शुक्रवार, 29 मार्च 2019

नमस्कार। २०१९ का तीसरा महीना। वित्तीय साल का पहला दिन। समय कैसे गुज़र जाता है। पता ही नही चलता। आप के साथ इस लेख के माध्यम से मिलने का सिलसिला अपने चौथे साल में कदम रख रहा है। इस वक़्त भी आप मेरा लेख पढ़ रहें हैं ,मैं इस लिए आपका आभारी हूँ और रहूँगा। मैं इस पत्रिका के एडिटर का भी आभारी हूँ जिन्होंने मुझे आपके लायक समझा। और परमात्मा को धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने हम सबको एक नए वित्तीय वर्ष में कदम रखने के लिए आशिर्वाद किया।
नया साल। नई उम्मीदें। नौकरी करने वाले को इन्क्रीमेंट और प्रोमोशन की चिंता। छात्रों को नए क्लास की उत्सुकता। व्यवसायी लोगों को व्यवसाय बढ़ाने का सोच। गृहबधु को परिवार के खर्चों को कम करने की सोच या बढ़ते हुए खर्चे को जुगाड़ करने की रणनीति। हम इतना चिंतित रहते हैं आगे की सोच कर कि वर्तमान का आनंद उठाना भूल जाते हैं। चैन से ज़िन्दगी के अब तक के सफर के लिए किस किस के आभारी हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में शायद चूक जाते हैं। और ऐसे लोग कई लोग होते हैं।
आपने कभी रोहन भसीन का नाम सुना है। मैंने भी नहीं सुना था। परन्तु किसी अख़बार में उनका एक फोटो ने मेरा दिल छू लिया। इस फोटो में रोहन एक बुजुर्ग महिला को आलिंगन में पकड़ कर रखा है। और दोनों के आँखों में भरपुर आँसू। आनंद का। कृतज्ञता का। यह फोटो एक हवाई जहाज के अन्दर लिया गया है। रोहन उस हवाई जहाज का कमाण्डर और उनके आलिंगन में उनके नर्सरी स्कूल की टीचर। और हवाई जहाज आसमान में भारत से अमरिका की ओर। और रोहन का एलान -'आज मैं इस हवाई जहाज का कमाण्डर ने सीखने का पहला कदम इनके साथ लिया था। 'और उनके टीचर ने क्या बताया। पहले दिन नर्सरी स्कूल में जब उन्होंने पूछा -बेटा तुम्हारा नाम क्या है ? पायलट रोहन भसीन। कौन कृतज्ञ था किसके प्रति ? दोनों एक दूसरे के प्रति। अक्सर हम अनेक रिश्ते में इस कृतज्ञता को भूल जाते हैं। नहीं भूल जाते हैं शायद , पर जाहिर नहीं करते हैं। और यही रिश्ता और मजबूत करने का मौका खो देते हैं। जरा याद कीजिए कब आपने रिक्शा चलाने वाले को धन्यवाद बोला है।
मैं कृतज्ञता या gratitude के विषय में काफी अध्यन कर रहा हूँ। मेरा दृढ़ विश्वास है कि कृतज्ञता हमें बेहतर ज़िन्दगी जीने में मदत करता है।

“Be thankful for what you have; you’ll end up having more. If you concentrate on what you don’t have, you will never, ever have enough.” —Oprah Winfrey

Oprah Winfrey के इस विचार ने मुझे जबरदस्त प्रभावित किया है। बचपन की याद आ जाती है। कॉन्वेंट स्कूल में दोपहर के भोजन के ब्रेक के पहले प्रार्थना -ऊपर वाले को धन्यवाद कहना रोटी के लिए। उस वक्त इसका महत्व नहीं समझता था। आज बात समझ में आती है। 
पूरी दुनिया में काफी अध्यन और रिसर्च चल रहा है कृतज्ञता पर। अमेरिका के एक प्रसिद्द यूनिवर्सिटी का अध्यन एक गज़ब निष्कर्ष पर पहुँचा है। जो इंसान में कृतज्ञता बोध है और जो उसको व्यक्त करने में नहीं हिचकिचाता है ,वह ज़िन्दगी में ज़्यादा सुखी है। क्यूँकि अभी तक ज़िन्दगी से वह खुश और संतुष्ट है। इसका तात्पर्य हरगिज़ यह नहीं है कि आप भविष्य में और तरक्की करने का प्रयास ना करो। जरूर करो। परन्तु अब तक के सफर के लिए मन ही मन सही ;किसी को तो धन्यवाद तो बोलो। ज़िन्दगी में हम हर किसी ने जब शुरुआत की थी ,अकेले नहीं की थी। कुछ हमसे आगे निकल गए ,कुछ पीछे रह गए। इसके लिए तो thank you बनता है। है ना। 
थोड़ा सोचिए और कोशिश कीजिए अपने आप को और अपनों को धन्यवाद बोलने का। सकून मिलेगा। मेरी बात मानिए। और यही सकून आपको इस नए वित्तीय वर्ष में नई उचाईओं को हासिल करने में मदत और प्रोत्साहित कीजिएगा। 
अगर आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो तो फेसबुक के माध्यम से जरूर बताईएगा। तहे दिल से धन्यवाद कहूँगा आपको। Happy New Financial Year आप सब को। 

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

नमस्कार। पलक झपकने के पहले ही हम इस वर्ष के तृतीय महीने में पहुँच गए हैं। अगले महीने वित्तीय साल का पहला महीना होगा। नई शुरुआत होगी व्यावसायिक वर्ष का। और स्कूल में नए क्लास का। स्कूल की बात छेड़ने पर पहली बात जो दिमाग में आती है- अनुशाषन यानि डिसिप्लिन। क्या अनुशाषन केवल बच्चों के लिए है ? आज चर्चा करेंगे अनुशाषन के विषय में।
आगे चर्चा बढ़ाने से पहले हमे नियम और अनुशाषन के बीच फर्क को समझना पड़ेगा। सूरज  सुबह पूर्व से ही उदय होगा और पश्चिम में अस्त होगा। यह प्रकृति का नियम है। इसमें कुछ नहीं बदलेगा कभी भी। परन्तु हम इन्सान ज़िन्दगी में कई नियम बनाते हैं और उस नियम को नहीं मानते हैं। बनाये हुए नियम को मानना और नहीं तोड़ना  अनुशाषन कहलाता है। उस वक़्त जब कोई आपको देख नहीं रहा है और आप फिर भी आप कानून नहीं तोड़ते हो ,स्वशाशन या सेल्फ डिसिप्लिन कहलाता है।
एक छोटा उदाहरण लीजिए। अगर पुलिस ने स्कूटर या मोटरसाइकिल सवारी के लिए हेलमेट पहनने का नियम बनाया है तो अधिकतर लोग तब तक हेलमेट का प्रयोग तब तक नहीं करते हैं जब तक पुलिस पकड़ कर जुर्माना नहीं करती है। पड़ोस में जब हम स्कूटर चला कर जाते हैं ,हम हेलमेट नहीं पहनते हैं क्योंकि हम 'नजदीक ' जा रहे हैं। दुर्घटना को क्या यह पता है कि आपकी सवारी नज़दीक की थी या मीलों की। अनुशाषन होना चाहिए कि मुझे अपने सर को किसी दुर्घटना से बचाने के लिए स्कूटर या मोटरसाइकिल का सवारी करते वक़्त हेलमेट जरूर पहनना चाहिए चाहे हम ५० मीटर का सवारी करें या ५०० मीलों का। पुलिस नियम जारी करने या ना करने पर हमारा निर्णय और वर्ताव एक ही रहेगा।
अकसर हमने ऐसे लोगों को अनुशाषन भंग करते हुए देखा है जो की दूसरे से सीनियर या पावरफुल समझता है अपने आपको। पुलिस की गाड़ी कई बार मुझे रास्ते में उलटी दिशा में आती हुई मिली है। ऑफिस में बॉस देर से आते हैं। छोटे मोटे वी आई पी अकसर किसी सेवा के लिए अन्य लोगों के साथ पंक्ति में खड़े नहीं होते हैं। बुजुर्ग बच्चों को ज्ञान देते हैं कि 'हमने बचपन में ऐसा किया या नहीं किया है ' आपने बचपन में क्या किया या नहीं किया उससे आपके बच्चे को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है क्योंकि वह इस वक़्त जो आपको करते हुए देखता है उसे सीख उसी से मिलती है।
मैं अनुशाषन का भक्त हूँ और उसके महत्व को समझता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं अनुशाषन को नहीं तोड़ता हूँ। परन्तु कुछ विषय और मामले में मैं कभी अनुशाषन को कभी नहीं तोड़ने की कोशिश करता हूँ। जैसे सफर के समय सावधानी बरतना। मैं गाड़ी के पिछले सीट पर बैठने के वक़्त सीट बेल्ट जरूर बांधता हूँ हाईवे के सफर के दौरान। ऑफिस में पहुँचने अगर किसी कारण देर हो जाए तो मैं अपने टीम के सदस्यों को पहले से ही इतिल्ला कर देता हूँ। इस सन्दर्भ में यह बताना जरूरी है कि समय पर ऑफिस पहुँचना अनुशाषन है। किसी कारण वश देरी हो जाने पर आगाम बतला देना भी एक अनुशाषन है। किस जगह मैं अनुशाषन तोड़ता हूँ ? खाने के विषय में। ऐसा खाना खा लेता हूँ जो कि सेहत के लिए सही नहीं है या खाना ठीक है तो जरूरत से ज़्यादा खा लेता हूँ।
पिछले हफ्ते मैं जयपुर में राजस्थान का नंबर एक पोजीशन प्राप्त प्राइवेट एम् बी ए कॉलेज के बच्चोँ को ज़िन्दगी में सफलता पाने के फार्मूला के विषय में समझा रहा था। मैं उनके अनुशाषन से मुग्ध हो गया और उन्हें यह समझाया कि अगर वो इस अनुशाषन को बरक़रार रखे तो उनको अपने मंजिल तक पहुँचने से कोई नहीं रोक पायेगा। इरादें और अनुशाषन दोनों जरूरत है सफलता के लिए। एक इंजन है तो दूसरा इंधन। एक दूसरे के बिना असम्पूर्ण हैं। सबसे चमकता उदाहरण हमारे भारतीय क्रिकेट टीम का वर्तमान कप्तान। क्यों ये बच्चे इतने अनुशाषित हैं जो कि आज अधिकतर कॉलेजों में नहीं देखा जाता है ? पूरा श्रेय कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ मंजु नायर और उनकी टीम को जाता है। इस टीम के अनुशाषन से हम सब प्रेरणा ले सकते हैं और सीख सखते हैं।
ज़िन्दगी में अनुशाषन लाना चाहते हैं ? छोटी -छोटी चीजों से शुरू कीजिये। अपनी और परिवार की सावधानी के लिए जो अनुशाषन जरूरत है , उसी से शुरू कीजिए। उम्मीद करता इसका महत्व आप समझते हैं। अगली बार जब मिलूंगा वित्तीय या पढ़ाई के नए साल में।  जहाँ आप अपने दिन का सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं ,वहाँ तो अनुशाषन को अपना अभिन्न अंग जरूर बनाइये। सफलता आपकी होगी। यही दुआ करता हूँ। स्वस्थ रहिये और सावधानी के साथ ज़िन्दगी गुज़ारिए। इसी में हम सबका मंगल है।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

नमस्कार। क्या आप सब मुझसे नाराज़ हैं किसी कारण ? अगर कोई नाराज़गी है तो ज़रूर व्यक्त कीजिए। किसी भी रिश्ते में नाराज़गी को व्यक्त ना करने से रिश्ते में दरार बनने की संभावना बढ़ जाती है। क्यों मुझे महसूस हो रहा है कि आप नाराज़ हो ?पिछले महीने के लेख के अंत में मैंने आप से प्रश्न पूछा था -अगर कुछ दोस्त एक साथ हो जाएँ तब क्या एक टीम बन जाती है ? किसी ने मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया।
प्रश्न का जवाब है -नहीं। कुछ दोस्त इकट्ठे होने पर टीम नही बनती। मैं एक व्यक्तिगत अभिज्ञता के वजह से इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। कई सीख मेरे सामने उभर कर पेश हुई। जो कि टीम बनने और काम करने के विज्ञान को कुछ हद तक गलत साबित करती है। मैं तीन मुख्य सीख को आपके लिए पेश कर रहा हूँ। दिसंबर के महीने में मैं और मेरी अर्धांग्नी दो दोस्त और उनके पत्निओ के संग विदेश के सफर पर गए थे। एक दोस्त मेरा  P G  पाठ्यक्रम कॉलेज का सहपाठी था और दूसरा दोस्त उसका U G पाठ्यक्रम का साथी। हमने करीब छह -साथ महीनों तक तैयारी की थी इस सफर के लिए। इस तैयारी में सबसे ज़्यादा अहम् भूमिका मेरे दोस्त के दोस्त ने निभाया। हमने  करीब १५ दिन एक साथ सफर किया। भूमिका के बाद तीन सीख।
टीम बनने के लिए टीम के सदस्यों को एक दूसरे के साथ परिचित होने पर टीम जल्दी बनती है। सही बात है। परंतु हर टीम में कोई टीम लीडर नियुक्त होता है या अपने काबिलियत के बल पर टीम लीडर बनने का हकदार बन जाता है। टीम के अन्य सदस्य अक्सर यह स्वीकार कर लेते हैं और इस वजह से टीम के संचालन में सुविधा होती है। दोस्तों की मंडली में यह नेतृत्व वाली कहानी इतनी आसान नहीं होती। क्यूँकि हर दोस्त का सोच दोस्ती के कारण होता है -हम किसीसे कम नहीं। इसका नतीजा -जितने लोग उतने विचार और हर कोई अपने विचार पर अटल।
दूसरी सीख है मैं अपनी तरह से आगे बढूँगा। साथ में मेरे दोस्त हैं। वह अपनी बात समझ लेंगे। टीम को सफल संचालन के लिए हर सदस्य को टीम की सफलता के लिए कुछ एडजस्टमेंट करने परते हैं। यह एडजस्टमेंट बहुत महत्वपूर्ण है टीम स्पिरिट को बनाने और बरक़रार रखने में। दोस्तों की टीम में हम एक दूसरे से यह उम्मीद रखते हैं कि यह तो उसे पता है ;तो फिर क्यों एडजस्ट करना। दोस्ती वाले महफ़िल में जो एडजस्टमेंट ज़रुरत नहीं परता ;दोस्तों के टीम में उसके बिना टीम नहीं चलता।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण सीख है सेंटीमेंट्स। दोस्त होने के नाते हम अक्सर कोई चीज़ अच्छे ना लगने पर भी कुछ नहीं बोल पाते हैं भावनाओं को कदर करते हुए। शायद हम ही कमजोर पर जाते हैं उस वक़्त। बोल नहीं पाते हैं जो बोलना जरूरी है। और इसी में चिढ़ और तनाव बढ़ जाता है क्रमशः। टीम में विभाजन हो जाता है। कानाफूसी शुरू हो जाती है। और हम अपना असली भावनाओं का दमन कर देते हैं। किसी भी रिश्ते का आनंद उठाने के लिए यह बाधा पहुँचाती है। स्पष्ट बातचीत का कोई विकल्प नहीं होता है किसी भी टीम के सफलता के लिए। दोस्तों के टीम में यह एक कमजोरी बन जाती है।
क्या आप सहमत है मेरे विचारों के साथ ?जरूर लिखिएगा और आपका विचार व्यक्त कीजिएगा। उम्मीद रखूँगा आपके विचारों का फेसबुक के माध्यम से। दोस्तों के साथ दोस्ती का आनंद लीजिए। टीम बनाना हो तो दुबारा सोचिए। खुश रहिए। 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

भावना ,कुशी ,श्रद्धा , बॉबी, हिमांशी , देवयानी। क्या है यह ?क्यों ज़िक्र कर रहा हूँ। नाम हैं। छह इंसान का। इनके साथ जोड़ता हूँ तीन और नाम -साजिद ,सँचिता और प्रीतम। छह से नौ हो गए। क्या हो गया है मुझे ? बिना किसी कारन मैं क्यों कुछ नाम आपके सामने पेश कर रहा हूँ ? कारन एक है -कुछ समय पहले यह लोग एक दूसरे के अजनबी थे। आज एक सफल team बन गए हैं। कैसे बना यह टीम ? क्या सीखा हमने इस प्रयोग से ? यही है आज चर्चा का विषय आपके साथ।
नमस्कार। और अभिवादन आप सब को नए साल का। आज नए साल का सातवाँ दिन। ५२ में एक हफ्ता गुज़र गया है पलक झपकने के पहले ही। इसी तरह समय दौड़ता चला जाएगा। रुकेगा नहीं। किसी के लिए। अगर समय का सही सदुपयोग करना है तो टीम बनाए या सही टीम से जुड़े। क्योंकि अगर आप अंग्रेजी भाषा में टीम शब्द को लिखें -TEAM - Together Everyone Achieves More -हम अकेले जितना हासिल कर सकते हैं ; मिल कर,  टीम बना कर उससे कहीं ज़्यादा हासिल कर सकते हैं। टीम काम के स्थान पर या खेल के मैदान में ही केवल नहीं बनता है ,निजी जीवन में भी इसका अहम् भूमिका है -इसकी चर्चा कभी और। हमारे टीवी पर दिखाए गए पारिवारिक सीरियल में आपने तो परिवार के सदस्यों के बीच गठबंधन तो जरूर देखा होगा। वह लेकिन टीम नहीं है। इस सिलसिले में कभी और बात करेंगे। आज चर्चा करेंगे टीम कैसे बनता है , चलता कैसे है और कैसे जीत हासिल करता है।  आज का यह लेख मैं उन नौ टीम के सदस्यों को उत्सर्ग करता हूँ जिनके नाम मैंने इस लेख के शुरू में किया है। टीम और teamwork का एक मिसाल बनने के कारन। मैं इस टीम पर गर्वित हूँ।
किसी भी टीम की सफलता का पहला कदम और सफलता की नींव टीम बनाते वक़्त बनती है। क्यों। एक कदम पीछे हट कर हम यह समझे की टीम की परिभाषा क्या है ?जब दो या उससे अधिक इंसान एक किसी मंजिल या गोल को हासिल करने के लिए एक साथ जुड़ते हैं तो एक टीम बनती है। परिभाषा सहज है। इसका प्रयोग कठिन। जो व्यक्ति टीम बनाने के लिए सदस्योँ का चयन करता है और उन्हें टीम में शामिल होने के लिए मोटीवेट करता है , उनका भूमिका महत्वपूर्ण होता है। कृपया गौर कीजिएगा -मैंने मोटीवेट करने की बात कही है ,मजबूर करने की नहीं। जो टीम का सदस्य बन रहा है उसका ऐसा महसूस होना जरूरी है कि इस टीम में काम करके मुझे आनंद मिलेगा। मेरा निजी तरक्की होगा -किसी भी सन्दर्भ में -ज्ञान , अच्छे लोगों के साथ जुड़ना या कमाई- मोटिवेशन कुछ या कई हो सकते हैं। । कैसे मोटीवेट होते हैं लोग एक अनजान टीम में जुड़ने के लिए ? ट्रांसपेरेंसी या क्लियर कट समझ इसका नीव है। टीम में मेरा रोल क्या है ? मुझसे क्या उम्मीद की जा रही है ? मुझे कितना समय देना पड़ेगा ? मेरी कमाई कितनी और कैसी होगी ?और सदस्य किस तरह के हैं ? जो मुझे टीम के लिए चयन कर रहा है उससे बात करके , मिल कर मुझे कैसा महसूस हो रहा है ? क्या मैं इस व्यक्ति या संस्था पर भरोसा कर सकता हूँ ? यहीं पर साजिद और सँचिता ने अपने व्यवहार और कम्युनिकेशन के जड़िये नए सदस्यों का दिल जीत लिया। एक बार दिल ने तय कर लिया , तो दिमाग भी साथ देता है।  और यही हुआ।
टीम तो बन गया। परन्तु सफलता के लिए टीम का संचालन कैसे होगा इसकी समझ हर सदस्य के लिए जरूरी है। तरह- तरह के तरीके अपनाते हैं लोग इस विषय पर। यह एक अलग विषय है चर्चा का। मेरे तजुर्बे में संचालन का तरीका कैसा भी हो , दो विषय पर ध्यान रखना आवश्यक है -टीम लीडर पहले टीम का सदस्य है और फिर लीडर है। दूसरी बात यह टीम के संचालन के नियम -कानून यानि की डिसिप्लिन की समझ हर सदस्य के लिए आवश्यक है । यह हर सदस्य पर प्रयोग होता है। टीम लीडर के लिए भी।
टीम बन गया है , टीम के संचालन के विषय में चर्चा भी हो चुकी है परन्तु टीम को गंतव्य या मंजिल को हासिल करने के लिए क्या चाहिए ? एक शब्द -कमिटमेंट -अर्थात टीम और टीम के मकसद के प्रति विश्वास और जूनून सफल होने का। बेहतरीन कमिटमेंट का प्रदर्शन किया है इस टीम ने। कई बाधा का सामना करना पड़ा टीम को , परन्तु उन्होंने परिस्तिथितिओं और बधाओं पर विजय प्राप्त किया। कहीं अधिक समय देकर ; ध्यैर्य के साथ पेश आ कर ; काम करने के तरीके को बदल कर, लम्बा सफर कर काम के स्थान तक पहुँच कर। परन्तु टीम ने समय पर और समय के अंदर काम को ख़त्म किया। कमिटमेंट के लिए क्या जरूरी है -flexibility यानि की परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बदलना और दृढ़ निश्चय के साथ डटे रहना। यहाँ मैं तारिफ करूँगा प्रीतम का। यह टीम उनकी कम्पनी के काम के लिए बनाया गया था। उसने कंधे से कंधा मिला कर काम किया। और प्रतिकूल समय पर उसने टीम का हौसला बढ़ाया और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने प्रतिकूल समय पर टीम की ओर ऊँगली नहीं उठाई या  इलज़ाम नहीं लगाया। टीम का वह अहम् हिस्सा बन गया। इसी लिए टीम ने उसके और उसके काम के सफलता के लिए जी जान लगा कर अपने कमिटमेंट का परिचय दिया। अक्सर कठिन समय पर इंसान दूसरों पर इलज़ाम का सहारा लेता है जो कि गलत होता है और टीम का मनोबल कमजोर कर देता है।
आप किसी टीम के सदस्य हैं या टीम बनाना चाहते हैं ? आप कुछ बताना चाहते हैं टीम के विषय में ? जरूर बता दीजिए मुझे फेसबुक के माध्यम से। मेरे लिए जो बात नई सीख होगी , मैं अपनी अगले लेख में शामिल करूँगा आपके नाम के साथ। यह वादा रहा। अगले महीने चर्चा करूँगा एक इंटरेस्टिंग विषय पर -अगर दोस्त एक साथ मिल जाते हैं तो क्या अपने आप टीम बन जाती है ? आपके विचार इस प्रश्न पर आमंत्रित करता हूँ। 2019 जो कि इस शतक का अंतिम वर्ष है एक teenager की हैसियत से, आपके और अपनों के लिए बेहतरीन हो , यही प्रार्थना करता हूँ परमात्मा से। खुश रहिए और जिंदगी का आनंद लीजिये। हैप्पी न्यू ईयर। आप सब को।  

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

नमस्कार। साल का बेहतरीन मौसम आ गया है। साल का आखरी महीना भी। पालक झपकने के पहले ही हर कोई अपने २०१९ के जन्मदिन की और कदम बढ़ा रहा है।
इसी जन्मदिन के सिलसिले में एक बात याद आ गया। तीन -चार दिन पहले फेसबुक में एक मित्र ने एक वीडियो पोस्ट किया -एक छोटा सा बच्चा अपना पहला कदम ले रहा है और परिवार वाले उसको प्रोत्साहित कर रहे हैं तालियां बजा कर। बच्चे को दो हातों से पकड़ कर कोई उसके पहले कदम को लेने में मदत कर रहा है। परिवार वाले उस बच्चे से दौड़ने की उम्मीद क्यों नहीं रखते हैं ?क्योंकि जब तक शिशु चलना नहीं सीख लेता है ;दौड़ना संभव नहीं है।
हम कभी अपने ज़िन्दगी को छोटी -छोटी मंजिल में विभाजित ना करने की गलती कर बैठते हैं। हम बहुत आगे की सोच कर अपना प्रयास करते हैं। और कभी -कभी असफल हो जाने के बाद अपना हौसला खो बैठते हैं। यह हम गलत करते हैं। माउंट एवेरेस्ट के चोटी पर पहुँचने के लिए पहले बेस कैंप तक पहुँचना पहली सफलता है। शुरू के क़दमों को इस बेस कैंप को गंतव्य बना कर चलना होगा। एवरेस्ट के चोटी को ध्यान में रखना होगा ,परन्तु कदम बेस कैंप तक पहुँचने के ईरादे से लेना पड़ेगा। बेस कैंप पहुँच कर खुद को मन ही मन प्रोत्साहित करना जरूरी है। और एनर्जी एवं हौसला बढ़ाने के लिए। अक्सर हम खुद को ऐसे छोटे विजय हासिल करने पर शाबाशी नहीं देते हैं। हमने लोगों को यह कहते हुए सुना है कि अभी मंजिल बहुत दूर है। सही बात है। परन्तु पहले पड़ाव का महत्वा अंतिम पड़ाव और गंतव्य से किसी भी मायने में कम नहीं है।
कहा जाता है कि शेर जब सोच समझ कर दो कदम पीछे हटता है ;वह और लंबी छलांग लेने की तैयारी कर रहा है। शेर क्यों ऐसा करता है ? अपने आप को तैयार करने के लिए। उस वक़्त शेर केवल अपने छलांग पर फोकस करता है। और किसी विषय पर नहीं। हमें भी ज़िन्दगी में ,शेर की तरह ,लंबी छलांग लगाने के लिए जान बुझ कर दो कदम पीछे हटना पड़ेगा। परंतु कभी -कभी हमारा अहंकार हमारे इस प्रस्तुति करने में बाधा बन जाता है।
हमारी सफलता का नीव हमारे दिमाग में है। और इस के लिए छोटी -छोटी सफलता जरूरी है। हम मंजिल तक पहले अपने दिमाग में पहुँचते हैं और फिर मंजिल की ओर कदम बढ़ाते हैं।
ज़िन्दगी के सफर में उतार -चढ़ाव एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जब हमें किसी कारन सफलता नहीं मिलती है जहाँ की हमें उसके सफलता मिल चुकी है ;हम विचलित हो जाते हैं और असफलता की वजह से मेहनत बढ़ा देते हैं। परन्तु शेर की तरह दो कदम पीछे हटने की बात नहीं सोचते हैं। एक उदाहरण पेश करते हैं इस विषय को और विस्तार से समझाने के लिए। क्रिकेट में जो खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट में सफलता हासिल कर चुके हैं ;अगर उन्हें चंद मैचों में असफल हो जाता है ;तो उसे रणजी ट्रॉफी प्रतियोगिता में खेलने की सलाह दी जाती है। यह शेर की तरह एक कदम पीछे हटना है। आशा की जाती है कि एक टेस्ट मैच का सफल खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी में सफलता  प्राप्त करके अपने आप का विश्वास वापस अर्जित कर पाएगा।
मैंने आज इस विषय पर लिखने के लिए क्यों सोचा ? अपनी कंपनी में पिछले दिनों मुझे महसूस हुआ कि मैं और हमारी टीम हर हफ्ते का मंजिल तय कर काम करने की कोशिश कर रहा था। परन्तु हमें अपनी उम्मीद से कहीं कम सफलता मिल रही थी। अब हमने दो से तीन दिन का मंजिल बनाना शुरू किया है। उससे भी महत्वपूर्ण निर्णय हमने यह लिया है कि हर बढ़ते हुए कदम का आनंद लेंगे और अपनी टीम के साथ सेलिब्रेट करेंगे। अचानक हमारी टीम का एनर्जी एकदम से बढ़ गया है। आशा करता हूँ कि हम अपनी उम्मीद पर खड़े उतरेंगे।
तो क्या रहेगा आपका वर्ष के अंत में हासिल करने का मंजिल? छोटे -छोटे कदम लीजिए। आनंद लीजिए ज़िन्दगी के सफर का। इस साल का अंत मंगलमय हो सबके लिए। और नए साल की शुरुआत हर किसी के ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन हो ,यही प्रार्थना करता हूँ परमात्मा से। खुश रहिए और याद रखिए कि हम सब में एक शेर मौजूद है। जरूरत पर दो कदम पीछे हट कर एक लम्बी छलांग ले कर देखिये कैसा लगता है। अपने अंदर के शेर को जागरूक कीजिए। आगे की ज़िन्दगी शेर जैसा बिताना है। लिखियेगा जरूर फेसबुक के माध्यम से। मुलाकात होगी २०१९ में। एक नए साल में। नई उम्मीदों के साथ। 

शनिवार, 3 नवंबर 2018

4 . 5 /9 . 0 क्या हो सकता है यह नंबर का तात्पर्य ? ५० प्रतिशत ? किसी विषय का आंकड़ा ? यह था सर्व निम्न पास मार्क्स मेरे पोस्ट ग्रेजुएट के प्रथम वर्ष से द्वितीय वर्ष में उत्तीर्ण होने के लिए। और मुझे उतने ही मिले थे। मेरे सात साथी को इससे कम मार्क्स मिलने के कारन एक सेमेस्टर की पढ़ाई दोहरानी परी थी। मैं गर्व के साथ एलान करता हूँ कि मैं अपने क्लास का पास करने वाले विद्यार्थिओं का अंतिम स्थान पर था। परन्तु मैंने ज़िन्दगी में आगे जाते हुए काफी सफलता अर्जन की है। आप इस वक़्त मेरा यह लेख पढ़ रहे हो , इतनी सफलता कितने लास्ट रैंक पाने वाले स्टूडेंट को नसीब होता है ?
मुझे क्या हो गया है कि मैं अपनी असफलता (अंतिम रैंक क्यूंकि लोग अपने प्रथम रैंक की चर्चा करते हैं ) की चर्चा कर रहा हूँ। दरअसल मैं एक पाठक का अनुरोध पर आज का चर्चा कर रहा हूँ।
नमस्कार। आप सब को दशहरे की बधाई। उम्मीद करता हूँ की नवरात्रि ,दुर्गा पूजा और दशहरा अपने ,अपनों के साथ धूम धाम से मनाया है। फेसबुक के माध्यम से इस विशेष पाठक ने मुझे परीक्षा में अच्छे और बुरे मार्क्स पर चर्चा करने का ज़िक्र किया। यह दूसरी बार इस पाठक के फरमाईश पर मैं इस लेख को पेश कर रहा हूँ। अगर आपकी कोई फरमाईश हो तो जरूर फेसबुक के जरिए मुझे बताए।
अच्छे और बुरे मार्क्स के सन्दर्भ में मैं पहली बात यह बताना चाहता हूँ कि आपका परीक्षा का मार्क्स परीक्षा के वक़्त आपका ज्ञान प्रदर्शित करता है। आपका उस विषय पर ज्ञान आपके परीक्षा में मिले मार्क्स के वनिस्पत बेहतर या बदतर भी हो सकता है।
दूसरी बात है कि विद्यार्थी के मार्क्स टीचर पर भी निर्भर करता है। कुछ टीचर अपने स्टूडेंट्स को यह अहसास कराना चाहते हैं की उनकी ज्ञान स्टूडेंट्स से कहीं अधिक है ,जो की अधिकतर विद्यार्थी के कम मार्क्स से प्रमाणित होता है। दूसरी ओर ऐसे भी शिक्षक हैं जो स्टूडेंट्स को सब्जेक्ट को और चाहने के लिए अच्छे मार्क्स द्वारा प्रोत्साहित करते हैं।
तीसरी बात है अभिभावकों का। मैंने हमेशा अभिभावकों को बच्चों को केवल यही पूछते सुना है -तुम्हे कितने नंबर मिले ? कभी यह नहीं सुना है पूछते हुए कि तुमने सीखा क्या है ? दरअसल माहोल ही अच्छे नंबर पाने वाले विद्यार्थी को बेहतर समझा है।
चौथी बात जो की हानिकारक है विद्यार्थी के लिए। अपने औकात के विषय में ज़्यादा समझ लेना केवल परीक्षा में मिले नंबर के कारन। ज़िन्दगी में आगे मैंने ऐसे कई ज़्यादा नंबर पाने वाले विद्यार्थी को काफी संघर्ष करते हुए देखा है अपने जीवन में। और मजे वाली बात है इनकी ईर्ष्या उन सहपाठी के विषय में जिन्होंने नंबर तो परीक्षा में कम पाया था लेकिन ज़िन्दगी में अधिक सफलता पाया है।
कुछ विद्यार्थी हैं जिनको पढ़ने में दिलचस्पी होती है और अपने सच्चे ज्ञान के कारन उनको हर परीक्षा में अच्छे नंबर प्राप्त होते हैं। कभी कभार किसी एक परीक्षा में नहीं। इस तरह के विद्यार्थी रिसर्च और पढ़ाने के कैरियर को ज़्यादा पसंद करते हैं। यह लेख उनके लिए नहीं है।
एक समय करीब २० -३० साल पहले जिस वक़्त स्कूल के बाद अच्छे कॉलेज में दाखिल होने के लिए बारहवीं क्लास का मार्क्स बहुत महत्वपूर्ण होता था। अभी भी है कुछ कॉलेज में दाखिल होने के लिए। फर्क इतना है कि पिछले शतक में कैरियर ऑप्शंस आज की तुलना में काफी कम थे।
क्या करना चाहिए विद्यार्थी को ? जिस परीक्षा के मार्क्स के जरिए आगे की पढ़ाई के लिए अच्छे कैरियर चॉइस मिलेंगे उन परीक्षा में अपने सच्चे ज्ञान के लायक मार्क्स लाने पड़ेंगे। हर विद्यार्थी को ९० प्रतिशत या उससे ज़्यादा मार्क्स नहीं मिलेंगे। मजे वाली बात यह है कि ९० प्रतिशत विद्यार्थी को ९० प्रतिशत से कम मार्क्स हासिल होंगे। मेरे दोनों बेटों को भी नहीं मिला है कभी। परन्तु दोनों बच्चों ने अपने इंटरेस्ट के अनुसार एक विषय को चुन लिया था , स्कूल में। और इस चुने हुए विषय पर उन्होंने हमेशा परीक्षा में अच्छे मार्क्स अर्जन किए। दोनों अभी विदेश में अच्छे यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं।
विदेश में पढ़ाने के तरीके अलग होते हैं। परीक्षा से ज़्यादा असेसमेंट होता है जिससे विद्यार्थी की समझ का अनुमान मिलता है , रट कर किताबी ज्ञान को याद रखने का नहीं। आपको थ्री इडियट्स फिल्म का वह दृश्य जरूर याद होगा जिसमे प्रोफेसर ने क्लास को पूछा था -मशीन क्या है ? और रैंचो का जवाब था वह सब जो कि इंसान का समय बचाये या ज़िन्दगी को बेहतर जीने में मदत करे। उसके बाद क्या हुआ था आप सबको याद होगा। अगर आपने फिल्म नहीं देखी हो तो ,ज़रूर देखें। मार्क्स महत्वपूर्ण जरूर हैं लेकिन कम मार्क्स पा कर भी सफलता मिली है अधिकतर लोगों को जब उन्होंने उस विषय को चुना जिसमे उनकी दिलचस्पी हो। फिर किताबें परीक्षा के लिए नहीं बल्कि नॉलेज के लिए पढ़ा जाता है।
धन्यवाद एक बार फिर क्लास के इस लास्ट रैंक प्राप्त किये हुए स्टूडेंट के लेख को पढ़ने के लिए। मैं आपके प्रोत्साहन का आभारी हूँ और रहूँगा भी। दीपावली और धनतेरस की शुभकामनायें। आनंद लीजिये और अपना और अपनो का ख्याल रखिए। 

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

नमस्कार। पिछले महीने मैंने ५० -५० पर मैंने चर्चा किया था। हम सब लोगों का किसमत ५० -५० होता है। जब सहायक होता है हम भूल जाते हैं कि किसमत साथ नहीं भी दे सकता था। प्रश्न यह होता है कि इस सन्दर्भ में इंसान क्या कर सकता है?
मैं उदाहरण स्वरुप इस साल दुबई में आयोजित एशिया कप क्रिकेट के विषय में चर्चा करूँगा। दो मैचों के विषय में बातचीत करूँगा -भारत बनाम अफगानिस्तान और फाइनल में भारत बनाम बांगलादेश। दोनों मैचों में कई आंकड़ें एक जैसे थे और एक महत्वपूर्ण फर्क था। दोनों मैच में भारत अपने प्रतिद्वंदी से क्रिकेट के विश्व रैंक में बहुत आगे था। दोनों मैच में प्रतिद्वंदी टीम ने पहले बल्लेबाज़ी की। और दोनों टीम ने ऐसा कोई स्कोर का टारगेट नहीं खड़ा किया जो की भारत के लिए मुश्किल हो। फर्क इतना था कि अफगानिस्तान के खिलाफ भारत ने अधिकतर सीनियर खिलाड़ी और कप्तान को विश्राम दिया। परन्तु फाइनल में पूरी टीम बांगलादेश के विरुद्ध मैदान में मुकाबला कर रही थी।
अफगानिस्तान का मैच टाई हो गया -यानि दोनों टीम के स्कोर बराबर थे ,मैच के अंत में। और इस मैच में करीब दो सालों के बाद भारत के सबसे सफल कप्तान टीम का नेतृत्व कर रहे थे। जिनके विषय में कई बार कहा जाता था कि वह सौभाग्य का सबसे प्यारा सुपुत्र है। हमारे पहले विश्व कप विजेता अधिनायक ने भारत के पहले टी -२० विश्व कप विजय के बाद मजाक में कहा था -मैंने भी १९८६ में शारजाह में आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में पाकिस्तान के विरुद्ध आखरी ओवर एक शर्मा को डालने के लिए दिया था जहाँ आखरी गेंद पर पाकिस्तान के बल्लेबाज़ ने छक्का मारा था और आज इस टी -२० फाइनल में पाकिस्तान के विरुद्ध आखरी ओवर भी एक शर्मा ने डाला। आज के कप्तान खुश किस्मत हैं कि पाकिस्तान का बल्लेबाज़ छक्का मारने के प्रयास में भारतीय खिलाड़ी को कैच दे डाला। -तो क्या हमारे क्रिकेट के इतिहास के सबसे सफल कप्तान केवल अपनी खुश -किस्मती के कारन सफल थे ? उन्हें कप्तान 'कूल ' का विशेषण क्यों दिया गया था ? कठिन परिस्थितिओं में वह विचलित क्यों नहीं होते थे ? हार या जीत हो मैच के अंत में वह मीडिया के सामने सदा मुस्कुराते हुए क्यों नज़र आते थे ? मेरा विश्लेषण उनके विषय में एक ही सिद्धांत की ओर ले जाता है -हमारे कप्तान कूल हारने से कभी नहीं डरते थे। उन्हें पता है कि हार -जीत खेल का एक अभिन्न अंग है। इसी लिए ना ही जीतने के बाद उन्हें किसी ने जरूरत से ज़्यादा सेलिब्रेट करते हुए देखा है ,ना ही बुरी तरह हारने के बाद उनके चेहरे पर मायूसी देखी है। अगर आपने गौर किया होगा हमारे कप्तान कूल विश्व कप जीतने के बाद टीम के हाथ में ट्रॉफी सौंप कर गायब से हो गए ! इस बार भी उन्होंने अफगानिस्तान की भरपूर प्रशंसा की उनके उमदा प्रयास के लिए। अगर भारत यह मैच हार भी जाता हमारा कप्तान विचलित नहीं होता। क्यूँकि उन्होंने ५० -५० के मूल चिंता को अपना लिया है।
अब चर्चा करते हैं फाइनल के विषय में। जब भारत ने अपनी पारी शुरू की बांगलादेश के विरुद्ध भारत को जीत के लिए प्रति ओवर पाँच रन से कम की गति से रन बटोरने थे। जो कि आज के टी -२० के युग में इस भारतीय टीम के लिए बाँये हात का खेल था। परन्तु बीच में भारत की पारी लरखरा गयी और अंत में भारत ने आखरी गेंद पर विजय हासिल किया। भारत के कप्तान ने राहत की साँस ली होगी। परन्तु भारत अंत में सफल क्यों हुआ ?क्या केवल भाग्य ने साथ निभाया ? जरूर निभाया।  परन्तु क्या भाग्य साथ निभा सकता अगर एक बल्लेबाज़ जो कि चोट के कारन पारी के बीच में मैदान छोर कर चला गया था , वापस अपने चोट के बावजूद वापस नहीं आ जाता अपने टीम की ज़रुरत के लिए ? हो सकता है कि इस कारन इस खिलाड़ी को पूरी तरह फिट होने में कहीं अधिक समय लग जाए। अगर यह बात सच हो जाए तो इस खिलाड़ी अपने भाग्य को कोसेगा या फाइनल जीतने के लिए धन्यवाद करेगा ? इस उदाहरण से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि हमें इंसान की हैसियत से तब तक बिना निराश हुए मेहनत करते रहना चाहिए। भाग्य को फिर हम हमें सहायता करने का मौका दे रहे हैं। नहीं तो भाग्य भी क्या करेगा।
कल हमारे राष्ट्र पिता का जन्मदिन है। आज हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। इसके लिए उनका और अनेक स्वतंत्रता सेनानी को सश्रद्ध प्रणाम।  उनके तरीके अलग हो सकते थे , लेकिन गोल एक ही था। और उन्होंने ५० -५० पर शायद भरोसा किया होगा। दशहरा का महीना।  आप सब को अग्रिम बधाई। खुश रहें।