करते वक़्त मुझे एक मजेदार चिंतन के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। The Illusion of Explanatory Depth यह कहता है कि हम अपने इर्द गिर्द या प्रतिदिन प्रयोग करने वाले वस्तुओं के विषय में यह धारणा के साथ जीते हैं कि हमारी समझ काफी है। सच कुछ और होता है। आज से करीब 20 साल पहले अमेरिका के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के दो गवेषकों ने अपने कक्षा में मौजूद 200 से अधिक विद्यार्थिओं को पूछा कि उनको जिपर (zipper) के काम करने के  विषय में कितनी जानकारी है। अधिकतर विद्यार्थिओं ने अपनी जानकारी को एक से सात के मापदंड में ऊँचा दर्जा दिया। गवेषकों ने तब उनसे दूसरा सवाल पूछा -आप किसी और को ज़िप्पर कैसे काम करता है आपको समझाना पड़ेगा। अब आप बताईये आप खुद को कितना नंबर दीजिएगा। छात्रों ने अपने आप को पहली बार से काफी कम नंबर दिया। हम अपनी समझ को ऊँचा रेटिंग देते हैं ,यह सोच कर कि हमें मालूम है। यही हमारे निरंतर सीखने में सबसे बड़ा बाधा है। 

मैं एक आसान सत्य पर निर्भर हूँ। मैं क्या जानता हूँ मुझे पता है। मैं क्या नहीं जानता हूँ मुझे पता है। मुझे यह नहीं पता है कि मुझे क्या पता नही है। और इस दुनिया में जितना ज्ञान मौजूद है ,उसका ९९ प्रतिशत से ज्यादा ज्ञान तीसरे खाँचे में पड़ता है। जो मैं जानता हूँ ,किस हद तक जानता हूँ। काम चलाने जैसा या दूसरों को समझाने लायक। फर्क नहीं पड़ता अगर आप यह निर्णय कर लो कि आपको और अधिक जानना है। अपने कर्मक्षेत्र के लिए तो यह कहा जाता है कि जिस दिन आपने यह सोच लिया कि आपको सब मालूम है ,आपका पतन निश्चित है। 

जिज्ञासा सीखने का ईंधन है। बचपन में हम किसी भी नई वस्तु के प्रति आकर्षित बधाई होते थे अपनी उत्सुकता के कारन। नए प्रयास में कोई झिझक नहीं होता क्योंकि हमें असफल होने का डर नहीं होता था। उम्र और तजुर्बा के बढ़ने के साथ साथ हमारे अंदर 'असफल होने पर लोग क्या कहेंगे' के डर से हम प्रयोग करना और नए प्रयास करने से इतराते हैं। यह हमारे सीखने में बाधा साबित होती है। 

हम किससे क्या सीख सकते हैं सोच कर निर्णय ले लेते हैं कि किससे हम सीख नहीं पाएँगे। और यहीं पर एक बड़ी गलती कर बैठते हैं। हम अगर किसी से भी ,कहीं पर ,किसी भी वक़्त पर सीखने के लिए अपने आप को तैयार कर लें,हमें  सीखने से कोई रोक नहीं सकता। बच्चा , बूढ़ा ,सीनियर ,जूनियर , अपना, पराया , दोस्त या दुष्मन एक दूसरे से कुछ न कुछ ज़रूर सीख सकता है। 

दशहरा ,विजया दशमी और धनतेरस के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ। आपका जीवन मंगलमय हो ,इसी का प्रार्थना करूँगा। सीखते रहिए। लगातार। क्योंकि वही भरोसा देता है ज़िन्दगी भर का। मैं गांधीजी का कहना है।