शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

सादर प्रणाम २०२० का। आशा है शुरुआत अच्छी रही। एक नए दशक के शुरुआत में हर कोई अपने ख्वाबों को तराश रहा होगा। कैसा रहेगा यह २०२० का दशक ?मुझे इस दशक में निम्लिखित दस परिवर्तन नजर आ रहे हैं।
१ ) टी २० भी दर्शकों के लिए धीमा पर जायेगा। टी १० का जमाना शीघ्र आ रहा है। समय और ध्यैर्य दोनों पर प्रेशर बढ़ रहा है। इंस्टेंट फ़ूड की तरह इंस्टेंट एंटरटेनमेंट का जमाना आ रहा है।
२ ) समय का उपयोग और बदल जाएगा। आँकड़े कहते हैं कि स्मार्ट फ़ोन वाला इंसान औसत १८०० घंटा फ़ोन के साथ बिताता है ३६५ दिनों में। हम नत मस्तक रहेंगे शेष जीवन। स्पोंडिलोसिस का रोग और बढ़ेगा।
३ ) मोबाइल डाटा जितना सस्ता होगा उतने लोग अपने आप को गूगल के भरोसे एक्सपर्ट समझेंगे। विद्यार्थिओं को सुविधा होगी। जिनके पास जिज्ञासा है वह खो जाने का संभावना रखता है -गूगल सर्च में। फलस्वरुप कॉन्फिडेंस से ज्यादा कन्फूशन बढ़ेगा।
४ ) जितना हम गूगल के साथ समय बिताएंगे उतना हम अपना प्राइवेसी के साथ कोम्प्रोमाईज़ करेंगे। साइबर क्राइम सबसे ज्यादा हमें नुकसान पहुँचाएगा। सतर्क रहना बहुत जरूरी है।
५  ) टीवी अपने समय पर चलेगा। हम अपने समय पर अपना मनपसंद प्रोग्राम देखेंगे। ज्यादा लोग मोबाइल फ़ोन पर। कहीं कम लोग टीवी स्क्रीन पर। विज्ञापनदाताओं का इस वजह से काफी असुविधा होगी। मार्केटिंग का विज्ञान और बदल जाएगा।
६ ) ऑनलाइन रेपुटेशन मैनेजमेंट ब्रैंड्स के लिए सरदर्द बन जाएगा। इसका एक फायदा रहेगा। ब्रैंड्स को और ज़्यादा जिम्मेवार बनना पड़ेगा। आपको ख्याल रखना पड़ेगा कि पॉलिटिशंस को भी अपना ब्रैंड बनाना मजबूरी है।
७  ) नए कैरियर चॉइस उभर कर सामने आ रहे हैं। पॉलिटिक्स एक कैरियर चॉइस बन कर सामने आएगा। युवा पॉलिटिक्स में ज़्यादा दिमाग लगाएगा। जिओपॉलिटिक्स का प्रभाव हर देश पर पड़ेगा। इसके कई पहलु होंगे। हर देश का नेता अपने आप को दुसरे देश के नेता से बेहतर दिखाने का कोशिश करेगा। इस सिलसिले में छोटे देशों का भूमिका अहम् होगा।
८ ) एनवायरनमेंट और पॉलूशन पर चर्चा बढ़ेगा। साथ में वातावरण में दूषणता भी बढ़ेगा। शब्द और मोटर प्रदूषण और तेजी से बढ़ेंगे हमारे देश में।
९ ) एक तरफ कुछ लोग ज़्यादा सेहत का ख्याल ,और कुछ लोगों का सेहत पर खर्च बढ़ेगा। स्ट्रेस या मानसिक तनाव एक भयानक परिमाण में बढ़ेगा।
१० ) तनाव बढ़ने का एक कारण होगा खुद पर फोकस। सेल्फी ,फेसबुक लाइक्स ,अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना हम सब में तनाव बनाएगा। इससे बचके रहना आवश्यक है।
मैंने क्या प्रतिज्ञा किया है अपने आप से ?
सुबह उठने के कम से कम दो घंटों के बाद ही मैं अपना मोबाइल फ़ोन देखूँगा। काम के वक़्त मोबाइल को साइलेंट कर के काम करूँगा।
फेसबुक के जरिए अब कई लोगों के जन्मदिन पर हमें अलर्ट मिल जाता है। लोगों के साथ फ़ोन पर बात करके जन्मदिन का बधाई बोलूँगा। हम एक दूसरे से दूर चले जा रहे हैं क्यूँकि हम बात नहीं कर रहे हैं एक दूसरे के साथ। रिश्ते कमजोर पर जा रहे हैं।
टेक्नोलॉजी हमारे लिए बना है। हम टेक्नोलॉजी के लिए नहीं। हमें टेक्नोलॉजी को प्रयोग करना है। उनका गुलाम नहीं बनना है। गूगल से जानकारी मिलती है। हमें वह जानकारी एक्सपर्ट नहीं बना सकती है।
चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए। २०२० से हम २०३० भी पहुँच जाएंगे। सब कुछ बदल सकता है। केवल एक चीज़ कभी नहीं बदलेगा किसी के लिए -दिन के २४ घण्टे। इसका सदुपयोग ही हर इंसान को आगे बढ़ाएगा। टेक्नोलॉजी का सहारा लीजिए। आगे बढ़ने के लिए। अपने लिए ,खुद के लिए समय निकालने के लिए। अपनों के साथ समय बिताइए। यही आनंदमय ज़िन्दगी का एक मात्र राज़ है।
खुश रहिए। और ज़िन्दगी अपने अंदाज़ में जीने का प्रयत्न कीजिए। इसी में हम सब का मंगल है। 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

नमस्कार। देखते देखते एक और साल के आखिरी महीने में हम पहुँच गए हैं। कैसा रहा अब तक का सफर ,इस साल ?दावे के साथ कह सकता हूँ कि सफलता ,असफलता और निराशा हर व्यक्ति के सफर का अभिन्न हिस्सा रहा होगा। खुशियाँ और गम दोनों ने अपना किरदार निभाया होगा। एक क्षण के लिए अपनी आँखें बंद कीजिये और गत इग्यारह महीनों के घटनाओं के विषय में सोचिए। कौन सी बात पहले दिमाग में आती है ?बहुत आनंददायक या निराशा वाली घटना ? मैंने एक रिसर्च किया था इस विषय पर। पचास में छत्तीस वक़्ति के मन में निराशा के घटना ने पहला अभिर्भाव किया। बाकि चौदह लोगों के ज़िन्दगी में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई थी जो कि बहुत खुशी वाली थी और जो कि कभी -कभी होती है। एक वक़्ति का पाँच साल के बाद नौकरी में प्रोमोशन मिला जिसके कारण वह मैनेजर बन गया। एक बुजुर्ग पहली बार दादा बनने का आनंद अनुभव किया।
साल के इस अंतिम लेख का विषय है हमारे सोच के विषय में , खुद के लिए। शुरुआत में चर्चा करते हैं अपने संकल्प के विषय में जो हमने किया था इस वर्ष के शुरू में। कितना सफल हुए हम ? सोचने पर असफलता पहले दिमाग में आता है, सफलता शायद ख्याल में उतनी जल्दी नहीं आता है। हम अपने भाग्य को कोसते हैं। दूसरों के सौभाग्य पर जलते हैं। और इसी वजह से और भी मायूस हो जाते हैं। मेरी पहली सलाह -इस साल जितनी भी सफलता आपने हासिल की है ;उसको अपने दिमाग में ज़्यादा जगह दीजिये। इस सफलता का आनंद लीजिए। जहाँ सफलता नहीं मिली उसका कारण निकालिए। असफलता के लिए हम अकसर हम अपने किसमत को दोष देते हैं। खुद को नही। सफलता का कारण मैं हूँ। असफलता के लिए मैं जिम्मेवार नहीं हूँ। मेरा भाग्य या कोई और जिम्मेवार है। इस सोच को बदलना पड़ेगा। मेरी सफलता या असफलता के लिए मैं ही जिम्मेवार हूँ। और कोई नहीं। जिस दिन आप अपने आप को इस विषय पर राज़ी करवा लोगे ;आपकी ज़िन्दगी बदल जाएगी। मैंने किया है काफी प्रयास के बाद। पहले अपने किसमत को कोसता था ;अब खुद को प्रोतसाहित करता हूँ। सबसे बड़ा फायदा है अपने आप पर विश्वास बढ़ गया है।
पिछले कई लेख में मैंने बॉलीवुड के फिल्मों से सीखी हुई बातों का ज़िक्र किया है। इस बार भी करूँगा। एक फिल्म पिछले महीने काफी हिट हुई है। इस फ्लिम के मुख्य अभिनेता के ज़िन्दगी में एक ही समस्या जो कि उनके कॉन्फिडेंस को हिला देती है -उनके झड़ते हुए बाल और उसके कारण हुई गंजापन। उनको अहँकार था अपने केश पर। सावंली लड़कियों पर हँसता था। खुद को हीरो समझता था। झड़ते हुए बालों ने उनका मनोबल पूरा तोड़ डाला। परंतु वह सावंली लड़की का खुद पर विश्वास कोई नहीं हिला सका। हर कोई उसके ना गोरे होने पर ताना देता था।
कई सीख इस छोटे से उदाहरण से हमें मिलती है। पहली सीख अहँकार का कोई स्थान नहीं है। आज का अहँकार कल कमजोरी बन सकती है। अच्छे समय बुरे समय में बदल सकता है। उस वक़्त अपना मनोबल बरक़रार रखना महत्वपूर्ण है।
दूसरी सीख यह है कि मेरा मनोबल मेरे सावंलेपन  या सर पर बाल कम होने से प्रभावित नहीं होगा। इसे हम अंग्रेजी भाषा में हैंडीकैप कहते हैं। क्या कोई भी एक उम्र के बाद अपनी लंबाई बढ़ा सकता है ? नहीं। नाटा व्यक्ति क्यों किसी लम्बे इन्सान से अपने आप को कम काबिल सोचेगा ? सर पर बाल कम है तो क्या हुआ ? हम अपने हैंडीकैप से इतना हौसला खो देते हैं कि अपनी काबिलियत को भूल जाते हैं। और इसी कारण हमें टेंशन और स्ट्रेस हो जाता है जिसके कारण हम पहले ही हार जाते हैं।
तीसरी सीख आती है मुख्य किरदार के पिता के चरित्र से। अपने बेटे का हौंसला बढ़ाने के लिए ; एक विग खरीद कर अपने बेटे को भेंट करता है। विग पहन कर बेटे का हौंसला वापस आ जाता है। परंतु एक वक़्त आता है , जब उसे अपने गंजेपन को स्वीकार करना परता है ,किसी मजबूरी के कारण। तब उसे एहसास होता है कि विग का कोई जरूरत नहीं हैं। क्योंकि उसे लोग प्यार करते हैं उसके बालों के लिए नहीं।  वह जैसा इंसान है , उसके लिए। इस साल के अंत में आपसे विनती करूँगा कि अपने हैंडीकैप पर विजय हासिल कीजिए और अपने आप पर विश्वास कीजिए -आप सफल या असफल खुद के लिए होते हैं। देखिए आपका मनोबल कैसे बढ़ जाता है।
अगली मुलाकात २०२० में होगी। जब तक आपने अपने लिए नए संकल्प बना लिए होंगे। २०२० के लिए अग्रिम मुबारक। फेसबुक के माध्यम से आपके फीडबैक का इंतज़ार करूँगा। खुश रहिए।  

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

नमस्कार। आप सब को दिवाली की शुभकामनायें। उम्मीद करता हूँ कि आपने दिवाली सावधानी और प्रदुषण का ख्याल रख कर मनाया होगा। बधाई छट पूजा के लिए। छट पूजा में हम सूर्य भगवान की पूजा करते हैं। और सूर्य स्वास्थ का प्रतिक है।
एक नियमित पाठक ने मुझे स्वास्थ्य के महत्व के विषय पर लिखने का अनुरोध किया है। आज का लेख स्वास्थय पर है। मेरे अपने अंदाज में।
हम सब को गर्व होनी चाहिए कि हमारे प्राचीन रीति रिवाज़ से  स्वास्थ का गहरा संबंध है। शुरू करते हैं सूर्य भगवान के आशीर्वाद से। बचपन से मैंने देखा है माँ को नवजात शिशु का तेल मालिश कर के धूप में रख देना। एकदम प्राकृतिक उपाय विटामिन डी के लिए। इससे हमारी पहली सीख। हम कितना समय धुप का आनंद लेते हैं ? मुझे तो लगता है कि हम 'वातानुकूल ' से गिरफ़्तार हो गए हैं। धुप में निकलने से डरते हैं। और देखिये विदेशी पर्यटक को। भारत का सफर करते हैं धुप सेकने के लिए।
दूसरी सीख के लिए मैं उदाहरण लूँगा हाल में रिलीज़ हुई एक हिंदी फिल्म से। यह इस फिल्म के टाइटल का चौथा संस्करण है। कॉमेडी का आनंद के लिए फिल्म देखने गया। वातानुकूल सिनेमा हॉल में सोने का आनंद लिया। क्यों फिल्म अच्छी नहीं लगी। एक कारण। सब तरह के मसाले डाल देने पर खाना स्वादिष्ट नहीं बनता है। दरअसल खाने लायक नहीं रहता है। यही होता कई लोगों के लिए उनके स्वास्थ्य चर्चा के लिए। बहुत करना चाहते हैं। कुछ नहीं कर पाते हैं। एक दो चीज़ करने का प्रयास कीजिए। आदत बना लीजिये। फिर आगे बढ़िए।
तीसरी सीख है संयम। खानाहै हम पहले आँखों से खाते हैं। फिर मुँह से। आपने शायद अनुभव किया होगा कि जो खाना आपके सेहत के लिए मना है ; उस खाने को देखकर लालच ज़्यादा बनता है। मुँह में पानी आ जाता है। और हम कोई ना कोई बहाना ढूंढ लेते हैं 'इस बार खा लेने का '; अगली बार कतई नहीं। हमारे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान ने कई सालों से मिठाई का एक भी टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला। जितना शारीरिक परिश्रम वो करते हैं ; एक आध टुकड़ा मिठाई से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। परन्तु , नहीं।  यही होता है संयम।
चौथी सीख तीसरे सीख से जुड़ी हुई है। अनुशाषन या डिसिप्लिन। संयम उन चीज़ों पर रखना है जो कि नहीं करना चाहिए। अनुशाषन उन विषय पर होना चाहिए जो कि करना है। उदाहरण के तौर पर आप दिन में कितना कदम चलते हैं। कुछ लोग तो अपने दिन भर के चलने का हिसाब रखते हैं अपनी घड़ी या फिटबिट के माध्यम से। हिसाब रखना तब ही मतलब रखता है जब कि उस पर अमल करें और अनुशाषन के साथ उसका प्रयोग करें। एक दूसरे तरह का अनुशाषण भी महत्वपूर्ण है। मैं अपने एक अनुभव के जरिए समझाता हूँ। मैंने समय पर अपने ऑफिस का एक काम नहीं किया। महीनों तक टालता रहा। अचानक उस काम को सबमिट करने का दिन आ गया। दो दिन मुझे केवल उस काम के लिए देना पड़ा। दरअसल अगर मैं अनुशाषन के जरिए अपना काम हर महीने करता रहता , तो मुझे काफी कम समय लगता। इसके अलावा मुझमें जो मानसिक तनाव बना , उसका एक अलग प्रभाव बना मेरे स्वास्थ पर। और यही मुझे अपने आज के लेख के अंतिम सीख पर ले जाता है।
मानसिक स्वास्थ। यह सबसे ज़्यादा हानिकारक है हमारे लिए। इसका कारण अकसर हम खुद हैं। जैसा मैंने अभी आपको समझाया है। पिछले दशक में इंटरनेट ने हमारी ज़िन्दगी बदल डाली है। काफी फायदे हुए हैं। नुकसान भी। सबसे ज़्यादा नुकसान का वजह है बिना किसी वजह का कम्पीटीशन। फेसबुक में मेरे सेल्फी को कितने लाइक या कमेंट्स मिले मेरे लिए महत्वपूर्ण है। उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है मेरे 'प्रतिद्वंदी ' को कितना मिला है। इससे हमें मानसिक अशांति होती है। एक और प्रचलित वजह मानसिक तनाव का है -परीक्षा का रिजल्ट्स। अभिवावक खुद टेंशन करते हैं और अपने बच्चों का टेंशन बढ़ाते हैं। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी ज़िन्दगी में हमेशा सफल नहीं होता है। ना ही कम नंबर प्राप्त करने वाला , असफल। हमें अपनी ज़िन्दगी जिनी चाहिए और उसका आनंद लेना चाहिए। ऐसा करने से खुद पर मानसिक तनाव कम होता है। छोटी -छोटी बातों का आनंद लीजिए। ज़िन्दगी भरपूर जीने का प्रयास कीजिये। यही स्वास्थ का राज है।
आनंद लीजिए और मुझे जरूर लिखिए इस लेख के विषय में ,फेसबुक के माध्यम से। 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

नमस्कार। पिछले महीने का लेख गणेश चतुर्थी के दिन प्रकाशित हुआ था। आज का लेख नवमी के दिन। माँ दुर्गा हम सबका मंगल करे यही दुआ करता हूँ। विजया दशमी और दशेहरा के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ। पिछले महीने के लेख मैंने मंगल पर लिखा था -मंगल मिशन। क्या आपने खुद अनुभव किया उन भावनाओँ को ६ सितम्बर के रात को ?चंद्रयान के साथ। इतने करीब। परन्तु असफल। गर्व है उन लोगों पर जिन्होंने हमें इतना करीब पहुँचा दिया। निराशा हम सब को है। हम तो केवल दर्शक की भूमिका में हैं। उनकी बात सोचिये और महसूस कीजिए जिन्होंने कई सालों का कठिन परिश्रम को मंजिल के इतने करीब असफल होते हुए देखा। इस मायूसी से वापस आना आसान नहीं है। मेरा विश्वास है कि चंद्रयान अगले सफर में जरूर चाँद पर दक्षिण दिशा से पहुँचने में सफल होगा जो कि बहुत कठिन माना जाता है। मिशन मंगल में भी असफलता को इतिहास बना दिया था उस वक़्त के ISRO के टीम ने।
मिशन मंगल फिल्म पर वापस आते हैं कुछ सीख के लिए। पिछले लेख में मैंने दो मुख्य किरदार -राकेश धवन और तारा शिंदे के कुछ घटना के विषय में चर्चा की थी। इस लेख में अन्य किरदारों के विषय में चर्चा करूँगा और किस तरह से तरह तरह के इंसान को लेकर टीम का संचालन किया जा सकता है ,उस पर अलोकपात करूँगा। एका गाँधी -अमेरिका में पढ़ी हुई मॉडर्न लड़की। अमेरिका में जीने के तौर तरीके के साथ ज़्यादा परिचित। उनका विशेष प्रतिभा -innovation -अटक जाती है एक हद तक पहुँच कर। समाधान नहीं ढूंढ पाती है। हौसला छोड़ने की स्थिति में पहुँच जाती है। झटका देता है राकेश धवन। अपना गुस्सा ज़ाहिर करके। एका का ईगो यह 'अपमान 'सह नहीं पाता है। फिर क्या ? दिन -रात भूल जाती है। समाधान जो ढूढ़ना है। मिल जाता है। इस कठिन क्षण में साथ निभाता है उस का टीम का परमेश्वर नायडू -जो वैज्ञानिक है परन्तु ज्योतिष के द्वारा नियंत्रित है। ईश्वर में अत्याधिक विश्वास रखता है। महिलाओं से शर्माता है। परन्तु दोस्ती भी करना चाहता है। एका गाँधी उसके लिए एक अद्भुत नारी है जिसका वह फैन बन जाता है। उसे खुद नहीं पता कैसे एक कठिन समय में वह एका गाँधी का मानसिक सहारा बन जाता है। अनजाने में। हमारे लिए सीख -गुस्सा अच्छा होता है। समय पर और सही तरीके से पेश करने पर। दूसरी सीख टीम में एक दुसरे को हम कब ,किस तरह सहारा दे सकते हैं ,हमें खुद नहीं पता।
कृतिका अगरवाल -मिशन से गायब हो जाती है अपने पति की सेवा करने के लिए जो सरहद पर जंग लड़ते हुए ज़ख्म हो जाता है। वापस आती है अपने पति के कहने पर। घर में उन्हें एक सीख मिलती है। अगर कोई मशीन चलते वक़्त अचानक रुक जाये तो मशीन को एक बार on -off कीजिये जैसा कि हम अकसर घर में करते हैं। यही तकनीक का प्रयोग कृतिका करती है जब कि यान के साथ सम्पर्क टूट जाता है। on - off भगवान का नाम लेकर। संपर्क जुड़ जाता है। विज्ञान ,भगवान ,भाग्यवान और घर का साधारण तौर -तरीके -सब साथ देते हैं अगर इरादा पक्का होता है।
अंतिम सीख मिशन मंगल से। अपने कार्य स्थान को आप एक नौकरी के अंदाज़ से देखोगे तो आपको कुछ हद तक सफलता प्राप्त होगी। अपना बना लो तो समय अपना ;अंदाज़ अपना ; हार और जीत अपनी। हम खुद के लिए काम करना शुरू कर देते हैं ; कंपनी की बजैह। तारा शिंदे यह एहसास दिलाती है ऑफिस में 'पुनर्जन्म 'सेलिब्रेट कर के। वर्षा पिल्लई जो कि मिशन के वक़्त गर्भवती होती है निश्चित होकर काम करती रहती है क्यूंकि उसके लिए ऑफिस ही घर बन जाता है।
सब संभव है अगर हम विश्वास करें और सफलता या असफलता का जिम्मेवारी अगर खुद पर ले सके तो। टीम ही सर्वोपरी है।
फिर मुलाकात होगी। अगले महीने। दिवाली के बाद। अपना और अपनों ख्याल रखिये। सावधानी के साथ आतिशबाजी का आनंद लीजिये। फेसबुक के माध्यम से मुझे अपना विचार भेजिए । इंतेज़ार करूँगा 

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

नमस्कार। मँगल कामना करता हूँ हम सब के लिए गणेश चतुर्थी के पवित्र अवसर पर। गणेश भगवान का आशिर्वाद जरूरत है हम सब को मंगलमय ज़िन्दगी के लिए। आज शुरू से मंगल की बात क्यों कर रहा हूँ ?दरअसल मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ फिल्म मिशन मंगल से। बॉलीवुड से प्रभावित हूँ क्यूँकि मैं उनसे सीखता हूँ। आज का लेख समर्पित करता हूँ ISRO के उन वैज्ञानिक को जिन्होंने हमारे देश को मंगल ग्रह तक पहुँचने में सफलता अर्जन की थी।
कहानी के दो मुख्य किरदार हैं -राकेश धवन और तारा शिंदे। एक बैचेलर तो दूसरी पति और दो बच्चों के साथ एक अद्भुत माहोल के साथ घर चलाने वाली। सब कुछ करती है तारा शिंदे -खाना बनाना ;पूजा करना ; बगीचे का ख्याल रखना और विज्ञान और home science का समिश्रण करना। तारा शिंदे का किरदार मुझे पहली सीख देती है। हम अक्सर वर्क-लाइफ बैलेंस के विषय में चर्चा करते हैं। और निराश हो जाते हैं कि हम बैलेंस बरक़रार नहीं रख पाते हैं। मुख्यत अपने पारिवारिक जीवन में जितना समय देने के विषय में सोचते हैं ,नहीं दे पाते हैं। अपने में एक अपराध बोध होता है। यहीं पर हमें तारा सिखाती है कि हमें बैलेंस नहीं पैशन का सहारा लेना चाहिए। बैलेंस में कोम्प्रोमाईज़ होता है ;पैशन में कमिटमेंट और आनंद। जो भी कीजिये ;जितने समय के लिए कीजिये ;पैशन के साथ कीजिये ;और करने का आनंद लीजिये।;कभी भी थकान नहीं महसूस कीजियेगा।
तारा के परिवार से दूसरी सीख जो मिलती है एक परिवार में एक दूसरे को जगह देना और हर किसी को अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने का स्वाधीनता देना चाहिए। तारा के पति अपने बच्चों को शुरू में अपने विचारों और भावनाओं के अनुसार चलाने का प्रयत्न करता है। तारा की वजह से एक घटना के माध्यम से खुद महसूस करता है कि वह अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह नहीं जी रहा है। उसके लिए यह एहसास और ज़िन्दगी को अपनी अंदाज़ से देखने के साथ ही बच्चों को पिता के करीब आने में मदत करता है। जिओ अपनी तरह से ;जीने दो परिवार के अन्य सदस्यों को उनके अंदाज़ से। यही है एक ख़ुशी परिवार का नीव।
"किसी ने कभी कहा है कि लड्डू केवल ख़ुशी के अवसर पर ही खाया जा सकता है ?" यही प्रश्न मुस्कुराते हुए राकेश धवन ने मीडिया के प्रतिनिधियों को किया था लड्डू खाते हुए जब उन्होंने एलान किया कि प्रथम प्रयास असफल रहा। असफलता को मुस्कुराते हुए स्वीकार करना एक प्रतिभा है। जो कि कुछ लोगों के लिए संभव है। यही लोग असफलता को सफल होने का ज़िद बना लेते हैं।
राकेश फिल्म में तारा का बॉस है। पहले असफल प्रयास का एक कारण तारा का एक गलत निर्णय होता है। दुनिया की आँखों में यह निर्णय राकेश ने लिया था। तारा ने नहीं। टीम तभी बनता है जब सदस्यों को निर्णय लेने का अधिकार देता है बॉस। निडरता के साथ निर्णय लेने का। सफलता टीम का। असफलता के लिए जिम्मेवार ,बॉस।
बहुत सारी सीख अर्जन किया है मैंने इस फिल्म से। आज का लेख समाप्त करना चाहता हूँ एक लाजवाब सीख के साथ। मैनेजमेंट की भाषा में हम इसे connecting the dots कहते हैं। dots यानि बिंदु। अर्थात बिंदु अपने आप में कुछ कहता है। सही तरह से जुड़ जाने पर कुछ और कहता है। तारा पूरी तलने के वक़्त यह समझती है कि उबलता हुआ तेल एक तापमात्रा पर पहुँच जाने के बाद गैस का चुल्हा बंद कर देने के बाद भी कई और पूरी तली जा सकती है। यही concept का प्रयोग उसने अन्तरिक्ष यान के लिए सोचा। यान का वजन कम इंधन के कारण कम हो जाएगा जिसके कई फायदे हैं। गृह विज्ञान से अंतरिक्ष यान। यह एक मिसाल है हम सबके लिए। छोटी -छोटी अवलोकन हमें बहुत सिखाती है अगर हम जो देख या महसूस करते हैं उसके विषय में अगर हम सोचते हैं और अलग अलग बिंदु को कनेक्ट कर दें ,तो ज़िन्दगी बदल सकती है। यही पूरी के तलने से सीख मिशन मंगल का भीत बन जाता है।
अपनी ज़िन्दगी में dots कनेक्ट कीजिए और ज़िन्दगी से ज़्यादा आनंद लीजिए। मुझे फेसबुक के माध्यम से बताइये। अगले महीने के लेख में बाकी सीख को पेश करूँगा। मंगल। मंगल। 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

नमस्कार। पिछले महीने के लेख में हमने क्रिकेट विश्व कप का जिक्र किया था। हमारी टीम का सेमि फ़ाइनल में जिस टीम ने पराजित किया ,वह टीम फ़ाइनल में हार कर भी जीत गई। उस टीम के कप्तान के प्रति पुरे विश्व क्रिकेट का श्रद्धा जरूर बढ़ गया होगा। उन्होंने केवल एक ही बात कही -उन्हें नियम पता था परन्तु किसी ने कभी सपने में भी सोचा था कि उस नियम को प्रयोग करना पड़ेगा ,विजेता को चुनने के लिए !कभी आपने सोचा है कि क्या होता अगर यह हार भारतीय क्रिकेट टीम को मिलती विश्व कप के फाइनल में ?मैं सोचने का प्रयास भी नहीं कर रहा हूँ।
आज मैं नियम प्रयोग नहीं। तोड़ने के विषय में चर्चा करूँगा। चर्चा करूँगा बचपन में स्कूल में सिखाया गया एक विषय पर -moral science- क्या आपने भी पढ़ा यह विषय स्कूल में। इस विषय में जो मैंने पढ़ा था , उसमे तीन बातें हमें याद है -परमात्मा (चाहे आप किसी भी रूप में उन्हें स्मरण करो )को दो वक़्त की रोटी के लिए धन्यवाद कहो ; ज़िन्दगी में सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलु हैं -परमात्मा को याद धन्यवाद देने के लिए कीजिये ज़्यादा ना कि दुःख के समय केवल मदत माँगने के समय ; किसी भी इन्सान का असली परिचय मिलता है जब उसका पीठ कठिनाईयों के कारण दीवार के साथ सट जाता है या ऐसा कोई मौका सामने आता है जो कि लोभ और लालसा बढ़ा देता है। छोटे दो उदाहरण -सड़क पर आपको काफी सारे रुपए गिरे हुए मिलते हैं। आप क्या करोगे आप का परिचय है। आपने एक ऐसी गलती की है जिसे स्वीकार करने पर आपकी बेइज्जती होगी। क्या आप इंकार करोगे ?
मूल बात यह है कि moral science हमें बताता है क्या गलत है और क्या सही। मालूम हर किसी को है। इसके बावजूद परिस्थितिओं का सामना करते वक़्त हम क्या निर्णय लेते हैं ,हमारा परिचय बन जाता है।
कुछ दिन पहले एक मशहूर कॉफ़ी चेन के प्रतिष्ठाता ने आत्महत्या कर लिया। हमारे कॉलेज के व्हाट्स ऑप ग्रुप में हम लोग विभाजित हैं -कुछ उन्हें ऊँचे कदर का व्यपसायी मानता है ; कुछ लोग उनके व्यवसाय को बढ़ाने के तरीके को धिक्कार रहा है। कई सीख छुपे हुए हैं इस उदाहरण में। मैं अपने जीवन कुछ नियम कभी नही तोड़ता हूँ। अभी तक मुझे इन नियमों के कारण फायदा मिला है जिस वजह आपके लिए पेश कर रहा हूँ। ये नियम मेरे लिए moral science है।
१) ज़िन्दगी में रिस्क लेना जरूरी है। परन्तु अपने रिस्क लेने की क्षमता को ख्याल रखना महत्वपूर्ण है। लक्ष्मण रेखा का होना आवश्यक है। नहीं तो हम लोभ के दलदल में फँस जायेंगे।
२) कभी ऐसा कुछ मत करो जिससे किसी को मानसिक चोट पहुँचे। ज़रा मेरे शब्दों के चयन पर गौर कीजिए। कभी कभी ज़िन्दगी में आपको किसी की तरक्की या किसी को सही मार्ग दिखाने के लिए कठिन होना पड़ता है जिसके कारण उस व्यक्ति को दुःख होता है -इसमें कोई असुविधा नहीं है। क्यूँकि यह उसके हित के लिए है। मूल बात यह है कि आपके आनंद का कारण किसी के लिए दुःख का कारण नहीं बन सकता है।
३) कभी ऐसा कभी मत करो ,किसीके साथ भी ,जो आप नहीं चाहते हो कभी भी ,कोई भी, आपके साथ करे।
४) झूठ हम सब कोई बोलते हैं। परन्तु कभी ऐसे झूठ का सहारा ना लीजिये जो कि आप नहीं चाहते हो कि सच हो जाए। देर से पहुँचने का बहाना कभी भी अपने वाहन का पहिए का पंक्चर मत बनाइये अगर वह सच नहीं हो।
५) कभी भी किसी के कमजोड़ी या बुरे वक़्त का फायदा मत उठाइये। हम सभी को यह ख्याल रखना चाहिए की हमारी भी कमजोड़ियाँ हैं और बुड़ा वक़्त हर किसी के जीवन में आता ही है। हमारे बॉलीवुड के शहेंशाह को भी बूड़े समय से गुजरना पड़ा था।
अंत में यही कहना चाहूँगा कि दिल और दिमाग ,दोनों की सुनिए। हम सबके लिए वही moral science है। अगर आपका दिल और दिमाग दोनों ने चाहा तो मुझे फेसबुक के माध्यम से आपके विचार ,इस लेख के विषय में जरूर बताइए। इंतेज़ार करूँगा। खुश रहिए। 

शुक्रवार, 28 जून 2019

नमस्कार। बारिश का इंतेज़ार ने गर्मी को और ज़्यादा असहनीय बना दिया है। कष्ट होता है जब किसीको पानी बर्बाद करते हुए देखता हूँ। हमारे देश में कई जगहों पर लोग पानी के लिए तरस रहें हैं। कोशिश कीजिये पानी बचाने का। मुझे तजुर्बा है दिन में केवल एक बालटी पानी से दिन चलाने का। करीब चालीस साल पहले इस एक बालटी पानी ने मुझे एक जबरदस्त सीख दिया था -जो हमें आसानी से मिल जाती है उसका हम कदर नहीं करते हैं। जब मजबूरी होती है ,तब हम समझते हैं कि हम कितना बरबाद करते हैं।
आज मैं दो विषय पर लिखुँगा -बोर्ड परीक्षा के मार्क्स और विश्व कप क्रिकेट का दिलचस्प विश्लेषण। आप सोच रहे होंगे कि ये दोनों विषय एक दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं। एक अंग्रेजी शब्द दोनों विषय को जोड़ता है -performance
पहले चर्चा करता हूँ बोर्ड परीक्षा के मार्क्स के विषय में। मेरे मित्र की बेटी ISC परीक्षा में पुरे भारत में चौथा स्थान हासिल कर पाई है ९९ प्रतिशत से ज़्यादा मार्क्स पा कर। परन्तु यह बच्ची नाखुश थी। अपने परफॉरमेंस पर। चूँकि उन्हें गणित में १०० प्रतिशत नंबर नहीं मिले। ९७ प्रतिशत मार्क्स ही मिले। एक प्रसिद्द कॉलेज में उनको economics में जगह नहीं मिली। इतनी अच्छी बच्ची क्रमशः मायूसी के कारण डिप्रेशन की ओर अग्रसर हो रही थी। मेरे मित्र ने मुझे उससे बात करने के लिए अनुरोध किया। करीब तीन घण्टे की बातचीत के दौरान कई पहलु उभर कर सामने आये। गणित इस बच्ची का favourite subject नही है। इस कारण उसको अच्छे नंबर नहीं प्राप्त होते थे। उन्होंने ठान लिया था कि गणित पर वह विजय हासिल करेगी। उन्होंने गणित सीखने का एक मात्र तरीका अपनाया -practice इतनी मेहनत की उन्होंने कि बीमार हो गई। उसका खेद इस बात का था कि उसने तीन नंबर अपनी लापरवाही के कारण गँवाया ,ना जानने के कारण नहीं। मैंने केवल एक सलाह दी -९७ प्रतिशत का आनंद लो। तुमहारे मार्क्स जो है वही रहेंगे। दूसरी बात आगे की पढ़ाई में ऐसे subjects का चयन करो जिसमें गणित का प्रभाव और जरूरत कम है। उन्होंने कहा नहीं यह संभव नहीं है। मैंने पूछा क्यों। तब एक चिंता जो उनको परेशान कर रही है उभर कर आई। मैं अचंभित हो गया उसकी बातों को सुन कर। ICSE के परीक्षा में भी इस बच्ची को ९७ प्रतिशत से ज्यादा मार्क्स प्राप्त हुए थे। परन्तु उसने विज्ञान के subjects को नहीं चुना। humanities के subjects का चयन किया। और इसी बात पर उनके रिश्तेदार ,पारिवारिक मित्र और अन्य लोगों ने उनको धिक्कार दिया। और यही इस बच्ची के लिए भारी पर गया। उसने अपने लिए नहीं ,दूसरों के लिए जीना शुरू कर दिया। और यही उनकी गलती थी। अगर कोई अभिभावक इस लेख को पढ़ रहा हो ,उनसे केवल निवेदन करूँगा अपने बच्चों को उनका subjects का चयन खुद करने दीजिए। अभी विज्ञान पढ़ना जरूरी नहीं है। अभी कैरियर के अनगिनत चॉइस हैं। बच्चों को उनका जिंदगी उनकी तरह से जीने दीजिये। इसी में हम सब का मंगल है। इस बच्ची को हमारे देश के एक टॉप कॉलेज में economics पढ़ने का मौका मिल गया है। शायद उसने गलत निर्णय लिया है क्योंकि गणित का एक महत्वपूर्ण भूमिका होता है इस विषय पर। सफलता जरूर हासिल करेगी क्योंकि उसमे प्रतिभा और ज़िद दोनों पर्याप्त हैं। परन्तु किसी और subject पर उसका दखल कहीं ज़्यादा है। परन्तु वह अपने रिश्तेदारों को दुबारा ताने मारने का मौका देना नहीं चाहती है।
अब चर्चा करते हैं क्रिकेट विश्व कप का। अब तक हमारी टीम ने एक भी मैच नहीं हारा है। बहुत अच्छा खेल रही है हमारी टीम। परन्तु हमारे कप्तान कूल का मीडिया और समालोचक ने बड़ी निंदा और चर्चा की है। एक मैच में मंथर बैटिंग के कारन। क्या वह नहीं प्रयास करना चाहते हैं जल्द रन बटोरने का। जरूर प्रयास कर रहे होंगे। कभी -कभी आपकी चेष्टा का फल नहीं मिलता है। इसका मतलब यह नहीं होता है कि आपकी काबिलियत कम हो गयी है। ऐसी परिस्थितिओं में आपको सहानुभूति चाहिए , धिक्कार नहीं। हम यहीं गलत हो जाते हैं। एक मिसाल पर आधारित हो कर हम मंतव्य कर देते हैं। समालोचक को चुप हो जाना पड़ा क्योंकि हमारे कप्तान कूल ने कड़ा जवाब दिया अगले मैच में ही जबरदस्त बैटिंग कर के। मैं खुश हूँ क्योंकि हमारे कप्तान कूल का सबसे महत्वपूर्ण गुण है कि विजय पाने पर वह ज्यादा उत्तेजित नहीं होते। ना ही हारने पर मायूस। सर्वदा मुस्कुराते रहते हैं। खेलते हैं जीतने के लिए। यह जानते हुए कि खेल के दो ही परिणाम हैं -हार या जीत। इसी लिए अपने स्नायु पर काबू रख पाते हैं मैच के कठिन परिस्थितिओं के समय। उनसे बहुत कुछ सीखना है हम सब को। मुझे विश्वास है कि जिस दिन उनको महसूस होगा कि बहुत हो गया है। और आनंद नहीं मिल रहा है खुद अवसर लेने का घोषणा करेंगे। शायद वह दिन ज़्यादा दूर नहीं है। मैं आपको सलाम करता हूँ -कप्तान कूल। आपसे हमने बहुत कुछ सीखा है अब तक। आगे भी सीखता रहूँगा। दुआ करता हूँ की विश्व कप आपके हातों में देखूंगा। १२ ० करोड़ से अधिक भारतवासिओं का दुआ विफल नहीं होगा।
अपना ख्याल रखिये। पानी बचाने का प्रयत्न कीजिए। और अपने performance से निराश मत हो जाईएगा। गौतम बुद्ध को याद कीजिये -Success consists of going from failure to failure without loss of enthusiasm. फेसबुक के माध्यम से जरूर फीडबैक दीजिएगा मुझे।