बुधवार, 29 अप्रैल 2026

नमस्कार। मई का महीना हमारे देश के अधिकतर राज्यों में अत्यधिक गर्मी का मौसम लेकर आता है। गर्मी में हम दिन के वक़्त अकसर घर के अंदर समय बिताते हैं गर्मी और धूप से राहत पाने के लिए। परन्तु यह समय ज़्यादा अपने साथ बिताते हैं या परिवार के साथ?

15 मई को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1993 में इस दिन की घोषणा की थी और 1994 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा। उद्देश्य स्पष्ट था—समाज की सबसे छोटी इकाई, यानी परिवार, के महत्व को समझना और बदलते समय में उसकी भूमिका पर संवाद करना। लेकिन आज, जब हम इस दिन को मनाते हैं, तो एक सवाल भी हमारे सामने खड़ा होता है—क्या हम सच में परिवार के साथ हैं, या सिर्फ उसके डिजिटल संस्करण के साथ?

आज का दौर तकनीक का है। मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप—ये सब हमारे जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि केंद्र बन चुके हैं। परिवार के सदस्य एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन की दुनिया में खोए रहते हैं। एक समय था जब भोजन की मेज पर बैठना केवल पेट भरने का माध्यम नहीं था, बल्कि दिनभर की बातें साझा करने का अवसर होता था। आज वही भोजन अक्सर चुप्पी और स्क्रीन की रोशनी के बीच खत्म हो जाता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटल कंपनी ने हमारे रिश्तों की परिभाषा बदल दी है। दूर रहने वाले परिवार के सदस्यों के लिए यह वरदान है। वीडियो कॉल, मैसेज और सोशल मीडिया ने दूरी को कम किया है। लेकिन जब यही डिजिटल माध्यम पास बैठे लोगों के बीच दूरी बढ़ाने लगे, तब चिंता होना स्वाभाविक है।

असल चुनौती संतुलन की है। तकनीक से भागना समाधान नहीं है, लेकिन उसमें पूरी तरह डूब जाना भी खतरनाक है। परिवार के रिश्ते केवल ‘ऑनलाइन स्टेटस’ से नहीं चलते, उन्हें समय, संवाद और स्पर्श की जरूरत होती है। भावनात्मक जुड़ाव केवल इमोजी से नहीं बनता, वह आंखों की चमक और आवाज की गर्माहट से बनता है।

आज स्थिति यह है कि घर में चार लोग हैं, लेकिन चार अलग-अलग दुनिया में। माता-पिता काम के बाद मोबाइल में व्यस्त, बच्चे ऑनलाइन गेम या सोशल मीडिया में। ऐसे में “फैमिली टाइम” एक शब्द भर रह गया है, अनुभव नहीं। यह बदलाव धीरे-धीरे रिश्तों को खोखला कर रहा है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि आने वाले समय में डिजिटल कंटेंट और बढ़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस प्रवाह को और तेज करेगा। मनोरंजन, शिक्षा, संवाद—सब कुछ और ज्यादा स्क्रीन-आधारित होगा। ऐसे में परिवार के लिए समय निकालना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

यहीं पर जरूरत है सचेत निर्णय की। परिवारों को मिलकर तय करना होगा कि हफ्ते में या महीने में कितनी बार वे बिना किसी डिजिटल व्यवधान के साथ बैठेंगे। यह समय लंबा हो, यह जरूरी नहीं; लेकिन वह समय पूरी तरह एक-दूसरे के लिए हो, यह जरूरी है।

सोचिए, अगर सप्ताह में एक दिन भी ऐसा तय हो जाए जब पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाए, बातें करे, हंसे—तो यह छोटी-सी पहल रिश्तों में बड़ा बदलाव ला सकती है। बच्चों के लिए यह समय सीखने का होगा, बड़ों के लिए सुकून का, और पूरे परिवार के लिए जुड़ाव का।

परिवार केवल एक सामाजिक संरचना नहीं है, यह भावनाओं का संसार है। इसे बनाए रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। यह प्रयास किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सभी का होना चाहिए। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर यह ठान लें कि वे ‘डिजिटल डिस्टर्बेंस’ को कुछ समय के लिए दूर रखेंगे, तभी असली बदलाव आएगा।

आखिर में, जीवन की सच्चाई यही है कि यह सीमित है। लेकिन इस सीमित जीवन को हम अनमोल पलों से भर सकते हैं। ये पल न तो डाउनलोड किए जा सकते हैं, न ही रिकॉर्ड किए जा सकते हैं—इन्हें केवल जिया जा सकता है।

इस अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर, शायद हमें कोई बड़ा संकल्प नहीं लेना है। बस इतना तय करना है कि हम अपने परिवार के साथ कुछ वक्त सच में बिताएंगे—बिना स्क्रीन के, बिना किसी बाधा के।

क्योंकि अंत में, यादें वही बनती हैं जो दिल से जी जाती हैं, न कि जो स्क्रीन पर देखी जाती हैं। 

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