शनिवार, 3 नवंबर 2018

4 . 5 /9 . 0 क्या हो सकता है यह नंबर का तात्पर्य ? ५० प्रतिशत ? किसी विषय का आंकड़ा ? यह था सर्व निम्न पास मार्क्स मेरे पोस्ट ग्रेजुएट के प्रथम वर्ष से द्वितीय वर्ष में उत्तीर्ण होने के लिए। और मुझे उतने ही मिले थे। मेरे सात साथी को इससे कम मार्क्स मिलने के कारन एक सेमेस्टर की पढ़ाई दोहरानी परी थी। मैं गर्व के साथ एलान करता हूँ कि मैं अपने क्लास का पास करने वाले विद्यार्थिओं का अंतिम स्थान पर था। परन्तु मैंने ज़िन्दगी में आगे जाते हुए काफी सफलता अर्जन की है। आप इस वक़्त मेरा यह लेख पढ़ रहे हो , इतनी सफलता कितने लास्ट रैंक पाने वाले स्टूडेंट को नसीब होता है ?
मुझे क्या हो गया है कि मैं अपनी असफलता (अंतिम रैंक क्यूंकि लोग अपने प्रथम रैंक की चर्चा करते हैं ) की चर्चा कर रहा हूँ। दरअसल मैं एक पाठक का अनुरोध पर आज का चर्चा कर रहा हूँ।
नमस्कार। आप सब को दशहरे की बधाई। उम्मीद करता हूँ की नवरात्रि ,दुर्गा पूजा और दशहरा अपने ,अपनों के साथ धूम धाम से मनाया है। फेसबुक के माध्यम से इस विशेष पाठक ने मुझे परीक्षा में अच्छे और बुरे मार्क्स पर चर्चा करने का ज़िक्र किया। यह दूसरी बार इस पाठक के फरमाईश पर मैं इस लेख को पेश कर रहा हूँ। अगर आपकी कोई फरमाईश हो तो जरूर फेसबुक के जरिए मुझे बताए।
अच्छे और बुरे मार्क्स के सन्दर्भ में मैं पहली बात यह बताना चाहता हूँ कि आपका परीक्षा का मार्क्स परीक्षा के वक़्त आपका ज्ञान प्रदर्शित करता है। आपका उस विषय पर ज्ञान आपके परीक्षा में मिले मार्क्स के वनिस्पत बेहतर या बदतर भी हो सकता है।
दूसरी बात है कि विद्यार्थी के मार्क्स टीचर पर भी निर्भर करता है। कुछ टीचर अपने स्टूडेंट्स को यह अहसास कराना चाहते हैं की उनकी ज्ञान स्टूडेंट्स से कहीं अधिक है ,जो की अधिकतर विद्यार्थी के कम मार्क्स से प्रमाणित होता है। दूसरी ओर ऐसे भी शिक्षक हैं जो स्टूडेंट्स को सब्जेक्ट को और चाहने के लिए अच्छे मार्क्स द्वारा प्रोत्साहित करते हैं।
तीसरी बात है अभिभावकों का। मैंने हमेशा अभिभावकों को बच्चों को केवल यही पूछते सुना है -तुम्हे कितने नंबर मिले ? कभी यह नहीं सुना है पूछते हुए कि तुमने सीखा क्या है ? दरअसल माहोल ही अच्छे नंबर पाने वाले विद्यार्थी को बेहतर समझा है।
चौथी बात जो की हानिकारक है विद्यार्थी के लिए। अपने औकात के विषय में ज़्यादा समझ लेना केवल परीक्षा में मिले नंबर के कारन। ज़िन्दगी में आगे मैंने ऐसे कई ज़्यादा नंबर पाने वाले विद्यार्थी को काफी संघर्ष करते हुए देखा है अपने जीवन में। और मजे वाली बात है इनकी ईर्ष्या उन सहपाठी के विषय में जिन्होंने नंबर तो परीक्षा में कम पाया था लेकिन ज़िन्दगी में अधिक सफलता पाया है।
कुछ विद्यार्थी हैं जिनको पढ़ने में दिलचस्पी होती है और अपने सच्चे ज्ञान के कारन उनको हर परीक्षा में अच्छे नंबर प्राप्त होते हैं। कभी कभार किसी एक परीक्षा में नहीं। इस तरह के विद्यार्थी रिसर्च और पढ़ाने के कैरियर को ज़्यादा पसंद करते हैं। यह लेख उनके लिए नहीं है।
एक समय करीब २० -३० साल पहले जिस वक़्त स्कूल के बाद अच्छे कॉलेज में दाखिल होने के लिए बारहवीं क्लास का मार्क्स बहुत महत्वपूर्ण होता था। अभी भी है कुछ कॉलेज में दाखिल होने के लिए। फर्क इतना है कि पिछले शतक में कैरियर ऑप्शंस आज की तुलना में काफी कम थे।
क्या करना चाहिए विद्यार्थी को ? जिस परीक्षा के मार्क्स के जरिए आगे की पढ़ाई के लिए अच्छे कैरियर चॉइस मिलेंगे उन परीक्षा में अपने सच्चे ज्ञान के लायक मार्क्स लाने पड़ेंगे। हर विद्यार्थी को ९० प्रतिशत या उससे ज़्यादा मार्क्स नहीं मिलेंगे। मजे वाली बात यह है कि ९० प्रतिशत विद्यार्थी को ९० प्रतिशत से कम मार्क्स हासिल होंगे। मेरे दोनों बेटों को भी नहीं मिला है कभी। परन्तु दोनों बच्चों ने अपने इंटरेस्ट के अनुसार एक विषय को चुन लिया था , स्कूल में। और इस चुने हुए विषय पर उन्होंने हमेशा परीक्षा में अच्छे मार्क्स अर्जन किए। दोनों अभी विदेश में अच्छे यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं।
विदेश में पढ़ाने के तरीके अलग होते हैं। परीक्षा से ज़्यादा असेसमेंट होता है जिससे विद्यार्थी की समझ का अनुमान मिलता है , रट कर किताबी ज्ञान को याद रखने का नहीं। आपको थ्री इडियट्स फिल्म का वह दृश्य जरूर याद होगा जिसमे प्रोफेसर ने क्लास को पूछा था -मशीन क्या है ? और रैंचो का जवाब था वह सब जो कि इंसान का समय बचाये या ज़िन्दगी को बेहतर जीने में मदत करे। उसके बाद क्या हुआ था आप सबको याद होगा। अगर आपने फिल्म नहीं देखी हो तो ,ज़रूर देखें। मार्क्स महत्वपूर्ण जरूर हैं लेकिन कम मार्क्स पा कर भी सफलता मिली है अधिकतर लोगों को जब उन्होंने उस विषय को चुना जिसमे उनकी दिलचस्पी हो। फिर किताबें परीक्षा के लिए नहीं बल्कि नॉलेज के लिए पढ़ा जाता है।
धन्यवाद एक बार फिर क्लास के इस लास्ट रैंक प्राप्त किये हुए स्टूडेंट के लेख को पढ़ने के लिए। मैं आपके प्रोत्साहन का आभारी हूँ और रहूँगा भी। दीपावली और धनतेरस की शुभकामनायें। आनंद लीजिये और अपना और अपनो का ख्याल रखिए। 

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

नमस्कार। पिछले महीने मैंने ५० -५० पर मैंने चर्चा किया था। हम सब लोगों का किसमत ५० -५० होता है। जब सहायक होता है हम भूल जाते हैं कि किसमत साथ नहीं भी दे सकता था। प्रश्न यह होता है कि इस सन्दर्भ में इंसान क्या कर सकता है?
मैं उदाहरण स्वरुप इस साल दुबई में आयोजित एशिया कप क्रिकेट के विषय में चर्चा करूँगा। दो मैचों के विषय में बातचीत करूँगा -भारत बनाम अफगानिस्तान और फाइनल में भारत बनाम बांगलादेश। दोनों मैचों में कई आंकड़ें एक जैसे थे और एक महत्वपूर्ण फर्क था। दोनों मैच में भारत अपने प्रतिद्वंदी से क्रिकेट के विश्व रैंक में बहुत आगे था। दोनों मैच में प्रतिद्वंदी टीम ने पहले बल्लेबाज़ी की। और दोनों टीम ने ऐसा कोई स्कोर का टारगेट नहीं खड़ा किया जो की भारत के लिए मुश्किल हो। फर्क इतना था कि अफगानिस्तान के खिलाफ भारत ने अधिकतर सीनियर खिलाड़ी और कप्तान को विश्राम दिया। परन्तु फाइनल में पूरी टीम बांगलादेश के विरुद्ध मैदान में मुकाबला कर रही थी।
अफगानिस्तान का मैच टाई हो गया -यानि दोनों टीम के स्कोर बराबर थे ,मैच के अंत में। और इस मैच में करीब दो सालों के बाद भारत के सबसे सफल कप्तान टीम का नेतृत्व कर रहे थे। जिनके विषय में कई बार कहा जाता था कि वह सौभाग्य का सबसे प्यारा सुपुत्र है। हमारे पहले विश्व कप विजेता अधिनायक ने भारत के पहले टी -२० विश्व कप विजय के बाद मजाक में कहा था -मैंने भी १९८६ में शारजाह में आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में पाकिस्तान के विरुद्ध आखरी ओवर एक शर्मा को डालने के लिए दिया था जहाँ आखरी गेंद पर पाकिस्तान के बल्लेबाज़ ने छक्का मारा था और आज इस टी -२० फाइनल में पाकिस्तान के विरुद्ध आखरी ओवर भी एक शर्मा ने डाला। आज के कप्तान खुश किस्मत हैं कि पाकिस्तान का बल्लेबाज़ छक्का मारने के प्रयास में भारतीय खिलाड़ी को कैच दे डाला। -तो क्या हमारे क्रिकेट के इतिहास के सबसे सफल कप्तान केवल अपनी खुश -किस्मती के कारन सफल थे ? उन्हें कप्तान 'कूल ' का विशेषण क्यों दिया गया था ? कठिन परिस्थितिओं में वह विचलित क्यों नहीं होते थे ? हार या जीत हो मैच के अंत में वह मीडिया के सामने सदा मुस्कुराते हुए क्यों नज़र आते थे ? मेरा विश्लेषण उनके विषय में एक ही सिद्धांत की ओर ले जाता है -हमारे कप्तान कूल हारने से कभी नहीं डरते थे। उन्हें पता है कि हार -जीत खेल का एक अभिन्न अंग है। इसी लिए ना ही जीतने के बाद उन्हें किसी ने जरूरत से ज़्यादा सेलिब्रेट करते हुए देखा है ,ना ही बुरी तरह हारने के बाद उनके चेहरे पर मायूसी देखी है। अगर आपने गौर किया होगा हमारे कप्तान कूल विश्व कप जीतने के बाद टीम के हाथ में ट्रॉफी सौंप कर गायब से हो गए ! इस बार भी उन्होंने अफगानिस्तान की भरपूर प्रशंसा की उनके उमदा प्रयास के लिए। अगर भारत यह मैच हार भी जाता हमारा कप्तान विचलित नहीं होता। क्यूँकि उन्होंने ५० -५० के मूल चिंता को अपना लिया है।
अब चर्चा करते हैं फाइनल के विषय में। जब भारत ने अपनी पारी शुरू की बांगलादेश के विरुद्ध भारत को जीत के लिए प्रति ओवर पाँच रन से कम की गति से रन बटोरने थे। जो कि आज के टी -२० के युग में इस भारतीय टीम के लिए बाँये हात का खेल था। परन्तु बीच में भारत की पारी लरखरा गयी और अंत में भारत ने आखरी गेंद पर विजय हासिल किया। भारत के कप्तान ने राहत की साँस ली होगी। परन्तु भारत अंत में सफल क्यों हुआ ?क्या केवल भाग्य ने साथ निभाया ? जरूर निभाया।  परन्तु क्या भाग्य साथ निभा सकता अगर एक बल्लेबाज़ जो कि चोट के कारन पारी के बीच में मैदान छोर कर चला गया था , वापस अपने चोट के बावजूद वापस नहीं आ जाता अपने टीम की ज़रुरत के लिए ? हो सकता है कि इस कारन इस खिलाड़ी को पूरी तरह फिट होने में कहीं अधिक समय लग जाए। अगर यह बात सच हो जाए तो इस खिलाड़ी अपने भाग्य को कोसेगा या फाइनल जीतने के लिए धन्यवाद करेगा ? इस उदाहरण से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि हमें इंसान की हैसियत से तब तक बिना निराश हुए मेहनत करते रहना चाहिए। भाग्य को फिर हम हमें सहायता करने का मौका दे रहे हैं। नहीं तो भाग्य भी क्या करेगा।
कल हमारे राष्ट्र पिता का जन्मदिन है। आज हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। इसके लिए उनका और अनेक स्वतंत्रता सेनानी को सश्रद्ध प्रणाम।  उनके तरीके अलग हो सकते थे , लेकिन गोल एक ही था। और उन्होंने ५० -५० पर शायद भरोसा किया होगा। दशहरा का महीना।  आप सब को अग्रिम बधाई। खुश रहें। 

सोमवार, 3 सितंबर 2018

नमस्कार। इस वक़्त अख़बारों में चर्चा हो रही है हमारे देश की सफलता एशियाई खेलों में जो कि इंडोनेशिया में संपन्न हुआ। इतिहास में इस साल भारत ने अपने लिए सर्वाधिक पदक जीता। बेहद निराशा हुई जब पुरुषों और महिलाओं की हॉकी टीम पराजित हो गई। जब कि उन्हें मालूम था कि एशियाई खेल में स्वर्ण पदक हासिल करने पर ओलिंपिक खेलों में स्थान सुनिश्चित था। यह क्या भाग्य का विषय है। या नहीं।
इस सन्दर्भ में मैं आज थोड़ा चर्चा करना चाहता हूँ। इसी एशियाई खेलों में पहली बार ताश का खेल 'ब्रिज ' को अन्तर्युक्त किया गया। भारत के पुरुष और मिक्स्ड टीम्स ने ब्रिज में कांस्य पदक हासिल किया।  हमारे माननीय प्रधान मंत्री ने भी ट्विटर के माध्यम से टीम को मुबारकबाद किया। मैं भी ब्रिज में बेहद दिलचस्पी रखता हूँ। मेरे ब्रिज के कोच श्री सुमन सेनगुप्ता जी ने भाग्य के विषय में उम्दा एक बात कही है जो की मैं आपके लिए पेश करना चाहता हूँ। उनका कहना है कि भाग्य या किस्मत का साथ निभाना या ना निभाना हमेशा 50 -50 होता है। दरअसल जब किस्मत साथ होता है तब हम दूसरी संभावना (किस्मत साथ नहीं भी दे सकता था ) को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। परन्तु जब भाग्य साथ नहीं देता है तो हम अपने भाग्य को कोसते हैं और दूसरों के अच्छे भाग्य को ईर्ष्या करते हैं। मुझे यह अंदाज़ भाग्य का ,बेहतरीन लगा है और मैंने उस वक़्त से इसको अपना लिया है। इस दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण विषय है ५०-५० का एहसास जो कि 'सहायक ' भाग्य के समय याद दिलाता है कि भाग्य सहायक नहीं भी हो सकता है। और भाग्य सहायक नहीं तो कभी भी सहायक हो सकता है। एक ही सिक्के के दो पहलु। अगर शोले फिल्म का खोटा सिक्का (याद है आपको ) ना हो तो सम्भावना वही ५० -५० होता है।
इस संदर्भ में एक छोटी सी कहानी आपके लिए पेश कर रहा हूँ जो कि मुझे व्हाट्स अप के माध्यम से मिला है। एक व्यक्ति एक फ्रीजर प्लांट में नौकरी करता था। दिन के अंत में वह एक तकनिकी  खराबी को ठीक करने के लिए फैक्ट्री के अंदर जाता है। काम में मग्न हो जाने के कारण समय का अंदाज़ खो बैठता है। उनके अन्य सहकर्मी काम ख़त्म होने पर घर के लिए रवाना हो जाते हैं। इस व्यक्ति को यह बात तब महसूस होता है जब अंदर की बत्ती बुझ जाती है और दरवाज़ा बाहर से बंद हो जाता है। फ्रीजर प्लांट के अंदर उसके लिए बर्फ का एक कब्र बन चुका था। सुबह तक जीवित रहने की सम्भावना ना के बराबर थी। ना के बराबर ना कि ५० -५० ? भाग्य उसका साथ देगा या नहीं ? दो -तीन घंटों के बाद उसे किसीके चलने का आवाज़ सुनाई पड़ा। उसे कुछ उम्मीद नज़र आई। कौन आ रहा था इस वक़्त ? चंद मिनटों के बाद प्लांट का गार्ड उसके सामने खड़ा था उसको बहार ले जाने के लिए ! ५० -५० प्रमाणित हो गया। इस व्यक्ति ने पहले ऊपर वाले को याद किया ,धन्यवाद कहा और फिर इस गार्ड से पूछा -"तुम्हे कैसे पता चला की मैं अंदर हूँ ?किसने तुम्हे मेरे विषय में बताया ?" गार्ड ने जवाब दिया -"किसी ने नहीं बताया। इस प्लांट में करीब पचास लोग काम करते हैं। केवल आप ही एकमात्र ऐसे हो जो कि सुबह मुझे गुड मॉर्निंग हो और निकलते वक़्त गुड बाई बोलते हो। आज सुबह आपने गुड मॉर्निंग तो बोला था परन्तु मैंने गुड बाई तो नहीं सुना था। जिसके कारण मुझे संदेह हुआ और मैं आपको ढूंढने निकला। " जैसे बादशाह ने अपनी किसी फिल्म कहा था -ऐसी बड़े -बड़े शहरों ऐसी छोटी -छोटी बातें होती रहती हैं। ज़िन्दगी में दरअसल ऐसी छोटी -छोटी बातें ही बड़ी -बड़ी घटना को प्रभावित करती हैं !
आपको यह लेख पसंद आयेगा या नहीं ५० -५० चांस है मेरे लिए। आप मेरे साथ फेसबुक के माध्यम से मिलेंगे या नहीं ; वह भी ५० -५० है। आज नहीं तो कल आप मिलेंगे यही ५० -५० का मजा है। खुश रहिए और ५० -५० को अपना लीजिए। जीने का अंदाज़ बदल जाएगा। मेरा बदल गया है। 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

नमस्कार। कैसे हैं आप ? ब्लड प्रेशर कम हो सका दयालु बन कर ?याद है पिछले महीने हमने ज़िक्र किया था kindness के विषय में ? आज kindness के विषय में आगे चर्चा करूँगा जैसा मैंने वादा किया था। 
"Kindness is education of the heart "- कहना है दलाई लामा का। बहुत बड़ी बात कही है उन्होंने। दयालु बन कर हम अपने दिल को शिक्षा देते हैं। क्यूँकि दयालु बनना दिल से होता है। 
अजह्न ब्रह्म जो कि एक बुद्धिस्ट साधु हैं अपनी किताब "Kindfulness " में लिखा कि mindfulness और kindness किसी भी इंसान के लिए दो पंख हैं जो कि उसे शांति और आनंद का उड़ान भरने में मदत करते हैं। mindfulness -यानि की दूसरों के विषय में सजग रहना दयालु बनने में मदत करता है ?
क्या kindness सीखा या सिखाया जा सकता है ? University of Wisconsin के Dr Ritchie Davidson का रिसर्च प्रमाण करता है कि weight training की तरह किसी भी व्यक्ति का "compassion muscle " बढ़ाया जा सकता है। गजब कहा है उन्होंने। अगर आपको muscle बढ़ाना हो तो आप क्या करते हो ? कठिन परिश्रम जिम में जहाँ आप तरह -तरह के वज़न लगातार उठाते हो। उसी तरह आप अगर compassion के साथ दूसरों के साथ पेश आओगे तो आपका दूसरों के दर्द को समझ कर उनके साथ व्यवहार में बदलाव आएगा। 
दयालु बनने के लिए आपको दूसरों का ध्यान रखना आवश्यक है। जब हम दयालु बनते हैं तो हम दूसरों को महसूस करवाते हैं की वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है। 
हम अपने दैनिक जीवन में क्या कर सकते हैं कि लोगों को एहसास हो कि वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है। अगर आप एक लिफ्ट में सवार हो। लिफ्ट एक मंजिल पर रुकती है। एक अनजान व्यक्ति लिफ्ट के अंदर आता है। उनको wish करो। आपके हेलो बोलने से उनको और आपको दोनों को अच्छा लगेगा। 
कोई रास्ते में भटकता हुआ दिख रहा है। आगे बढ़कर उनकी मदत कीजिए। कोई कुछ कहने की कोशिश कर रहा है ;बिना टोके उन्हें बोलने दीजिए। आप एक लम्बे कतार में खड़े हैं। कोई भागता हुआ आता है और अनुरोध करता है आगे निकलने के लिए क्यूँकि उसका फ्लाइट आपसे पहले है ;जाने दीजिए। आप कहीं गलत हो। सॉरी बोलो चाहे जिसको आप सॉरी बोल रहे हो आपका अनुज हो। ऑफिस में ,जीवन में उन लोगों से उनका नाम पूछो ,जिनको कोई नहीं पूछता है। बिल्डिंग का सिक्यूरिटी ; कचरा साफ़ करने वाला ; रिक्शा वाला -उन्हें महसूस होगा कोई तो उसको पूछता है। लोग दूसरों की निंदा और चर्चा करने में मशगुल हैं ; चुप रहिए। किसी को अगर आपने क्षमा किया है तो भूल जाईये ,दोबारा उसका ज़िक्र मत कीजिए। 
दयालु बनते वक़्त वापसी उम्मीद रखना इंसान को दयालु बनने से रोकता है। जब आप दूसरों को यह सन्देश देते हो अपने व्यवहार से कि आप हमारे लिए मायने रखते हो ,तब ऐसी उम्मीद करना कि वह भी आपके विषय में उसी तरह पेश आएंगे गलत होगा। 
गीता में लिखी बात याद आ जाती है -कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर इंसान -यही मूल मंत्र है दयालु बनने का। बन कर देखिए। ज़िन्दगी आपको कहीं अधिक से ज़्यादा वापस देगी। खुश रहिये। अपनों और सबका ख्याल रखिये। दयालु बन कर ज़िन्दगी का आनंद लीजिए। मेरे साथ फेसबुक पर वार्तालाप करके मुझे आनंद दीजिए। 

नमस्कार। जून के महीने में मैंने आपके साथ सेल्फिशनेस की चर्चा की थी। हमने आम को छुपा कर खाने का ज़िक्र किया था =selfishness के विषय में चर्चा करने के लिए। इस लेख का निष्कर्ष था कि सेलफिश या स्वार्थी होना एक इंसान के लिए स्वाभाविक है। स्वार्थी होना ,अर्थात अपने और अपनों के विषय में सोचना और उसको ज़्यादा महत्व देना। इस स्वार्थ का परिधि अगर हम बढ़ाकर और लोगों को अपनालें तो स्वार्थी होने के बावजूद हम दुनिया में अपना एक अच्छा प्रभाव छोड़ सकेंगे। i next पत्रिका में इस लेख के प्रकाशित होने के ठीक एक हफ्ते बाद एक अंग्रेजी दैनिक में मैंने एक लेख पढ़ा kindness के विषय में। उस लेख को मैंने संभाल के रखा है ,आपके लिए। क्योंकि उस लेख का मूल सन्देश हमारे selfish होने के लेख का अगला कदम है। आज और अगले महीने मैं उस अंग्रेजी अख़बार में प्रकाशित kindness के विषय में लेख से मिले सन्देश को आपके लिए पेश करूँगा।
बारिश का मौसम है। आप घर से बाहर रास्ते पे हो। ज़बरदस्त बारिश हो रही है। आपके पास रेनकोट और छतरी दोनों है क्योंकि आप बारिश के लिए प्रस्तुत हो। रास्ते में एक गरीब इंसान बारिश में भींगकर कांप रहा है। आपको उसको देखकर और उसके हालत को समझकर भी नज़र अंदाज़ करते हो -यह सेल्फिश व्यवहार है। आप उसको अपना छतरी दे देते हो -यह kindness है। kindness- यानि दूसरों को अपना समझ कर निर्णय लेना। है ना पिछले लेख का अगला कदम ?
kindness का हिंदी अनुवाद है दयालु। मेरी परिभाषा है हर इंसान की इज़्ज़त करना और उनके साथ वैसा व्यवहार करना जो कि आप औरों से खुद उम्मीद करते हो।
पूरी दुनिया में इस विषय में काफी चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि लंबी उम्र जीने के लिए अपने जीवन में kindness का मिश्रण जरूर करें। कुछ दिन पहले मुंबई में छोटे हवाई जहाज का एक्सीडेंट हो गया। हवाई जहाज में सवार चार व्यक्ति और एक बनती हुई बिल्डिंग में काम करता हुआ मजदूर इस हादसे में मारा गया। मुझे इस विषय में सूचना मिली व्हाट्स एप्प के माध्यम से जिसमे किसी ने उस जलते हुए मजदूर के दर्दनाक दृश्य को वीडियो रिकॉर्डिंग किया। जिस इंसान ने यह वीडियो रिकॉर्डिंग किया उसको मैं धिक्कारता हूँ। एक इंसान की हैसियत से आप कैसे के दुसरे इंसान को जलते देखते हुए उनका वीडियो बना सकते हो ?कितना निष्ठुर हो गए हैं हम ? मैं शत -प्रतिशत दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह व्यक्ति जिसने यह वीडियो बनाया है अपने आप पर गर्व कर रहा होगा कि उसने दुनिया को इस हादसे का वीडियो दिखाया। सोचिये अगर उस मजदूर की जगह वह विमान इस व्यक्ति पर गिरता तब क्या वह चाहता की दुसरे लोग जो वहाँ उस वक़्त मौजूद थे उनका वीडियो बनाये ?हरगिज़ नहीं। आज टेक्नोलॉजी हाथ में आ जाने के कारण हमारी मानविकता को हमने अपने दिमाग के पीछे धकेल दिया है जिसके कारन हम काफी हद तक नृशंष बन गए हैं।
डॉ डेविड हैमिलटन ने अपनी किताब "five side effects of kindness "ने चर्चा किया है charles darwin के प्रसिद्द सत्य  के विषय में -"survival of the fittest ". डॉ हैमिलटन का सुझाव है कि इस को थोड़ा सा बदल कर हम आगे के लिए विश्वास करें -"survival of the kindest "डॉ हैमिलटन का रिसर्च कहता है कि kindness का प्रभाव इंसान के ब्रेन में एक नशे जैसा प्रभाव करता है जिसको उन्होंने "helpers high "का नाम दिया है। इसके कारन ब्रेन में dopamine की मात्रा बढ़ जाती है और इंसान को अधिक ख़ुशी मिलती है। डॉ हैमिलटन का कहना है कि kindness एक ऐसी दवा है जो कि इंसान का ब्लड प्रेशर घटाने में मदत करती है। अगर आप जवानी बरकरार रखना चाहते मायने हो और सदा अपने चेहरे पर जवानी का एक खुशी ज़ाहिर रखना चाहते हो तो kindness का सहारा लो -यह डॉ हैमिलटन का सुझाव है -आपके और हमारे लिए।
क्या kindness सिखाया जा सकता है ? हम क्या कर सकते हैं इस सन्दर्भ में ?यह चर्चा करेंगे हम अगले महीने। तब तक केवल इतना ख्याल रखिये कि kind होना अर्थात दूसरों को समझाना कि आप मेरे लिए महत्वपूर्ण हो। जैसा कि आप सब पाठक मेरे लिए !

शुक्रवार, 1 जून 2018

नमस्कार। आम का मौसम कैसा चल रहा है ?कभी आपने आम छुपा रखा है अकेले में खाने के लिए ? ऐसा करने से क्या आप स्वार्थी कहे जाएंगे ? आज का विषय है स्वार्थी यानि selfish -एक पाठक के अनुरोध पर। जिस पाठक ने मुझे स्वार्थी के विषय पर लिखने का अनुरोध किया है ,क्या यह एक स्वार्थी इंसान का परिचय है ? शुरू करते हैं परिभाषा के साथ।
selfish शब्द को तोड़ देते हैं -self और ish -ish को अगर हम ईश्वर का ईश समझे तो संधि विच्छेद कहता है कि जो इंसान self यानि खुद को ईश्वर (ish )समझता है , selfish है। इसका तात्पर्य होता है कि मैं अपनी बात पहले सोचूंगा ,फिर दुनिया के विषय में। अंग्रेजी में कहते हैं -i ,me और myself के बाद और कोई।
स्वार्थी होना हर इंसान का प्राकृतिक या नेचुरल स्वभाव होता है। इसमें कोई गलती नहीं है। सोचिये जन्म के बाद कोई भी बच्चा अपनी माँ को पाने के लिए कुछ भी करता है। है ना ?क्या वह स्वार्थी नहीं है ? उसे अपने माँ की हालत की कोई परवाह नहीं। जब भूख लगे माँ का दूध चाहिए ;चाहे माँ किसी भी परिस्थिति में हो। तो हम जन्म से स्वार्थी हैं। तो फिर स्वार्थी होना अच्छा है या बुरा ? हम क्यों स्वार्थी लोगों को नीचा दिखाने का कोशिश करते हैं ?
मैं समझता हूँ कि इंसान को स्वार्थी होना जरूरी है। अच्छा है। मैं विश्वास करता हूँ कि स्वार्थ हमें सफलता हासिल करने में मदत करता है। एक उदाहरण देता हूँ। एक विद्यार्थी अपने पढ़ाई को आगे बढ़ाने के लिए अपने आप को घर एक कमरे में बंद कर लेता है। यह स्वार्थ का विषय है। परंतु इससे विद्यार्थी को सुविधा होती है अपने पढ़ाई को मनयोग के साथ करने में।
आपने Agnes Gonxha Bojaxhiu का नाम सुना है ? Macedonia में 1910 इनका जन्म हुआ। 1928 में इन्होने अपना घर छोड़ दिया। इनके पिताजी जो कि एक छोटे से दुकान के मालिक थे और उनके परिवार के अन्य सदस्य पूरी तरह निराश हो गए और उन्हें गहरा दुःख पहुँचा। क्या इस 18 वर्ष के उम्र वाली बच्ची ने स्वार्थी इंसान का परिचय नहीं दिया ? जरूर दिया। काश उन्होंने स्वार्थ का सहारा लिया अपने घर को छोड़ने का। नहीं तो यह दुनिया वंचित हो जाती मदर टरेसा को ना पा कर !
हम स्वार्थी बनते हैं अपने लिए ,अपनों के लिए। इसमें कोई गलती नहीं है। मैं समझता हूँ कोई भी इंसान स्वार्थी बनता है परिस्थितिओं के कारन। केवल ख्याल रखना है एक विषय का। मेरा स्वार्थ किसी दूसरे का नुकसान तो नहीं कर रहा है ? अपने बचपन का एक घटना याद आ गया। स्कूल में मेरी टक्कर अपने तीन सहपाठी के साथ था क्लास में प्रथम स्थान के लिए। हम चार में एक कभी अपना क्लास नोट्स दूसरों को नहीं देता था। कारन उसका क्लास नोट्स सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। क्या यह स्वार्थी होने का परिचय है। नहीं। यह कॉम्पिटिटिव होने का अंदाज़ है। कई लोग इसे स्वार्थ की परिभाषा देंगे। यह गलत है। 
तो क्या स्वार्थी होना अच्छा है या बुरा ? मुझे एक लेक्चर याद आ रहा है जो कि एक इंजीनियरिंग गुरु ने दिया था हमारे रोटरी क्लब में। रोटरी का कहना है -service above self -गुरु ने इस सन्दर्भ में बताया कि यह संभव नहीं है क्योंकि इंसान का जन्मगत व्यवहार है स्वार्थी होना। तो फिर इंसान -service above self -करेगा कैसे ? फिर उन्होंने एक फार्मूला बताया जो कि मेरे ज़हन में सदा के लिए जगह बना लिया है। गुरु जी ने कहा कि हम स्वार्थी होते हैं अपने और अपनों के विषय में। इसमें कोई दो राय नहीं है। उनका कहना अपने इस स्वार्थ के परिधि को विस्तृत करो। ताकि और लोग इसमें समां जाए। फलस्वरूप आप और अधिक लोगों के लिए स्वार्थी बनोगे। अगर हर इंसान इस अंदाज़ में सोचे तो दुनिया बदल सकती है। है ना ?
आपका क्या ख्याल है? निःस्वार्थ के साथ शेयर कीजिए फेसबुक के माध्यम से। आखिर हम सब स्वार्थी हैं ;रहेंगे ;केवल कितनो को अपना लेते हैं अपने स्वार्थ के परिधि में ; यही फर्क है हममे और मदर टेरेसा में। उन्होंने लाखों इंसान का ज़िन्दगी बदल दिया स्वार्थी बन कर। हम क्या करेंगे ? निर्णय केवल हम ही ले सकते हैं। 

शुक्रवार, 4 मई 2018

नमस्कार। देखते ना देखते नए आर्थिक साल का एक महीना गुज़र गया है। समय कभी -कभी ज़्यादा ही जल्दी भागता रहता है। ज़्यादा जब आपको दिन में २४ घण्टे से ज़्यादा समय ज़रुरत हो। कब ज़रुरत होता है अधिक समय ?जब कि आप के पास अधिक मौके हो। अधिक मौके कब होते हैं जब कि आपके पास कॉन्फिडेंस हो। आज मैं ,अपने एक पाठक के फरमाइश पर अपने कॉन्फिडेंस को कैसे बढ़ा सकते हैं ,उस विषय पर चर्चा करूँगा। विशेष रूप से आज के युवा पीढ़ी का। जो कि ज़िन्दगी के दौर में जल्दी उलझ जा रही है। मैं अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिए तीन मंत्रो पर विश्वास रखता हूँ।
पहला -हम किसी से कम नहीं -इस दुनिया मुझसे ज़्यादा काबिल और बेहतर इंसान ज़रूर मौजूद हैं। यह भी सच है कि मुझसे कम काबिल और बदतर इंसान भी जरूर मौजूद हैं। कितने लोग हमसे बेहतर हैं और कितने बदतर ,किसी को भी नहीं पता। परन्तु हमारी ज़िन्दगी बीत जाती है अपनी तुलना दूसरों के साथ करके। और हमारा कॉन्फिडेंस कमजोर बन जाता जब हम अपने आप को किसी के तुलना में बदतर समझते हैं। हम उनसे ईर्ष्या करते हैं। कभी यह सोचने का प्रयास नहीं करते हैं कि अगर कोई हमसे बेहतर है तो क्यों है ? हम इससे जितना चिंतित होते हैं ;किसी ऐसे इंसान से मिलकर जिनसे हम खुद मिलते हैं ; हम आनंदित नहीं होते हैं। एक उदाहरण लीजिए। हमारे बॉलीवुड के बादशाह ने कई बार इंटरव्यू में कहा है कि उनसे ज़्यादा लम्बा ;ज़्यादा ख़ूबसूरत ;ज़्यादा काबिल बॉलीवुड में विरजमान हैं ;लेकिन कई लोगों को उनके जैसा सफलता नहीं मिली है। उनके सफलता के केवल दो कारन हैं -खुद पर विश्वास और कड़ी मेहनत करने की क्षमता।
दूसरा -कोई भी परफेक्ट नहीं है। हो भी नहीं सकता है। हर इंसान में कोई न कोई प्रतिभा है ;कोई न कोई खामी है और ज़रूर कोई मजबूरी है। मेरा तजुर्बा यह कहता है कि लोग दूसरों की प्रतिभा और अपनी खामिओं से ज़्यादा वाकिफ हैं। दूसरों की प्रतिभा से अपनी तुलना कर अपना कॉन्फिडेंस कम कर लेते हैं। हर कोई विद्वान नहीं बन सकता है। क्लास का फर्स्ट बॉय का तात्पर्य यह नहीं है कि बाकी के ज़िन्दगी में भी वह फर्स्ट आएगा या क्लास के नीचे रैंक करने वाले उनसे ज़्यादा सफल नहीं होंगे। मैं अपने क्लास का लास्ट बॉय हूँ। जो लोग मुझे काम के सिलसिले में मिले हैं ;सोचते हैं कि मैं मजाक कर रहा हूँ ;जब मैं यह बात छेड़ता हूँ। क्यों ?क्यूंकि मेरे कॉन्फिडेंस को देखकर उनको यह विश्वास नहीं होता है। मैंने क्या किया ?एक ऐसा विषय चुना जो कि मेरे दिल के करीब है। जिस विषय पर चर्चा करना या काम करने में मुझे आनंद मिलता है। और जिस विषय को  मेरा अपना प्रतिभा मदत करता है। मेरे दोनों बेटों ने भी अपने दिलचस्पी वाले विषय को अपने करियर में बदलने का निर्णय लिया है। मूल बात है कि अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिए अपना प्रतिभा और दिलचस्पी वाले विषय को अपना बनाइए। आप जो भी कर रहे हो उससे अगर आपको आनंद मिले ;तो आपका कॉन्फिडेंस खुद ब खुद बढ़ जायेगा।
तीसरा -असफलता से डरना -ऐसा कोई इंसान नहीं है जो कि ज़िन्दगी में असफल ना रहा हो। यही ज़िन्दगी की रीत है। और उसी से हम डरते हैं। हमारा कॉन्फिडेंस इसी डर के कारन कमजोर बन जाता है। हम ज़िन्दगी में कोई नए काम को हासिल करते हैं तो हमारा अपने आप पर कॉन्फिडेंस बढ़ता है या नहीं ? जरूर बढ़ता है। लेकिन हम प्रयास नहीं करते हैं। क्यों ?अगर असफल हो गए तो लोग क्या कहेंगे ?यही हमारी चिंता रहती है। इससे अपना कॉन्फिडेंस घटता है और हम अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने का मौका गवां देते हैं। छोटा सा उदाहरण -पब्लिक स्पीकिंग -यानि कुछ लोगों के सामने अपना विचार रखना। कभी न कभी तो पहला बार होगा। आप शायद स्टेज पर नर्वस भी होंगे। लेकिन एक बार आप सफल हो गए तो आपको कैसा महसूस होगा? खुद पर विश्वास बढ़ेगा या घटेगा ? मुझमे भी यही प्रोब्लेम था -असफलता से डर लगता था। लोग क्या कहेंगे। इस पर ज़्यादा ध्यान रहता था। ना कि अपनी काबिलियत पर। एक दिन किसी अनुभवी इंसान ने मुझे समझाया। मैंने कोशिश की। और मैं बदल गया। मैं ज़िन्दगी भर उनका आभारी रहूँगा क्योंकि मुझे अपने आप में इस बदलाव को लाने के बाद ज़िन्दगी से कई गुना ज़्यादा आनंद मिलने लगा है। नए विषय पर विजय पा कर अपना कॉन्फिडेंस लगातार बढ़ाता रहता हूँ। मैंने बहुत असफलताओं का सामना किया है। परन्तु हर असफलता ने मुझे ज़िन्दगी में सफलता से ज़्यादा सीख दिया है -मैं अब असफलता से डरता नहीं हूँ। और यही मेरे कॉन्फिडेंस का मूल मंत्र है।
मैं इस लेख में अपने आप को सफल तभी समझूंगा जब आप मुझे फेसबुक के जरिये अपना विचार व्यक्त करेंगे इस लेख के विषय में। आप मुझे किसी विषय पर लेख लिखने का फरमाइश कर सकते हैं। जैसा किसी पाठक ने किया है -जो कि मेरा अगले महीने का विषय रहेगा -selfishness
इंतज़ार करूँगा आपके विचारों का।