शुक्रवार, 31 मई 2019

नमस्कार। गर्मी का मौसम हमारी एनर्जी को घटा देता है। एनर्जी घट जाने के कारण हमारा प्रयास कमजोर बन जा सकता है। और यही हमारी असफलता का वजह हो सकता है। पिछले महीने से मैंने असफलता या फेलियर के विषय पर चर्चा शुरू किया है। जिन्होंने पिछले महीने का लेख नहीं पढ़ा है उनके लिए मैंने दो सीख के विषय में अवगत कराना चाहता हूँ. पहली सीख थी कि असफलता की परिभाषा आपके लिए क्या है ? दूसरी सलाह यह थी कि हमें अपने काबिलियत के 'अंदर 'रहते हुए अपने  कम्फर्ट जोन के 'बहार 'निकलने का प्रयास करना पड़ेगा।
मेरे पिछले महीने के लेख को पढ़कर एक पाठक ने फेसबुक के माध्यम से एक दिलचस्प प्रश्न किया है -"जब हम अपने से बेहतर और काबिल किसी भी इंसान से मिलते हैं ,तब हमें मोटिवेशन तो मिलता है परन्तु उनकी तुलना में अपने आप को छोटा लगता है जिसके कारण अपना कॉन्फिडेंस घट जाता है और हम फेलियर की ओर कदम रखते हैं। " धन्यवाद आपको इस प्रश्न के लिए। आपके प्रश्न से तीन बातें उभर कर आती हैं। पहली आप अपने से बेहतर और काबिल इंसान से मिलते हो ,तो आपको मोटिवेशन मिलता है। दूसरी बात -जब आप खुद को उनसे तुलना करते हो ,तो आपको ऐसा लगता है कि आप कुछ भी नहीं हो। और तीसरी बात -आपका कॉन्फिडेंस कम हो जाता है और फेलियर की ओर अग्रसर हो जाते हो। मूल कारण है अपने को किसी और से तुलना करना। अगर तुलना ही करना हो , तो तुलना कीजिए अपनी मेहनत का /प्रयास का उस कामयाब इंसान के प्रयत्न के साथ। फर्क इसी जगह पर होता है। उनकी कामयाबी के पीछे मेहनत का एक अहम भूमिका जरूर रहेगा। आपको अगर तुलना करना है ;खुद के साथ कीजिये। मैं जिनसे बहुत ही ज़्यादा प्रभावित हूँ ,राहुल द्राविड़ ,ने एक चर्चा के दौरान कहा था कि हर सुबह उनका एक ही प्रश्न रहता है खुद से -क्या मैं आज कल के तुलना में एक बेहतर इंसान बन पाया हूँ ? उनका कहना है कि इंसान केवल अपना बेहतर अवतार बनने की प्रयास कर सकता है। कोई और इंसान नहीं बन सकता। दूसरों के साथ तुलना एक खुद को कमजोर करने का तरीका है। इस आदत को त्याग कीजिये जिंदगी बदल जाएगी। आपकी।
मैंने चर्चा की थी कि आपके लिए असफलता की परिभाषा क्या है और आप उसे किस अंदाज़ से देखते हैं। एक बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा हूँ आपके लिए। आप सब लोगों ने तो थॉमस अलवा एडिसन का नाम जरूर सुना होगा। उन्होंने हमारे ज़िन्दगी में रौशनी दी है ,इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार के जरिये। हम लोग क्या इस बल्ब के बिना ज़िन्दगी सोच भी सकते हैं ? जब एडिसन आविष्कार का प्रयास कर रहे थे तब उनके पास केवल एक विश्वास था। क्यूंकि दुनिया ने उनके  पहले कभी बल्ब नामक वस्तु के विषय में ना सोचा था और ना ही किसी को इसका कोई अनुभव था। इतिहास गवाह है कि एडिसन को इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार करने में हज़ार बार कोशिश करनी पड़ी थी। पत्रकार ने उन्हें पूछा था एडिसन को -"आपको हज़ार बार असफल होने पर क्या महसूस हुआ ?" एडिसन का जवाब लाजवाब था -" हमने हज़ार बार असफलता नहीं पाई। इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार के लिए मुझे हज़ार कदम चलने पड़े !" उनके पास एक ही परिभाषा थी -खुद पर विश्वास और अपना जूनून। 
Albert Einstein ने इसी तरह की सोच पेश की थी। "Success is failure in progress ." इसी सन्दर्भ में मुझे प्रसिद्ध पेंटर Vincent Van Gogh , जिनको इतिहास सबसे ऊँचे दर्जे के पेंटर की हैसीयत से देखती है , उनकी ज़िन्दगी के एक विचार को याद दिलाती है -"If you hear a voice within you say ‘you cannot paint,’ then by all means paint, and that voice will be silenced." सफलता और असफलता का संघर्ष हमें अपने मन के अंदर जितना पड़ेगा क्यूँकि जब हम अपने आप से बात करते हैं तब हम खुद तय कर लेते हैं कि हम सफल हो पाएँगे या नहीं। सफल होने का ज़िद हमें अपनी पहली कदम को लेने में  हमारी मदत  करता है। 
क्या आप Van Gogh की तरह अपने अंदर  पल रहे उस आवाज़ को हमेशा के लिए चुप करा सकते हैं जो कि आपको  कह रहा है कि आप नहीं कर पाओगे। आप जरूर कर पाओगे। मेरी दुआ आपके साथ है। यही अपनी ख़ुशी का पहला कदम है। खुश रहिए। 

शुक्रवार, 3 मई 2019

नमस्कार। इस लेख के शुरू में मैं उन लोगों को सलाम करता हूँ जिन्होंने सम्मिलित चेष्टा के जरिए भयंकर 'फनी ' नामक तूफान के क्षति को कम से कम रखने में सफलता पाई। धन्यवाद आप सब को। आपकी सफलता के वजह से कई लोग निरापद स्थान में पहुँच कर तूफान के प्रकोप से खुद को बचाया। आँकड़े बताते हैं की पूर्व अभिज्ञता से सीख कर हम लोगों ने यह सफलता अर्जन किया है। यही मेरे लेख का विषय रहेगा कुछ महीनों के लिए। असफलता को कैसे हम सफलता में बदल सकते हैं। इस सन्दर्भ में मैं अपने आत्म जीवनी का जिक्र कर सकता था क्यूँकि मैंने अपनी ज़िन्दगी में अनगिनत असफलता का सामना किया है। परन्तु हार नहीं माना है। आपके लिए मैंने अपनी कहानी का सहारा ना लेने का तय किया है। क्यूँकि आपके के साथ मेरा रिश्ता इस लेख के माध्यम से है। मैं प्रसिद्द नहीं हूँ कि आपको इंस्पायर करूँ अपने जीवनी से। मैंने इस लिए काफी रिसर्च किया गूगल पर। सफल इंसानो के विषय में। और सफलता एवं असफलता के विषय। इस कारण मैंने भी नई बातें सीखी। उनका समिश्रण आपके पेश कर रहा हूँ। धन्यवाद उन लोगों को जिन्होंने गूगल के माध्यम से अपना ज्ञान और अनुभव शेयर किया जिससे यह लेख और आगे के लेख भी प्रेरित होंगे।
शुरू करता हूँ एक व्यक्तिगत अनुभव के जरिए। साल १९९२ । मैं एक फार्मास्यूटिकल कम्पनी में काम कर रहा था। काम के सिलसिले में  अहमदाबाद टूर पर गया हूँ। दिन के अंत में अहमदाबाद के डिस्ट्रिक्ट मैनेजर सिंह साहब के घर गया हूँ उनसे मिलने। एक एक्सीडेंट के कारण उनकी टाँग टूट गई थी। जिस कारण वह ऑफिस नहीं आ पा रहे थे। मैं उनसे पहली बार जिंदगी में मिल रहा था। सुना था बहुत ही मजेदार इंसान हैं। इस बात का प्रमाण मुझे उस दिन प्राप्त हुआ। उनके घर पहुँचने पर उनकी बीवी ,जिनको हम भाभी जी कह कर संबोधन कर रहे थे ,हमें मिठाई खिलाया इस ख़ुशी में कि उनके बेटे ने दसवीं क्लास के बोर्ड परीक्षा में ८९ प्रतिशत नंबर हासिल किया है। शायद आज ज़माने के पाठकों को यह बताना जरूरी कि उन दिनों ८९ प्रतिशत नंबर बहुत कम बच्चों को मिलते थे। हमने उनके को शाबाशी दी और ज़िन्दगी में और सफलता हासिल करने की दुआ माँगी। हम सिंह साहब से बातचीत में मशगुल हो गए लेकिन भाभी जी का असंतोष दूर नहीं हो रहा था। उनका बार बार यही कहना था कि अगर उनके बेटे को संस्कृत में ९५ प्रतिशत के जगह अगर ९८ प्रतिशत मिल जाता तो उसका परसेंटेज ८९ से बढ़कर ९० प्रतिशत हो जाता। उनके बेटे ने परीक्षा लिखने के बाद ९८ प्रतिशत की उम्मीद की थी संस्कृत में। बार बार भाभी जी यही एक बात दोहराये जा रही थी। अचानक सिंह साहब ने एक मजेदार टिप्पणी की। "अरे जाने भी इस बात को ,नहीं तो लोग सरदार का नहीं पंडित का बेटा समझेंगे " इस उदाहरण से यह बात उभर कर आती है कि असफलता की परिभाषा क्या है आपके लिए ? इस असंतोष आपको प्रोत्साहित कर सकती है अपने आप को और कोशिश करने के लिए।
रैल्फ हीथ जिन्होंने एक बेहतरीन किताब लिखी है - Celebrating Failure: The Power of Taking Risks, Making Mistakes and Thinking Big.- ने एक जबरदस्त बात कही है जो कि मैं मानता हूँ हर किसी के लिए मायने रखता है - “One of the biggest secrets to success is operating inside your strength zone but outside of your comfort zone.”
मुश्किल इस बात का है कि हम अक्सर अपने स्ट्रेंथ पर फोकस ना करके दूसरों के स्ट्रेंथ पर ईर्ष्या करते हैं। हमें अगर अपने कंफर्ट से बाहर निकलना है तब पहली चीज़ हमें जो ज़रुरत है वह है खुद पर भरोसा। इसके बिना हम रिस्क नहीं ले सकते हैं। 
आप सब लोगों ने तो थॉमस अलवा एडिसन का नाम जरूर सुना होगा। उन्होंने हमारे ज़िन्दगी में रौशनी दी है ,इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार के जरिये। हम लोग क्या इस बल्ब के बिना ज़िन्दगी सोच भी सकते हैं ? जब एडिसन आविष्कार का प्रयास कर रहे थे तब उनके पास केवल एक विश्वास था। क्यूंकि दुनिया ने उनके  पहले कभी बल्ब नामक वस्तु के विषय में ना सोचा था और ना ही किसी को इसका कोई अनुभव था। इतिहास गवाह है कि एडिसन को इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार करने में हज़ार बार कोशिश करनी पड़ी थी। पत्रकार ने उन्हें पूछा था एडिसन को -"आपको हज़ार बार असफल होने पर क्या महसूस हुआ ?" एडिसन का जवाब लाजवाब था -" हमने हज़ार बार असफलता नहीं पाई। इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार के लिए मुझे हज़ार कदम चलने पड़े !"
कुछ अंदाज़ मिल रहा है सफलता और असफलता के विषय में ? मैं अध्धयन कर रहा हूँ आपके यह सीखने के लिए कि हम सब असफलता से कैसे जूझें और ज़िन्दगी से अधिक आनंद प्राप्त करें। अगले महीने इसी विषय की अगली किश्त पेश करूँगा। क्या मैनेआपको सोचने परसफलता हासिल की है ?जरूर बताईए फेसबुक के माध्यम से। इंतेज़ार करूँगा आपके विचारों का। धन्यवाद धैर्य के साथ पढ़ने के लिए. 


शुक्रवार, 29 मार्च 2019

नमस्कार। २०१९ का तीसरा महीना। वित्तीय साल का पहला दिन। समय कैसे गुज़र जाता है। पता ही नही चलता। आप के साथ इस लेख के माध्यम से मिलने का सिलसिला अपने चौथे साल में कदम रख रहा है। इस वक़्त भी आप मेरा लेख पढ़ रहें हैं ,मैं इस लिए आपका आभारी हूँ और रहूँगा। मैं इस पत्रिका के एडिटर का भी आभारी हूँ जिन्होंने मुझे आपके लायक समझा। और परमात्मा को धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने हम सबको एक नए वित्तीय वर्ष में कदम रखने के लिए आशिर्वाद किया।
नया साल। नई उम्मीदें। नौकरी करने वाले को इन्क्रीमेंट और प्रोमोशन की चिंता। छात्रों को नए क्लास की उत्सुकता। व्यवसायी लोगों को व्यवसाय बढ़ाने का सोच। गृहबधु को परिवार के खर्चों को कम करने की सोच या बढ़ते हुए खर्चे को जुगाड़ करने की रणनीति। हम इतना चिंतित रहते हैं आगे की सोच कर कि वर्तमान का आनंद उठाना भूल जाते हैं। चैन से ज़िन्दगी के अब तक के सफर के लिए किस किस के आभारी हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में शायद चूक जाते हैं। और ऐसे लोग कई लोग होते हैं।
आपने कभी रोहन भसीन का नाम सुना है। मैंने भी नहीं सुना था। परन्तु किसी अख़बार में उनका एक फोटो ने मेरा दिल छू लिया। इस फोटो में रोहन एक बुजुर्ग महिला को आलिंगन में पकड़ कर रखा है। और दोनों के आँखों में भरपुर आँसू। आनंद का। कृतज्ञता का। यह फोटो एक हवाई जहाज के अन्दर लिया गया है। रोहन उस हवाई जहाज का कमाण्डर और उनके आलिंगन में उनके नर्सरी स्कूल की टीचर। और हवाई जहाज आसमान में भारत से अमरिका की ओर। और रोहन का एलान -'आज मैं इस हवाई जहाज का कमाण्डर ने सीखने का पहला कदम इनके साथ लिया था। 'और उनके टीचर ने क्या बताया। पहले दिन नर्सरी स्कूल में जब उन्होंने पूछा -बेटा तुम्हारा नाम क्या है ? पायलट रोहन भसीन। कौन कृतज्ञ था किसके प्रति ? दोनों एक दूसरे के प्रति। अक्सर हम अनेक रिश्ते में इस कृतज्ञता को भूल जाते हैं। नहीं भूल जाते हैं शायद , पर जाहिर नहीं करते हैं। और यही रिश्ता और मजबूत करने का मौका खो देते हैं। जरा याद कीजिए कब आपने रिक्शा चलाने वाले को धन्यवाद बोला है।
मैं कृतज्ञता या gratitude के विषय में काफी अध्यन कर रहा हूँ। मेरा दृढ़ विश्वास है कि कृतज्ञता हमें बेहतर ज़िन्दगी जीने में मदत करता है।

“Be thankful for what you have; you’ll end up having more. If you concentrate on what you don’t have, you will never, ever have enough.” —Oprah Winfrey

Oprah Winfrey के इस विचार ने मुझे जबरदस्त प्रभावित किया है। बचपन की याद आ जाती है। कॉन्वेंट स्कूल में दोपहर के भोजन के ब्रेक के पहले प्रार्थना -ऊपर वाले को धन्यवाद कहना रोटी के लिए। उस वक्त इसका महत्व नहीं समझता था। आज बात समझ में आती है। 
पूरी दुनिया में काफी अध्यन और रिसर्च चल रहा है कृतज्ञता पर। अमेरिका के एक प्रसिद्द यूनिवर्सिटी का अध्यन एक गज़ब निष्कर्ष पर पहुँचा है। जो इंसान में कृतज्ञता बोध है और जो उसको व्यक्त करने में नहीं हिचकिचाता है ,वह ज़िन्दगी में ज़्यादा सुखी है। क्यूँकि अभी तक ज़िन्दगी से वह खुश और संतुष्ट है। इसका तात्पर्य हरगिज़ यह नहीं है कि आप भविष्य में और तरक्की करने का प्रयास ना करो। जरूर करो। परन्तु अब तक के सफर के लिए मन ही मन सही ;किसी को तो धन्यवाद तो बोलो। ज़िन्दगी में हम हर किसी ने जब शुरुआत की थी ,अकेले नहीं की थी। कुछ हमसे आगे निकल गए ,कुछ पीछे रह गए। इसके लिए तो thank you बनता है। है ना। 
थोड़ा सोचिए और कोशिश कीजिए अपने आप को और अपनों को धन्यवाद बोलने का। सकून मिलेगा। मेरी बात मानिए। और यही सकून आपको इस नए वित्तीय वर्ष में नई उचाईओं को हासिल करने में मदत और प्रोत्साहित कीजिएगा। 
अगर आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो तो फेसबुक के माध्यम से जरूर बताईएगा। तहे दिल से धन्यवाद कहूँगा आपको। Happy New Financial Year आप सब को। 

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

नमस्कार। पलक झपकने के पहले ही हम इस वर्ष के तृतीय महीने में पहुँच गए हैं। अगले महीने वित्तीय साल का पहला महीना होगा। नई शुरुआत होगी व्यावसायिक वर्ष का। और स्कूल में नए क्लास का। स्कूल की बात छेड़ने पर पहली बात जो दिमाग में आती है- अनुशाषन यानि डिसिप्लिन। क्या अनुशाषन केवल बच्चों के लिए है ? आज चर्चा करेंगे अनुशाषन के विषय में।
आगे चर्चा बढ़ाने से पहले हमे नियम और अनुशाषन के बीच फर्क को समझना पड़ेगा। सूरज  सुबह पूर्व से ही उदय होगा और पश्चिम में अस्त होगा। यह प्रकृति का नियम है। इसमें कुछ नहीं बदलेगा कभी भी। परन्तु हम इन्सान ज़िन्दगी में कई नियम बनाते हैं और उस नियम को नहीं मानते हैं। बनाये हुए नियम को मानना और नहीं तोड़ना  अनुशाषन कहलाता है। उस वक़्त जब कोई आपको देख नहीं रहा है और आप फिर भी आप कानून नहीं तोड़ते हो ,स्वशाशन या सेल्फ डिसिप्लिन कहलाता है।
एक छोटा उदाहरण लीजिए। अगर पुलिस ने स्कूटर या मोटरसाइकिल सवारी के लिए हेलमेट पहनने का नियम बनाया है तो अधिकतर लोग तब तक हेलमेट का प्रयोग तब तक नहीं करते हैं जब तक पुलिस पकड़ कर जुर्माना नहीं करती है। पड़ोस में जब हम स्कूटर चला कर जाते हैं ,हम हेलमेट नहीं पहनते हैं क्योंकि हम 'नजदीक ' जा रहे हैं। दुर्घटना को क्या यह पता है कि आपकी सवारी नज़दीक की थी या मीलों की। अनुशाषन होना चाहिए कि मुझे अपने सर को किसी दुर्घटना से बचाने के लिए स्कूटर या मोटरसाइकिल का सवारी करते वक़्त हेलमेट जरूर पहनना चाहिए चाहे हम ५० मीटर का सवारी करें या ५०० मीलों का। पुलिस नियम जारी करने या ना करने पर हमारा निर्णय और वर्ताव एक ही रहेगा।
अकसर हमने ऐसे लोगों को अनुशाषन भंग करते हुए देखा है जो की दूसरे से सीनियर या पावरफुल समझता है अपने आपको। पुलिस की गाड़ी कई बार मुझे रास्ते में उलटी दिशा में आती हुई मिली है। ऑफिस में बॉस देर से आते हैं। छोटे मोटे वी आई पी अकसर किसी सेवा के लिए अन्य लोगों के साथ पंक्ति में खड़े नहीं होते हैं। बुजुर्ग बच्चों को ज्ञान देते हैं कि 'हमने बचपन में ऐसा किया या नहीं किया है ' आपने बचपन में क्या किया या नहीं किया उससे आपके बच्चे को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है क्योंकि वह इस वक़्त जो आपको करते हुए देखता है उसे सीख उसी से मिलती है।
मैं अनुशाषन का भक्त हूँ और उसके महत्व को समझता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं अनुशाषन को नहीं तोड़ता हूँ। परन्तु कुछ विषय और मामले में मैं कभी अनुशाषन को कभी नहीं तोड़ने की कोशिश करता हूँ। जैसे सफर के समय सावधानी बरतना। मैं गाड़ी के पिछले सीट पर बैठने के वक़्त सीट बेल्ट जरूर बांधता हूँ हाईवे के सफर के दौरान। ऑफिस में पहुँचने अगर किसी कारण देर हो जाए तो मैं अपने टीम के सदस्यों को पहले से ही इतिल्ला कर देता हूँ। इस सन्दर्भ में यह बताना जरूरी है कि समय पर ऑफिस पहुँचना अनुशाषन है। किसी कारण वश देरी हो जाने पर आगाम बतला देना भी एक अनुशाषन है। किस जगह मैं अनुशाषन तोड़ता हूँ ? खाने के विषय में। ऐसा खाना खा लेता हूँ जो कि सेहत के लिए सही नहीं है या खाना ठीक है तो जरूरत से ज़्यादा खा लेता हूँ।
पिछले हफ्ते मैं जयपुर में राजस्थान का नंबर एक पोजीशन प्राप्त प्राइवेट एम् बी ए कॉलेज के बच्चोँ को ज़िन्दगी में सफलता पाने के फार्मूला के विषय में समझा रहा था। मैं उनके अनुशाषन से मुग्ध हो गया और उन्हें यह समझाया कि अगर वो इस अनुशाषन को बरक़रार रखे तो उनको अपने मंजिल तक पहुँचने से कोई नहीं रोक पायेगा। इरादें और अनुशाषन दोनों जरूरत है सफलता के लिए। एक इंजन है तो दूसरा इंधन। एक दूसरे के बिना असम्पूर्ण हैं। सबसे चमकता उदाहरण हमारे भारतीय क्रिकेट टीम का वर्तमान कप्तान। क्यों ये बच्चे इतने अनुशाषित हैं जो कि आज अधिकतर कॉलेजों में नहीं देखा जाता है ? पूरा श्रेय कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ मंजु नायर और उनकी टीम को जाता है। इस टीम के अनुशाषन से हम सब प्रेरणा ले सकते हैं और सीख सखते हैं।
ज़िन्दगी में अनुशाषन लाना चाहते हैं ? छोटी -छोटी चीजों से शुरू कीजिये। अपनी और परिवार की सावधानी के लिए जो अनुशाषन जरूरत है , उसी से शुरू कीजिए। उम्मीद करता इसका महत्व आप समझते हैं। अगली बार जब मिलूंगा वित्तीय या पढ़ाई के नए साल में।  जहाँ आप अपने दिन का सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं ,वहाँ तो अनुशाषन को अपना अभिन्न अंग जरूर बनाइये। सफलता आपकी होगी। यही दुआ करता हूँ। स्वस्थ रहिये और सावधानी के साथ ज़िन्दगी गुज़ारिए। इसी में हम सबका मंगल है।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

नमस्कार। क्या आप सब मुझसे नाराज़ हैं किसी कारण ? अगर कोई नाराज़गी है तो ज़रूर व्यक्त कीजिए। किसी भी रिश्ते में नाराज़गी को व्यक्त ना करने से रिश्ते में दरार बनने की संभावना बढ़ जाती है। क्यों मुझे महसूस हो रहा है कि आप नाराज़ हो ?पिछले महीने के लेख के अंत में मैंने आप से प्रश्न पूछा था -अगर कुछ दोस्त एक साथ हो जाएँ तब क्या एक टीम बन जाती है ? किसी ने मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया।
प्रश्न का जवाब है -नहीं। कुछ दोस्त इकट्ठे होने पर टीम नही बनती। मैं एक व्यक्तिगत अभिज्ञता के वजह से इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। कई सीख मेरे सामने उभर कर पेश हुई। जो कि टीम बनने और काम करने के विज्ञान को कुछ हद तक गलत साबित करती है। मैं तीन मुख्य सीख को आपके लिए पेश कर रहा हूँ। दिसंबर के महीने में मैं और मेरी अर्धांग्नी दो दोस्त और उनके पत्निओ के संग विदेश के सफर पर गए थे। एक दोस्त मेरा  P G  पाठ्यक्रम कॉलेज का सहपाठी था और दूसरा दोस्त उसका U G पाठ्यक्रम का साथी। हमने करीब छह -साथ महीनों तक तैयारी की थी इस सफर के लिए। इस तैयारी में सबसे ज़्यादा अहम् भूमिका मेरे दोस्त के दोस्त ने निभाया। हमने  करीब १५ दिन एक साथ सफर किया। भूमिका के बाद तीन सीख।
टीम बनने के लिए टीम के सदस्यों को एक दूसरे के साथ परिचित होने पर टीम जल्दी बनती है। सही बात है। परंतु हर टीम में कोई टीम लीडर नियुक्त होता है या अपने काबिलियत के बल पर टीम लीडर बनने का हकदार बन जाता है। टीम के अन्य सदस्य अक्सर यह स्वीकार कर लेते हैं और इस वजह से टीम के संचालन में सुविधा होती है। दोस्तों की मंडली में यह नेतृत्व वाली कहानी इतनी आसान नहीं होती। क्यूँकि हर दोस्त का सोच दोस्ती के कारण होता है -हम किसीसे कम नहीं। इसका नतीजा -जितने लोग उतने विचार और हर कोई अपने विचार पर अटल।
दूसरी सीख है मैं अपनी तरह से आगे बढूँगा। साथ में मेरे दोस्त हैं। वह अपनी बात समझ लेंगे। टीम को सफल संचालन के लिए हर सदस्य को टीम की सफलता के लिए कुछ एडजस्टमेंट करने परते हैं। यह एडजस्टमेंट बहुत महत्वपूर्ण है टीम स्पिरिट को बनाने और बरक़रार रखने में। दोस्तों की टीम में हम एक दूसरे से यह उम्मीद रखते हैं कि यह तो उसे पता है ;तो फिर क्यों एडजस्ट करना। दोस्ती वाले महफ़िल में जो एडजस्टमेंट ज़रुरत नहीं परता ;दोस्तों के टीम में उसके बिना टीम नहीं चलता।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण सीख है सेंटीमेंट्स। दोस्त होने के नाते हम अक्सर कोई चीज़ अच्छे ना लगने पर भी कुछ नहीं बोल पाते हैं भावनाओं को कदर करते हुए। शायद हम ही कमजोर पर जाते हैं उस वक़्त। बोल नहीं पाते हैं जो बोलना जरूरी है। और इसी में चिढ़ और तनाव बढ़ जाता है क्रमशः। टीम में विभाजन हो जाता है। कानाफूसी शुरू हो जाती है। और हम अपना असली भावनाओं का दमन कर देते हैं। किसी भी रिश्ते का आनंद उठाने के लिए यह बाधा पहुँचाती है। स्पष्ट बातचीत का कोई विकल्प नहीं होता है किसी भी टीम के सफलता के लिए। दोस्तों के टीम में यह एक कमजोरी बन जाती है।
क्या आप सहमत है मेरे विचारों के साथ ?जरूर लिखिएगा और आपका विचार व्यक्त कीजिएगा। उम्मीद रखूँगा आपके विचारों का फेसबुक के माध्यम से। दोस्तों के साथ दोस्ती का आनंद लीजिए। टीम बनाना हो तो दुबारा सोचिए। खुश रहिए। 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

भावना ,कुशी ,श्रद्धा , बॉबी, हिमांशी , देवयानी। क्या है यह ?क्यों ज़िक्र कर रहा हूँ। नाम हैं। छह इंसान का। इनके साथ जोड़ता हूँ तीन और नाम -साजिद ,सँचिता और प्रीतम। छह से नौ हो गए। क्या हो गया है मुझे ? बिना किसी कारन मैं क्यों कुछ नाम आपके सामने पेश कर रहा हूँ ? कारन एक है -कुछ समय पहले यह लोग एक दूसरे के अजनबी थे। आज एक सफल team बन गए हैं। कैसे बना यह टीम ? क्या सीखा हमने इस प्रयोग से ? यही है आज चर्चा का विषय आपके साथ।
नमस्कार। और अभिवादन आप सब को नए साल का। आज नए साल का सातवाँ दिन। ५२ में एक हफ्ता गुज़र गया है पलक झपकने के पहले ही। इसी तरह समय दौड़ता चला जाएगा। रुकेगा नहीं। किसी के लिए। अगर समय का सही सदुपयोग करना है तो टीम बनाए या सही टीम से जुड़े। क्योंकि अगर आप अंग्रेजी भाषा में टीम शब्द को लिखें -TEAM - Together Everyone Achieves More -हम अकेले जितना हासिल कर सकते हैं ; मिल कर,  टीम बना कर उससे कहीं ज़्यादा हासिल कर सकते हैं। टीम काम के स्थान पर या खेल के मैदान में ही केवल नहीं बनता है ,निजी जीवन में भी इसका अहम् भूमिका है -इसकी चर्चा कभी और। हमारे टीवी पर दिखाए गए पारिवारिक सीरियल में आपने तो परिवार के सदस्यों के बीच गठबंधन तो जरूर देखा होगा। वह लेकिन टीम नहीं है। इस सिलसिले में कभी और बात करेंगे। आज चर्चा करेंगे टीम कैसे बनता है , चलता कैसे है और कैसे जीत हासिल करता है।  आज का यह लेख मैं उन नौ टीम के सदस्यों को उत्सर्ग करता हूँ जिनके नाम मैंने इस लेख के शुरू में किया है। टीम और teamwork का एक मिसाल बनने के कारन। मैं इस टीम पर गर्वित हूँ।
किसी भी टीम की सफलता का पहला कदम और सफलता की नींव टीम बनाते वक़्त बनती है। क्यों। एक कदम पीछे हट कर हम यह समझे की टीम की परिभाषा क्या है ?जब दो या उससे अधिक इंसान एक किसी मंजिल या गोल को हासिल करने के लिए एक साथ जुड़ते हैं तो एक टीम बनती है। परिभाषा सहज है। इसका प्रयोग कठिन। जो व्यक्ति टीम बनाने के लिए सदस्योँ का चयन करता है और उन्हें टीम में शामिल होने के लिए मोटीवेट करता है , उनका भूमिका महत्वपूर्ण होता है। कृपया गौर कीजिएगा -मैंने मोटीवेट करने की बात कही है ,मजबूर करने की नहीं। जो टीम का सदस्य बन रहा है उसका ऐसा महसूस होना जरूरी है कि इस टीम में काम करके मुझे आनंद मिलेगा। मेरा निजी तरक्की होगा -किसी भी सन्दर्भ में -ज्ञान , अच्छे लोगों के साथ जुड़ना या कमाई- मोटिवेशन कुछ या कई हो सकते हैं। । कैसे मोटीवेट होते हैं लोग एक अनजान टीम में जुड़ने के लिए ? ट्रांसपेरेंसी या क्लियर कट समझ इसका नीव है। टीम में मेरा रोल क्या है ? मुझसे क्या उम्मीद की जा रही है ? मुझे कितना समय देना पड़ेगा ? मेरी कमाई कितनी और कैसी होगी ?और सदस्य किस तरह के हैं ? जो मुझे टीम के लिए चयन कर रहा है उससे बात करके , मिल कर मुझे कैसा महसूस हो रहा है ? क्या मैं इस व्यक्ति या संस्था पर भरोसा कर सकता हूँ ? यहीं पर साजिद और सँचिता ने अपने व्यवहार और कम्युनिकेशन के जड़िये नए सदस्यों का दिल जीत लिया। एक बार दिल ने तय कर लिया , तो दिमाग भी साथ देता है।  और यही हुआ।
टीम तो बन गया। परन्तु सफलता के लिए टीम का संचालन कैसे होगा इसकी समझ हर सदस्य के लिए जरूरी है। तरह- तरह के तरीके अपनाते हैं लोग इस विषय पर। यह एक अलग विषय है चर्चा का। मेरे तजुर्बे में संचालन का तरीका कैसा भी हो , दो विषय पर ध्यान रखना आवश्यक है -टीम लीडर पहले टीम का सदस्य है और फिर लीडर है। दूसरी बात यह टीम के संचालन के नियम -कानून यानि की डिसिप्लिन की समझ हर सदस्य के लिए आवश्यक है । यह हर सदस्य पर प्रयोग होता है। टीम लीडर के लिए भी।
टीम बन गया है , टीम के संचालन के विषय में चर्चा भी हो चुकी है परन्तु टीम को गंतव्य या मंजिल को हासिल करने के लिए क्या चाहिए ? एक शब्द -कमिटमेंट -अर्थात टीम और टीम के मकसद के प्रति विश्वास और जूनून सफल होने का। बेहतरीन कमिटमेंट का प्रदर्शन किया है इस टीम ने। कई बाधा का सामना करना पड़ा टीम को , परन्तु उन्होंने परिस्तिथितिओं और बधाओं पर विजय प्राप्त किया। कहीं अधिक समय देकर ; ध्यैर्य के साथ पेश आ कर ; काम करने के तरीके को बदल कर, लम्बा सफर कर काम के स्थान तक पहुँच कर। परन्तु टीम ने समय पर और समय के अंदर काम को ख़त्म किया। कमिटमेंट के लिए क्या जरूरी है -flexibility यानि की परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बदलना और दृढ़ निश्चय के साथ डटे रहना। यहाँ मैं तारिफ करूँगा प्रीतम का। यह टीम उनकी कम्पनी के काम के लिए बनाया गया था। उसने कंधे से कंधा मिला कर काम किया। और प्रतिकूल समय पर उसने टीम का हौसला बढ़ाया और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने प्रतिकूल समय पर टीम की ओर ऊँगली नहीं उठाई या  इलज़ाम नहीं लगाया। टीम का वह अहम् हिस्सा बन गया। इसी लिए टीम ने उसके और उसके काम के सफलता के लिए जी जान लगा कर अपने कमिटमेंट का परिचय दिया। अक्सर कठिन समय पर इंसान दूसरों पर इलज़ाम का सहारा लेता है जो कि गलत होता है और टीम का मनोबल कमजोर कर देता है।
आप किसी टीम के सदस्य हैं या टीम बनाना चाहते हैं ? आप कुछ बताना चाहते हैं टीम के विषय में ? जरूर बता दीजिए मुझे फेसबुक के माध्यम से। मेरे लिए जो बात नई सीख होगी , मैं अपनी अगले लेख में शामिल करूँगा आपके नाम के साथ। यह वादा रहा। अगले महीने चर्चा करूँगा एक इंटरेस्टिंग विषय पर -अगर दोस्त एक साथ मिल जाते हैं तो क्या अपने आप टीम बन जाती है ? आपके विचार इस प्रश्न पर आमंत्रित करता हूँ। 2019 जो कि इस शतक का अंतिम वर्ष है एक teenager की हैसियत से, आपके और अपनों के लिए बेहतरीन हो , यही प्रार्थना करता हूँ परमात्मा से। खुश रहिए और जिंदगी का आनंद लीजिये। हैप्पी न्यू ईयर। आप सब को।  

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

नमस्कार। साल का बेहतरीन मौसम आ गया है। साल का आखरी महीना भी। पालक झपकने के पहले ही हर कोई अपने २०१९ के जन्मदिन की और कदम बढ़ा रहा है।
इसी जन्मदिन के सिलसिले में एक बात याद आ गया। तीन -चार दिन पहले फेसबुक में एक मित्र ने एक वीडियो पोस्ट किया -एक छोटा सा बच्चा अपना पहला कदम ले रहा है और परिवार वाले उसको प्रोत्साहित कर रहे हैं तालियां बजा कर। बच्चे को दो हातों से पकड़ कर कोई उसके पहले कदम को लेने में मदत कर रहा है। परिवार वाले उस बच्चे से दौड़ने की उम्मीद क्यों नहीं रखते हैं ?क्योंकि जब तक शिशु चलना नहीं सीख लेता है ;दौड़ना संभव नहीं है।
हम कभी अपने ज़िन्दगी को छोटी -छोटी मंजिल में विभाजित ना करने की गलती कर बैठते हैं। हम बहुत आगे की सोच कर अपना प्रयास करते हैं। और कभी -कभी असफल हो जाने के बाद अपना हौसला खो बैठते हैं। यह हम गलत करते हैं। माउंट एवेरेस्ट के चोटी पर पहुँचने के लिए पहले बेस कैंप तक पहुँचना पहली सफलता है। शुरू के क़दमों को इस बेस कैंप को गंतव्य बना कर चलना होगा। एवरेस्ट के चोटी को ध्यान में रखना होगा ,परन्तु कदम बेस कैंप तक पहुँचने के ईरादे से लेना पड़ेगा। बेस कैंप पहुँच कर खुद को मन ही मन प्रोत्साहित करना जरूरी है। और एनर्जी एवं हौसला बढ़ाने के लिए। अक्सर हम खुद को ऐसे छोटे विजय हासिल करने पर शाबाशी नहीं देते हैं। हमने लोगों को यह कहते हुए सुना है कि अभी मंजिल बहुत दूर है। सही बात है। परन्तु पहले पड़ाव का महत्वा अंतिम पड़ाव और गंतव्य से किसी भी मायने में कम नहीं है।
कहा जाता है कि शेर जब सोच समझ कर दो कदम पीछे हटता है ;वह और लंबी छलांग लेने की तैयारी कर रहा है। शेर क्यों ऐसा करता है ? अपने आप को तैयार करने के लिए। उस वक़्त शेर केवल अपने छलांग पर फोकस करता है। और किसी विषय पर नहीं। हमें भी ज़िन्दगी में ,शेर की तरह ,लंबी छलांग लगाने के लिए जान बुझ कर दो कदम पीछे हटना पड़ेगा। परंतु कभी -कभी हमारा अहंकार हमारे इस प्रस्तुति करने में बाधा बन जाता है।
हमारी सफलता का नीव हमारे दिमाग में है। और इस के लिए छोटी -छोटी सफलता जरूरी है। हम मंजिल तक पहले अपने दिमाग में पहुँचते हैं और फिर मंजिल की ओर कदम बढ़ाते हैं।
ज़िन्दगी के सफर में उतार -चढ़ाव एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जब हमें किसी कारन सफलता नहीं मिलती है जहाँ की हमें उसके सफलता मिल चुकी है ;हम विचलित हो जाते हैं और असफलता की वजह से मेहनत बढ़ा देते हैं। परन्तु शेर की तरह दो कदम पीछे हटने की बात नहीं सोचते हैं। एक उदाहरण पेश करते हैं इस विषय को और विस्तार से समझाने के लिए। क्रिकेट में जो खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट में सफलता हासिल कर चुके हैं ;अगर उन्हें चंद मैचों में असफल हो जाता है ;तो उसे रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता में खेलने की सलाह दी जाती है। यह शेर की तरह एक कदम पीछे हटना है। आशा की जाती है कि एक टेस्ट मैच का सफल खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी में सफलता  प्राप्त करके अपने आप का विश्वास वापस अर्जित कर पाएगा।
मैंने आज इस विषय पर लिखने के लिए क्यों सोचा ? अपनी कंपनी में पिछले दिनों मुझे महसूस हुआ कि मैं और हमारी टीम हर हफ्ते का मंजिल तय कर काम करने की कोशिश कर रहा था। परन्तु हमें अपनी उम्मीद से कहीं कम सफलता मिल रही थी। अब हमने दो से तीन दिन का मंजिल बनाना शुरू किया है। उससे भी महत्वपूर्ण निर्णय हमने यह लिया है कि हर बढ़ते हुए कदम का आनंद लेंगे और अपनी टीम के साथ सेलिब्रेट करेंगे। अचानक हमारी टीम का एनर्जी एकदम से बढ़ गया है। आशा करता हूँ कि हम अपनी उम्मीद पर खड़े उतरेंगे।
तो क्या रहेगा आपका वर्ष के अंत में हासिल करने का मंजिल? छोटे -छोटे कदम लीजिए। आनंद लीजिए ज़िन्दगी के सफर का। इस साल का अंत मंगलमय हो सबके लिए। और नए साल की शुरुआत हर किसी के ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन हो ,यही प्रार्थना करता हूँ परमात्मा से। खुश रहिए और याद रखिए कि हम सब में एक शेर मौजूद है। जरूरत पर दो कदम पीछे हट कर एक लम्बी छलांग ले कर देखिये कैसा लगता है। अपने अंदर के शेर को जागरूक कीजिए। आगे की ज़िन्दगी शेर जैसा बिताना है। लिखियेगा जरूर फेसबुक के माध्यम से। मुलाकात होगी २०१९ में। एक नए साल में। नई उम्मीदों के साथ।