गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

नमस्कार। अप्रैल के महीनें में आपका स्वागत। कई प्रदेश के लिए इस महीनें में नए साल का शुभारम्भ होगा ,उसके  लिए बधाई। व्यवसाय के लिए नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में नए टार्गेट्स और संभावनाओं के साथ प्लानिंग और जोश के साथ आगे बढ़ने का हौसला और विश्वास। 

ऐसी ही एक शुरुआत हुई थी १४ अप्रैल १९१२। टाइटैनिक जहाज़ का सफर। इतिहास कहता है कि टाइटैनिक इंजीनियरिंग का एक अजूबा था। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा जहाज़ ना इसके पहले बना था और भविष्य में भी ऐसा जहाज बनाना कठिन होगा। फिर क्या हुआ। टाइटैनिक पर बनी फिल्म करोड़ो का मुनाफ़ा कमा कर प्रसिद्ध हो गई। आप और हमने भी इस फिल्म को देखा होगा। फिल्म लव स्टोरी का एक मिसाल बन गई। परन्तु टाइटैनिक तो अपने पहले सफर में ही डूब गया। कुछ लोगों का सोच है कि टाइटैनिक डूब जाने के कारन और प्रसिद्ध हो गया। 

पर टाइटैनिक डूबा क्यों। एक मात्र वजह है अहँकार। यह सोचना कि हम अजेय हैं ,हमारा कुछ नहीं हो सकता है ,कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यही अहंकार हम सब का सबसे निजी दुश्मन है। हिंदी फिल्मों में विलन इसी कारन हीरो से पराजित हो जाता है। 

व्यवसाय कि दुनिया में ऐसे कई मिसाल है। अपने पड़ोस के मार्केट में आपको कई ऐसे दुकान मिलेंगे जो कि दो-तीन पीढ़ियों के बाद बंद हो जाते हैं। इसी दुकान पर एक समय ग्राहक कतार में खड़े होकर खरीदारी करते थे। बाजार और दुकानदार उनसे और उनकी कमाई पर ईर्ष्या करते थे। मैंने अपने रिश्तेदारों में ऐसा होते हुए देखा है। उनके पतन का मुझे तीन कारन दिखे हैं। पहला -अच्छा चल रहा है चलता रहेगा हमेशा। दूसरा -हमारे ग्राहक हमारे अलावा किसी और के पास नहीं जा सकता है। तीसरा -पहली पीढ़ी अपने मेहनत से व्यवसाय शुरू करती है, दूसरी पीढ़ी उसको और आगे बढ़ाकर मजबूत बनाती है ,तीसरी और उसके बाद आने वाली पीढ़ी व्यवसाय के विषय में आलसी और मस्ती करने में ज़्यादा मेहनत करती है। 

समय के साथ बदलते रहना व्यवसाय में टिके रहने के लिए अति आवश्यक है। और यहीं पर अपने आपको अजेय समझने वाले व्यवसाय गलती कर बैठते हैं। आपने तो नोकिआ मोबाइल फ़ोन के विषय में जरूर सुना होगा। शायद आपका शुरू के दिनों का मोबाइल फ़ोन भी नोकिआ ही रहा होगा। शुरू के दिनों में हमारे देश में दस में से सात लोग नोकिआ इस्तेमाल करते थे। परन्तु नोकिआ ने android के परिवर्तन को नज़र अंदाज़ किया। परिणाम क्या हुआ ? नोकिआ मार्केट के राजा से रंक बन गया। 

इसी महीने अमीरीकी राष्ट्रपति ने आयात -निर्यात के टैरिफ पर कई सारे निर्णय लिए हैं जिसके कारन सारे मुल्कों के अर्थनीति पर गंभीर प्रभाव पर सकता है। क्या यह कुछ देशों के लिए टाइटैनिक क्षण होगा। समय ही इसका जवाब देगा। अगर आप व्यवसाय में हो या नौकरी में हो ,आगे का समय कठिन ,परन्तु रोमांचकार होगा। टिके रहने के लिए बदलना और बदलाव दोनों आवश्यक है। यही ,इस वित्तीय साल का खासियत रहेगा। 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

नमस्कार। वित्तीय साल का आखिरी महीना। मार्च का महीना। अगले महीने से नयी साल की शुरुआत। आप में से कई लोगों ने फरमाईश की है कि खुद में बदलाव लाने का सबसे प्रमाणित तरीका क्या है। इस सिलसिले में आज का लेख है। उम्मीद करता हूँ कि आपको नए वर्ष में बदलाव लाने में यह मदत करेगा। 

इस सन्दर्भ में पहले यह बताना चाहता हूँ कि मैं जो तरीका बताने वाला हूँ वही एकमात्र तरीका नहीं है। यह तरीका मैंने खुद अपनाकर सफलता पाई है। इस तरीके की शुरुआत होती है अपने गोल को निर्धारित कर लेने के बाद। यही गोल किसी भी क्षेत्र में हो सकता है। जैसे पढ़ाई -लिखाई , कैरियर , स्वास्थ , निवेश , खेल-कूद , संपर्क -कुछ भी।  गोल निर्धारित करने के बाद हमें यह तय करना पड़ेगा की हम अपने प्रयासों के आधार पर आए हुए प्रगति का आकलन कैसे करेंगे। यह अति आवश्यक है। मैनेजमेंट के गुरु पीटर ड्रकर ने एक सहज बात हमें समझायी है -if you cannot measure , you cannot progress- अगर आप माप नहीं सकते हो तो आप अपनी तरक्की को कैसे समझोगे। 

गोल और प्रगति के मापदंड को निर्धारित करने के बाद आपको चार निर्णय लेने पड़ेंगे -continue -modify -include -discontinue -करते रहेंगे -करेंगे ,परंतु कुछ बदलाव के साथ ,शुरू करेंगे जो कि नहीं कर रहें हैं और त्याग देंगे उस आदत को जो कि जरूरी है। मैं एक उदाहरण के माध्यम से इसे समझाता हूँ। मान लीजिए आपको वज़न घटा कर और फिट बनना है। आपका गोल हो सकता कि तीन महीने के प्रयास के माध्यम से आप पाँच किलो वज़न कम कीजिएगा और अपने कमर का माप एक इंच से घटाइएगा। आपका प्रयास कुछ ऐसा हो सकता है। 

आप सुबह नाशते और डिनर में तीन-तीन रोटियां और सब्जी खाते हैं जो कि आप उसी प्रकार बरक़रार रखेंगे। दोपहर में ,ऑफिस के दौरान आप बाहर से खरीद कर कुछ चटपटा नाश्ता करते हैं जिसको आप थोड़ा बदल कर थोड़ा स्वास्थपूर्वक नाश्ता करने का निर्णय करते हैं। यह है आपका बदलाव के साथ आदत बरक़रार रखना। 

हर रात डिजर्ट के तौर पर आप एक मीठा खाते हो। आप इस मिठाई को तीन महीनों के लिए त्याग करने का संकल्प बनाते हो। और इस प्रयास में आप सफल होते हो। यह रहा आपका discontinue प्रयास। 

और हफ्ते में पाँच दिन आप 45 मिनटों में दो किलोमीटर पैदल चलोगे जो कि आप नहीं करते हो। यह बन जाता है आपका include प्रयास। इसके बाद आपकी सबसे बड़ी परीक्षा है आपका धैर्य। तुरंत आपको परिणाम नहीं मिलेंगे। परन्तु आपको निराशा को उत्तीर्ण करके लगे रहना पड़ेगा। इस विश्वास के साथ आपके निरंतर प्रयास से उम्मीद से बेहतर परिणाम मिलेगा। 

कोशिश कीजिए मेरे सुझाए गए फार्मूला को किसी भी क्षेत्र में। और मुझे लिख कर बताईये आपके सफल प्रयास के विषय में। होली के त्यौहार के लिए अग्रिम शुभकामनाएं। सावधानी के साथ आनंद लीजिए। बच्चों और बुजुर्गों का ख्याल रखिये। फिर मिलेंगे आपसे नए वित्तीय साल में। 


शुक्रवार, 31 जनवरी 2025

नमस्कार। २०२५ के एक महीना समाप्त हुआ। फ़रवरी का महीना सबसे ज़्यादा वैलेंटाइन्स डे के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह दिन अपने प्यार को स्वीकार करने और अभिव्यक्त करने के लिए जाना जाता है। मेरा आज का लेख एक दूसरे किस्म के प्यार का विषय है। 

हर साल हम २८ फ़रवरी को National Science Day के हैसियत से मनाते हैं। आपको पता है क्यों ? इस दिन 1928 साल में भारतीय भौतिक विज्ञान (फिजिक्स )के वैज्ञानिक सी वी रमन ने रमन एफेक्ट का खोज किया जिसके कारन उन्हे 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सी वी रमन की ज़िन्दगी हमारे लिए एक प्रेरणा है। उनकी कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि उन्होंने अपने कैरियर में शुरू से ही वैज्ञानिक बनने के लिए अध्यन नहीं किया। फिर विज्ञान के जगत में कैसे आ गए ? चलिए शुरू करते हैं उनके स्कूल की पढ़ाई से। 

केवल १३ साल के उम्र में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई समाप्त करके मद्रास यूनिवर्सिटी के तहत प्रेसीडेंसी कॉलेज से १६ साल के उम्र में अपना ग्रेजुएशन किया। उनका विषय था फिजिक्स और प्रेसीडेंसी कॉलेज के टोपर थे सी वी रमन। ग्रेजुएशन के दौरान उनका प्रथम रिसर्च पेपर छपा। विषय था diffraction ऑफ़ लाइट  (प्रकाश का विवर्तन ) 

एक साल के अंदर उन्होंने अपनी मास्टर्स की पढ़ाई ख़त्म की और कलकत्ता में इंडियन फिनांसियल सर्विस के दरमियान असिस्टेंट अकाउंटेंट जेनेरल की नौकरी शुरू किया १९ साल के उम्र में। वहाँ भारत के प्रथम रिसर्च इंस्टिट्यूट - इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस -में उन्होंने अकॉउस्टिक्स और ऑप्टिक्स पर रिसर्च किया। १९१७ में आशुतोष मुख़र्जी ने उन्हें पहला पालित प्रोफेसर ऑफ़ फिजिक्स नियुक्त किया राजाबाजार साइंस कॉलेज में जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन था। 

अपने पहले यूरोप सफर के दौरान उन्होंने भूमध्य (Mediterranean) समुद्र के नीले रंग को देख कर Rayleigh इफ़ेक्ट ऑफ़ scattered लाइट को गलत सावित किया। १९२६ में उन्होंने इंडियन जर्नल ऑफ़ फिजिक्स की स्थापना की। १९३३ में सी वी रमन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के पहले डायरेक्टर बने। उसी साल उन्होंने इंडियन अकडेमी ऑफ़ साइंस की स्थापना किया।  १९४८ में रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट की प्रतिष्ठा किया जहाँ वह अंत तक उन्होंने अनुसन्धान किया।  

सी वी रमन बचपन से ही दुबले पतले और शारीरिक क्षमता में कमजोर दिखते थे। परन्तु उनके मेधा का कोई सीमा नहीं था। उन्होंने अपने ग्रेजुएशन परीक्षा में ना ही प्रथम स्थान अर्जन किया , फिजिक्स और अंग्रेजी में यूनिवर्सिटी में सर्वोच्च नंबर पाया। मास्टर्स परीक्षा और अकाउंटेंट जनरल के लिए लिखे परीक्षा में भी उन्होंने प्रथम स्थान पाया। किसी भी किए हुए रिसर्च का असम्मान ना करते हुए , रमन रिसर्च के विषय पर औरअध्ध्यन करके उसको और बेहतर बनाना उनका प्रयास हुआ करता था। इसलिए Rayleigh इफ़ेक्ट को अध्ययन करके उन्होंने उस पर और रिसर्च किया और उसको आगे बढ़ाया। 

सी वी रमन का विश्वास था कि स्वर्ग ,नरक या पुनर्जन्म जैसा कुछ नहीं है। इंसान को एक ही ज़िन्दगी मिलती है और उसी में उसको सब कुछ हासिल करना है। मैं भी उनके विचारों से सहमत हूँ। आपके विचार क्या हैं ?

बुधवार, 1 जनवरी 2025

हैप्पी न्यू ईयर। 2025 हम सब के लिए मंगलमय हो ,यही प्रार्थना है ईश्वर से। १२ जनवरी स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन है। 1863 साल में उनका जन्म हुआ था। स्वामी जी युवा पर भरोसा रखते थे और उनका विश्वास था कि युवा ही किसी भी देश का भविष्यत होता है। इसी लिए १२ जनवरी विश्व युवा दिवस के नाम से मनाया जाता है। आज का लेख स्वामी जी का युवा पीढ़ी को दिया हुआ सन्देश पर है। १६२ साल के बाद भी उनका सोच अभी भी उपयुक्त हैं। 

उनका विश्वास था कि किसी भी देश के भविष्यत को उज्जवल बनाने के लिए युवा ताकत प्रमुख ईंधन है। धर्मो के विश्व संसद में 1893 में उन्होंने शिकागो में अपने भाषण में इस बात को दावे के साथ कहा था। उनका कहा हुआ एक पंक्ति युवा  पीढ़ी को ललकार रहा था -"Arise, awake, and stop not till the goal is reached."-जागिए ,उठिये और तब तक ना रुकिए जब तक आप मंज़िल ना हासिल कर लीजिए। 

स्वामी जी ने युवा पीढ़ी को साहस , ना हार मानने की मानसिकता , सच्चाई और अखंडता , और अपने आप पर संयम बढ़ाने की अपील की। उनका मानना था कि चारित्रिक अखंडता और संयम शिक्षा और materialistic उपलब्धिओं से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। खुद पर भरोसा और विश्वास ही ज़िन्दगी का मूल मंत्र है। 

स्वामी जी का अध्यन और शिक्षा पर सबसे अधिक भरोसा था। परन्तु उनके लिए शिक्षा रट के परीक्षा में नंबर लाने वाला विद्या नहीं था। उनके लिए शिक्षा संपूर्ण होना चाहिए जो कि दिमाग और आत्मा दोनों का सिंचन करती है। उनका मानना था कि शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य है इंसान का आत्मसम्मान ,आत्मनिर्भरता और अंदरूनी शक्ति को बढ़ाना। रट कर याद रखना इसका मूल उद्देश्य नहीं है। "Education is the manifestation of the perfection already in man." उनका दृढ़ विश्वास था कि युवा को सही शिक्षा प्राप्त होने पर वह खुद के लिए ,देश के लिए ,और इस दुनिया के लिए ऊचीं मंज़िलें हासिल कर सकता है। 

स्वामी जी युवा पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनने का आह्वान करते थे। उनके लिए हर युवा को निजी सोच पर भरोसा करना चाहिए। बाहरी चिंताओं और प्रलोभन से प्रभावित ना हो कर ,अपनी बुद्धि और अपने जजमेंट के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। उनके लिए युवा ही भविष्य में देश का लीडर बनेंगे जिसके लिए उन्हें स्वाधीन तरीके से और जरूरत पड़ने पर कठिन निर्णय लेने का क्षमता होनी चाहिए। 

स्वामी जी का विश्वास था कि ज़िन्दगी में सफल होने के लिए निडर होना आवश्यक है। ज़िन्दगी के सफर में कठिनाईओं, समस्यायों  और बाधाओं से जूझने के लिए साहस जरूरी है। ज्ञान अर्जन ,सामाजिक बाधाओं और आत्मनिर्भर बनने के लिए युवा पीढ़ी को निडर होना जरूरी है। "Be fearless, be brave, and you will succeed." डर किसी भी इंसान को अपने असली पोटेंशियल के उपलब्धि से रोकता है। असफल होने के डर से नए एक्सपेरिमेंट या प्रयोग का प्रयास ही नहीं करते हैं। बिना नए प्रयोग के ज़िन्दगी ही रुक जायेगी। यह उनका मानना था। 

इस नए वर्ष में क्या आप निडरता का साथ लेंगे ? मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है। 


मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

"मेरे करण अर्जून ज़रूर आएँगे। " एक लाचार माँ की उम्मीद एक हिट मूवी का सुपरहिट डॉयलोग। फिर यही फिल्म करीब ४० सालों के बाद फिर मूवी हॉल में दिखाया जायेगा। प्रोडूसर की उम्मीद कि दर्शकों को दुबारा या नयी पीढ़ी को इस फिल्म को देखने की इच्छा होगी। 

उम्मीद पर ही ज़िन्दगी टिकी हुई है। सबसे अहम् बात यह होती है कि उम्मीद पॉजिटिव सोच को प्रोत्साहित करती है। हर इंसान जीतने की उम्मीद करता है ,हारने का नहीं। कोई उम्मीद के साथ प्रार्थना करता है ,कोई प्रयास। जब हमारी उम्मीद किसी और के प्रयास पर निर्भर है तब हम प्रार्थना करते हैं। जैसे कोई बीमार होता है तो हमें डॉक्टर पर भरोसा करना पड़ता और हमारी प्रार्थना रहती है की डॉक्टर बीमारी पर विजय हासिल करेगा। परन्तु परीक्षार्थी को परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उम्मीद के साथ मेहनत करनी पड़ती है।  

अगर आप किसी भी टीम को नेतृत्व प्रदान कर रहे हो , आपकी उम्मीद पर पूरी टीम का मनोबल टिका होगा। इसीलिए आपकी जिम्मेवारी कहीं अधिक होता है टीम और ख़ुद के लिए। उम्मीद के लिए खुद पर और टीम पर विश्वास होना और रखना जरूरी है। विश्वास और काबिलियत उम्मीद का भीत होते हैं। किसी भी मकान के तरह मजबूत भीत जैसे मकान को मजबूत बनाती है ,विश्वास , काबिलियत और हौसला उम्मीद को मजबूत बनाती है। 

इसका तात्पर्य यह नहीं कि हर उम्मीद पर सफल होंगे। असफलता के साथ जूझना हम सब को सीखना पड़ेगा। ज़िन्दगी में हम कभी भी असफल नहीं होंगे ,इस उम्मीद के साथ जीना ही मूर्खता है। असफल होने पर भी हमारा मनोबल कमज़ोर नहीं पड़ेगा यह उम्मीद करना ज़िन्दगी को जीने में मदत करता है। 

विज्ञान और टेक्नोलॉजी निरंतर गति से आगे बढ़ रहें हैं। इस वजह से हमारी ज़िन्दगी बेहतर बनती जा रही है। कई बिमारिओं के इलाज में विज्ञान ने नई उम्मीद को जन्म दिया है। हमारे देश में अभी दुनिया की हर चीज़ मिलती है। और हमारी युवा पीढ़ी की सफलता हर क्षेत्र में हमारी उम्मीद बढ़ाती है कि हमारा भविष्यत सुरक्षित है। 

मेरा विश्वास और मानना है कि हमारी ज़िन्दगी सीमीत है। परंतु हम अपनी ज़िन्दगी को असीमित ढंग से जी सकते हैं। केवल इतना ही ख्याल रखना होगा कि हमारे आनंद किसी और के दुःख का कारण ना बन जाए। अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीने की उम्मीद ही हमारी ज़िन्दगी का मकसद होना चाहिए। क्योंकि इसी उम्मीद पर यह दुनिया टिकी हुई है। 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

नमस्कार। २०२४ के आखरी महीने में आपका स्वागत है। दिसंबर का महीना अगले साल के लिए तैयारी का महीना। नए साल में नए संकल्प के विषय में सोचना। २०२४ के लिए आपने जो संकल्प किया था उसमे आप सफल रहे या नहीं। मैं भी आंशिक रूप से सफल रहा। मैंने तीन संकल्प किये थे। दो संकल्प में मैं सफल रहा। एक संकल्प में मैंने आंशिक सफलता हासिल की। यह संकल्प था अपने स्कूल के मित्रों के साथ फिर से संपर्क स्थापित करना। 

आज मैंने पहले मित्र के साथ संपर्क स्थापित की। हम फेसबुक के माध्यम से जुड़े हुए थे कई सालों से। परन्तु इस साल मैंने उनके जन्मदिन के अलर्ट मिलने पर उनसे संपर्क किया और उसके फ़ोन नंबर मिलने के बाद बातचीत की। करीब चालीस सालों के बाद हमारी बातचीत हुई। हम स्कूल में सातवीं से दसवीं क्लास एक साथ पढ़ाई की थी। उसके बाद हमारे माता पिता के ट्रांसफर हो जाने के कारण हम दूसरे शहर चले गए। उसके चालीस साल बाद फिर बातचीत हुई हमारी। 

दोस्ती एक अद्भुत रिश्ता है। समय इसे कमजोर नहीं कर सकता है। मेरा तजुर्बा यही कहता है। इतनी याददाश्त बिना किसी प्रयास के वापस आ जाती है। कितने और दोस्तों के विषय में अपडेट मिला। कुछ गुज़र गएँ हैं। थोड़ा मन ख़राब हो गया यह जान कर। और हमने नए साल का संकल्प ले लिया। अगले साल हम अपने इस स्कूल का एक रीयूनियन करेंगे। हम अपने स्कूल जायेंगे और बीते हुए दिनों में खो जायेंगे। 

दोस्ती का रिश्ता ऐसा क्यों होता है कि समय उसको भूलने नहीं देता है। आपने कभी सोचा है इस विषय पर। मुझे लगता है कि दोस्ती का रिश्ता ऐसा तब ही होता है जब वह निःस्वार्थ होता है। जिसमे एक दूसरे से दोस्ती के अलावा और किसी स्वार्थ की उम्मीद नहीं होती है। 

एक और प्रश्न मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा है। क्या बचपन की दोस्ती ही ऐसी होती है। वयस्क जीवन में हुई दोस्ती क्या इतनी ही निःस्वार्थ होती है। स्कूल के बाद कॉलेज और उसके बाद जो दोस्त बने हैं उनके साथ रिश्ता कैसा होता है। मैं पिछले हफ्ते कॉलेज के एक मित्र के साथ मिला था। उससे बातचीत हो रही थी। इस दोस्त का विश्वास है कि हम हॉस्टेल में अगर कॉलेज के समय एक साथ रहते हैं तो दोस्ती और ज़्यादा गहरी और टिकाऊ होती है। यह दोस्त और हम एक साथ पोस्ट ग्रेजुएशन करते वक़्त दो साल हॉस्टेल में रहते थे। यह दोस्त ग्रेजुएशन के समय हॉस्टेल में नहीं रहता था। इसीलिए शायद उसका सोच ऐसा है। 

मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि सच्चे दोस्तों और दोस्ती का कोई विकल्प नहीं है। जितना आनंद दोस्तों से मिलने पर मिलता है उसका तुलना करना मुश्किल है। मैंने तय कर लिया है कि अगले साल जितने दोस्तों से मैं मिलना चाहता हूँ और जिनके साथ कई वर्षों से बातचीत या मुलाकात नहीं हुई है ,उनसे मिलने की कोशिश करूँगा। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ पुराने मित्र बदल चुके हों।  मुझे इससे कोई इतराज नहीं है। यह जानना भी एक अविष्कार होगा। मेरी सोच यह बताती है कि अपना समय ऐसे निवेश करो जहाँ आनंद मिलने का संभावना अधिक है। क्योंकि किसे पता कल हो ना हो। 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

नमस्कार। दिवाली की शुभकामनाएँ। उम्मीद करता हूँ कि आप सब का त्यौहार का समय अच्छा गुजरा है। छट पूजा के लिए भी आपको बधाई। इन त्यौहार के दिनों में हर कोई अपने तरीके से आनंद उठाता है। अक्सर इस सन्दर्भ में दूसरों के असुविधा को नज़र अंदाज़ करता है। इस साल अख़बारों कई खबरें प्रकाशित हुई हैं जिसमें रास्ते के कुत्तों को अस्पताल में दाखिल करना पड़ा क्यूँकि पठाकों के आवाज़ से उनकी तबियत ख़राब हो गयी थी। और यही हमारे लिए एक अहम् सीख है। 

१३ नवंबर पूरी दुनिया में world kindness day के हैसियत से मनाया जाता है। 1998 से यह मनाया जाता है। इस दिन समाज में हुए अच्छे काम को प्रदर्शित किया जाता है और लोग बिना किसी भेद भाव के मिलते हैं और दया और दूसरों के प्रति समानुभूति जिसे अंग्रेजी भाषा में empathy कहते हैं ,उसके महत्व पर आलोचना करते हैं ताकि इंसान एक दूसरे के भावनाओं का सम्मान करें और एक दूसरे के साथ सहानुभूति के साथ ज़िन्दगी बिताए। 

भावनाओं को समझ कर किसी के साथ पेश आना अभी इस वर्त्तमान समय के लिए सबसे बड़ी जरूरत है। कॉरपोरेट दुनिया में अभी मैनेजर पद के चयन के लिए EQ यानि Emotional Quotient को IQ यानि Intelligence Quotient से ज़्यादा महत्व दिया जाता है। कोई भी मैनेजर अगर औरों के भावनाओं को ना समझ सके उन्हें अपनी टीम से काम में स्वामित्व या ownership लाने में असुविधा होगी। 

हम अपनी भावनाओँ से वाक़िफ़ हैं। हमें पता है कि हमें क्या चाहिए या ना चाहिए। हमें क्या पसंद या नापसंद है। हमें ख़ुशी और गम के वजह पता है। परन्तु क्या हम दूसरों के लिए यह समझने की कोशिश भी करते हैं ? शायद जितनी जरूरत है उतनी नहीं। और इसी वज़ह से हम एक बुद्धिमत्ता से वंचित रह जाते हैं। अंग्रेजी में इसे emotional intelligence कहते हैं। आपको यह  बुद्धिमत्ता रिश्तों को सवारने में मदत करता है। कुछ लोग इस समझ का गलत प्रयोग भी करते हैं। manipulate या चालाकी से अपने हित में भावनाओँ का इस्तेमाल करना। जैसे राजा दशरथ को राम जी को बनवास के लिए भेजना पड़ा। 

हमारा सबसे कठिन बाधा जिसे हमें उपक्रम करना है कि हर इंसान को एक दर्जे का नहीं मानते हैं। अमीर ,गरीब ,मर्द ,औरत ,बच्चे ,बुजुर्ग ,धर्म ,जाती ,पेशा ,समाज में स्थान -इन  सब के आधार पर हम उनके साथ कैसा व्यव्हार करेंगे या किस तरह से पेश आएंगे , इसका निर्णय हम अपने दिमाग में कर लेते हैं। एक संरचना या structure बन जाता है हमारे मस्तिष्क में। जो इस संरचना में हमसे ऊपर है उनको समझने का प्रयास करते हैं। और जो हमसे नीचे है उनके भावनाओं को समझने का उतना प्रयास भी नहीं करते हैं। 

हमने अधिकतर परिवारों में मर्दों का अधिपत्य देखा है। घर के औरतों को मर्दों की जरूरतों को समझना और निभाना एक कर्त्तव्य का दर्जा प्राप्त कर चुका है। एक और पहलु होता है जब बहु सास बन जाती है। इसी कारन सास भी कभी बहु थी इतना मशहूर टी वी सीरियल बन गया था। 

अगर आप अपना emotional intelligence का प्रयोग करना चाहते हैं अपने रिश्तों को और मजबूत बनाने के लिए , तब आपकी शुरुआत होनी चाहिए हर इंसान को बिना किसी संरचना के साथ , अपने समान देखिये। उनको भी अपनी ज़िन्दगी और भावनाओं पर उतना ही अधिकार जितना कि आपका अपनों पर। भावनाओं को समझ कर उनके साथ पेश आईये और देखिए उनकी ओर से कैसा प्रतिक्रिया मिलता है। आप शायद उम्मीद भी नहीं कर पाएँगे। यही है emotional intelligence का सही प्रयोग। एक बार इसका चसका लग जायेगा तो आपकी ज़िन्दगी बदल जाएगी। यह मेरा दावा है। असंभव संभव हो जायेगा। आपको अपनी ज़िन्दगी से कई गुना आनंद मिलेगा जो शायद आप सोच भी नहीं सकते हो। करोगे या नहीं इसका निर्णय इस प्रश्न के जवाब के आधार पर लो। क्या आप चाहते हो कि लोग आपकी भावनाओं को समझकर आपके साथ पेश आए ?