शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

Happy New Year

नमस्कार। २०२४ के लिए हमारी शुभकामनाएँ। हैप्पी न्यू ईयर। हम हर किसी को नए साल के शुरुआत में  हैप्पी न्यू ईयर कह कर ऊनके लिए हैप्पी होने का दुआ करते हैं। आज का लेख इसी सन्दर्भ में है। 

हम खुद चाहते हैं कि हम हैप्पी रहें और हमारे अपने भी हैप्पी रहें। परन्तु हमने कभी यह सोचा है कि हमारा हैप्पीनेस का मापदंड क्या है और हम कैसे अपना हैप्पीनेस बढ़ा सकते हैं ? आपने कभी सोचा है इस विषय पर अपने लिए ? क्या निष्कर्ष रहा आपका ,खुद के लिए ? आपने क्या कभी अपनों के लिए यही प्रश्न किया है ? अपने जीवन साथी को क्या हैप्पी बनाता है ? शायद आपने उतनी गहराई के साथ सोचा होगा जैसा कि आप इस वक़्त सोच रहे होगे ,इस लेख को पढ़ते वक़्त। 

हैप्पीनेस दो तरह के होते हैं -एक जो कि अप्रत्याशित है और दूसरा जो कि परिकल्पित या प्लैन्ड है। उदहारण स्वरुप आप चाहते हैं कि आपका बच्चा, जो कि पढ़ाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रखता है ,परीक्षा में अच्छे मार्क्स लेकर आए। सहज प्रश्नपत्र होने की वजह से अगर उसे अच्छे मार्क्स मिल जाए तो आप हैप्पी हो जायेंगे। यह अप्रत्याशित हैप्पीनेस का एक नमूना है। एक और उदाहरण -आप अपना वज़न कम करना चाहते हो।  कुछ नहीं करने के बावजूद आपका वज़न घट जाता है। आप हैप्पी हो जाओगे। अप्रत्याशित हैप्पीनेस। एक मात्र असुविधा है कि इस हैप्पीनेस पर आपका कोई कण्ट्रोल नहीं है। आप इसको दोहरा नहीं सकते हो। आपको अच्छे समय का इंतज़ार करना पड़ेगा। हैप्पी होने के लिए। 

परिकल्पित हैप्पीनेस के लिए यह समझना पड़ेगा कि मेरा हैप्पीनेस कहाँ छुपा है। मेरा तजुर्बा बताता है कि हम खुद के साथ इस विषय पर सोचते नहीं हैं। कुछ ऊपरी अनुभूति हमें खुश करती है। जैसा कि मैं चूँकि खाने का शौक़ीन हूँ ,अच्छा खाना मुझे खुश कर देता है। यह ख़ुशी महत्वपूर्ण और जरूरी है। परन्तु जिस  ख़ुशी को समझने के लिए और गहराई से सोचना जरूरी है ,उस पर सोच विचार करना जरूरी है। मुझे ख़ुशी मिलती है जब मैं दूसरों को प्रोत्साहित कर पाता हूँ अपने सोच के माध्यम से। यह उपलब्धि मुझे तब हुई जब आप जैसे कई पाठक मेरे साथ फेसबुक के माध्यम से मेरे साथ जुड़ने लगे , मुझे प्रश्न पूछने लगे अपने कैरियर या दुविधा के विषय में। इस लिए मैं हर महीने कोशिश करता हूँ नए सोच के साथ अपने लेख को पेश करने का। 

अपनों के हैप्पीनेस के विषय में हम अक्सर एक गलती कर बैठते हैं। हम अपने हैप्पीनेस को अपनों का हैप्पीनेस समझ बैठते हैं। कई अभिवावक अपने बच्चों को गाना सीखने के लिए मजबूर करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि गाना सीखने से बच्चे को दूसरे बच्चों के तुलना में आगे रहने में सहायता होगा और उनको अपने बच्चे पर और गर्व होगा। परन्तु बच्चा शायद गाना सीखने में दिलचस्पी ना रखता हो। मजबूरी के कारण वह गाना सीखने की कोशिश करता है। ताकि उसके अभिवावक नाराज ना हो। यह हैप्पीनेस का गलत नमूना है। 

मेरा मानना है कि हमें अपने लिए हैप्पीनेस के लिए ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिसके कारन कोई और दुखी हो जाए। यही हैप्पीनेस का पहला नियम है। परन्तु हैप्पीनेस का मूल मंत्र क्या है ? हाल में एक हिंदी सिनेमा में मुख्य किरदार ने एक बेमिसाल डायलाग बोला है -हैप्पीनेस इस अ डिसिशन -अर्थार्थ हमारी ख़ुशी हमारा डिसिशन है। और किसी का नहीं। खुश रहिए। हैप्पी न्यू ईयर। 

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

नमस्कार। साल का आखरी महीना। हर कोई चाहता है कि यह महीना अच्छे से गुज़र जाय और हम नए साल में बिना किसी बाधा या असुविधा के साथ प्रवेश करें। जरा सोचिए उस मजदूरों और उनके परिवार के विषय में जो की एक सुरंग में अटक गए थे। ४१ मजदूर और उनके परिवार पर क्या गुजरी होगी। उन सबको सलाम जिन्होंने अनहोनी को होनी कर दिखाया। सबसे ज़्यादा हौसला बढाती है मजदूरों का साहस और वापस उसी काम में जाने का निर्णय। उन्होंने प्रमाण कर दिखाया है कि डर के आगे जीत है। और यही सोच उनको विश्वास दिला रहा था जब तक वह अंदर थे। कैसे संभव  हुआ यह अभियान ? यही आज के लेख का विषय है। 

पहली बात है टीम वर्क। जो अंदर थे और जो बाहर से मदत कर रहे थे ,उनमें ताल मेल बेहतरीन रहा। अंदर -बाहर दोनों टीम के सदस्यों ने एक दूसरे का साथ निभाया और नेतृत्व की बात सुनी। चूँकि कठिन था उद्धार कार्य तरह तरह के विशेषज्ञ जुड़ रहे थे इस अभियान में। इसका मतलब है कि लीडर बदल रहा था जरूरत के अनुसार। और टीम के सदस्य इस परिस्थिति पर निर्भर अलग अलग लीडर को स्वीकार किया और उनके निर्देशों का पालन किया। यह बहुत महत्वपूर्ण है हमारे हर किसी के जीवन में। इसे कहते हैं विशेषज्ञ का नेतृत्व जो कि उम्र में कम या जूनियर हो सकता है। दबे हुए लोगों में दो लीडर थे और उनकी बात सब लोगों ने सुना। काम करते वक़्त अगर उनमें कोई मतभेद होता भी होगा , उन्होंने संकट के समय ऐसे विचारों को अपने बीच दरार करने नहीं दिया। 

दूसरी बात है संचार बरक़रार रखना दोनों टीम के बीच। और सबसे महत्वपूर्ण सीख है कि जब संचार बरक़रार रखने के लिए वार्तालाप संभव नहीं हो रहा तब इशारों के माध्यम से संचार बनाए रखना है। दबे हुए टीम के लीडर ने दिमाग लगा कर पानी के सप्लाई को चालु और बंद किया बीच -बीच में ताकि बाहर के टीम को यह समझ में आए कि अंदर लोग जिन्दा हैं और दिमाग के साथ काम कर रहें हैं। इसी लिए कहा जाता है कि समझने वालों के लिए इशारा ही काफी है !

तीसरी बात है डर और स्ट्रेस का सामना करना। कोई भी ऐसी परिस्थिति में घबड़ा जाएगा। यही स्वाभाविक है। परन्तु परिस्थितिओं का मूल्याङ्कन करने के बाद इस डर से जूझने का रणनीति सोच कर प्रयोग करना ही एक मात्र उपाय होता है। और घबराहट को दूर करने का एक उपाय है अपने अंदर के बच्चे को प्रोत्साहन देना। बच्चे कम डरते हैं। यही दबे हुए टीम ने किया। बचपन में जो खेल सब ने खेला है ,उसमें मशगूल रहे। दिमाग व्यस्त रहा और टेंशन भी कम हुआ। 

चौथी सीख है शीर्ष स्थानीय नेतृत्व का हर वक़्त वहाँ मौजूद रहना और लगातार निर्णय लेना बिना किसी विलम्ब के। मशीन लाए गए। विशेषज्ञ देश -विदेश से बुलाए गए और अंत में एक ऐसे टीम को बुलाया गया जिन्हें 'रैट माइनर्स ' के नाम से सम्बोधित किया जाता है और जो अपने हातों से खुदाई करते हैं। दो -तीन निर्णय ऐसे लिए गए जिसमे रिस्क या खतरा था , परन्तु शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे फैसले लिए बिना विलम्ब के जो कि फायदेमंद रहे। इसी लिए कहा जाता है कि ज़िन्दगी में रिस्क ना लेना ही ज़िन्दगी का सबसे बड़ा रिस्क होता है। 

अंतिम सीख है विश्वास करना और उम्मीद के साथ मुक़ाबला करना की हमें विजय प्राप्त होगा। अपने आप पर और पूरी टीम पर भरोसा रखना अति आवश्यक है। बाहर निकलने के बाद दो में से एक लीडर ने सामवादिक सम्मेलन में गर्व के यह बोला कि हमारे देश ने विदेश से भारतीय नागरिकों को कठिन परिस्थितिओं से बचाव किया और सुरक्षित उनके परिवार वालों से मिलाया है। हम तो अपने देश में ही थे !

४१ परिवारों को बधाई और सलाम आपके धैर्य और अधिकारिओं पर भरोसा रखने के लिए। और सादर प्रणाम टीम के हर सदस्य को इतने जान को सुरक्षित उद्धार करने के लिए। मेरा अटूट विश्वास है कि इस घटना पर फिल्म जरूर बनेगी। जो भी यह फिल्म बनाएगा उनसे सविनय निवेदन है कि उस फिल्म के अभिनेता इन्हे ही बनाइये क्योंकि यही असल हीरो हैं !

आप सब को नए साल की अग्रिम बधाई। स्वस्थ रहिए और ख़ुश रहिए। फिर मुलाकात होगी नए साल में। 

गुरुवार, 23 नवंबर 2023

नमस्कार। नवंबर का महीना। धनतेरस ,दिवाली और बाल दिवस का महीना। सर्दी के मौसम  को स्वागत। अच्छी सब्जियों का मौसम। और कुछ रुकावट के बाद शादी की तारिखियाँ। हर दृष्टिकोण से खुश मिजाज रहने का निमंत्रण। क्या आप खुश हैं ? आपका समय कैसा गुजर रहा है। क्या आपने धनतेरस में खरीदारी की ? क्या आपने दिवाली में पटाखे का आनंद उठाया। दिया और रौशनी को उपभोग किया है ?

मेरा मानना है कि कई इंसान अपने आप को इन छोटी छोटी आनंद से वंचित करते हैं। इसका प्राथमिक वजह है अपने अंदर विराजमान बच्चे को अस्वीकार करना और उस बच्चे को अपने मस्तिष्क में प्रोत्साहित नहीं करना। आपने अक्सर सुना होगा कि पटाखों के साथ खेलना बच्चों का खेल है। हम क्यों अपने आप को रोकते हैं ?

मूल वजह है कि हम हर वक़्त अपने आप का मूल्यांकन करते रहते हैं। जो कि हम बचपन में नहीं करते थे। हम ज़्यादा निडर थे। हमें असफल होने का डर नहीं था। लोग क्या कहेंगे यह चिंता दिमाग में नहीं आता था। कभी भी। अभी हम खुद भी नहीं करते हैं और बच्चों को भी रोकते हैं इसी डर से। 

अगर आप मेरे सोच से सहमत हो और इस विषय में अपने लिए कुछ करना चाहते हो तो आपके पास दो उपाय हैं। पहला विकल्प है ऐसा कुछ करना जो कि आप बचपन में करते थे और उससे आपको आनंद मिलता था। उदाहरण स्वरुप हम जैसे काफी लोग बचपन में अपने गली या मोहल्ले में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। अभी शायद हम लोगों का गली या मोहल्ला बदल चूका है। परन्तु आस पास जरूर बच्चे क्रिकेट खेलते होंगे। उनके साथ खेलने का प्रयास कीजिये। इस बात का परवाह मत कीजिए कि आप कितना रन बना पाते हैं ,कैच पकड़ पायेंगे या नहीं या गेंदबाज़ी में आपका प्रदर्शन कैसा रहेगा। जब तक आप इन चिंताओं से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकेंगे आप अपने बचपन में वापस नहीं जा सकेंगे। 

दूसरा उपाय है कि ऐसा कुछ कीजिये जिसका आपका बचपन से शौक था परन्तु किसी वजह से कर नहीं पाए हैं। मेरा एक मित्र एक सफल कैंसर सर्जन है। इस कारन ज़्यादा मरीज़ उनके पास चिकित्सा के लिए संपर्क करते हैं। और कैंसर में ज़्यादा मरीजों का देहांत होना स्वाभाविक होता है। मेरा यह मित्र जितना अपने काम और कला से आनंद लेता था ,उतनी ही उसे उदासी होती थी जब कोई मरीज गुज़र जाता था। और यह उसको बहुत सता रहा था। एक करीब के दोस्त के नाते मुझे भी उसकी उदासी खल रही थी। एक दिन बातचीत के दौरान यह उभर कर आया कि मेरे दोस्त का एक सपना था पियानो बजाना सीखना। परन्तु पियानो महँगा होने के कारन यह सपना साकार नहीं हुआ। वह इस बचपन के सपने को अब साकार कर रहा है ,कितना अच्छा बजा रहा है महत्वपूर्ण नहीं है , परन्तु अपने बचपन के शौक के माध्यम से हर शाम वह रिलैक्स करता है। कुछ समय तक अपने बचपन का सैर करके। 

इस महीनें दिवाली दो बार मनाया जाता अगर भारतीय क्रिकेट टीम विश्व चैंपियन बन जाती। तरह तरह के विचार व्यक्त किये जा रहें हैं इस असफलता के विश्लेषण में। इसका कोई फायदा नहीं है सिवाय समय नष्ट करने का। परन्तु इस प्रतियोगिता में हमारी टीम ने दस लगातार मैच जीत कर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। पर उससे भी ज़्यादा अहम् बात है दर्शकों को जो आनंद मिला है इस टीम के खेल को देख कर। और यह संभव हुआ है केवल एक निर्णय से जो कप्तान और कोच ने लिया था -हर खिलाड़ी को स्वाधीनता दिया गया था अपने प्रतिभा का प्रदर्शन करके खुद का आनंद लेने का -बिना किसी चिंता के फेल होने का। उनकी जगह टीम में सुरक्षित थी अगर वह असफल भी हो गए तो। निडर होकर क्रिकेट खेलो -यही था मूल संदेश। 

अपनी ज़िन्दगी से आनंद लीजिये। यही है जीने का एक मात्र फार्मूला। और इसके लिए अपने बचपन से जुड़े रहिये। मुलाकात होगी आपके साथ इस साल के आखरी महीनें में। तब तक खुश रहिये। स्वस्थ रहिए।  


शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

 नमस्कार। अक्टूबर का महीना। बापू के जन्मदिन का महीना। राष्ट्रीय छुट्टी का दिन। कई नए कार्यक्रम का उद्घाटन। हर साल। बापू के विषय में इतने लेख मौजूद कि नए लेख को मेहनत करना पड़ता है पाठकों को आकर्षित करने के लिए। मेरा आज का लेख यही प्रयास करेगा। 

बापू को आर्टिस्ट लोगों ने तरह तरह से दर्शाया है। उन सब में आज मैं आप सब का ध्यान बापू के ऐनक पर आकर्षित करना चाहता हूँ। मेरे लिए बापू के ऐनक दूरदर्शिता का प्रतिनिधित्तव करते हैं। अंग्रेजी भाषा में जिसे हम विशन के नाम से जानते हैं। यह विशन हर किसी के लिए आवश्यक है। परन्तु अधिकतर लोग इस विषय पर उतना ध्यान नहीं देते हैं। चाहे आप विद्यार्थी हो ,व्यवसायी हो ,नौकरी में हो या अवसर प्राप्त हो ,सबको अपना विशन निर्धारित करना जरूरी है। जब तक आपके दिमाग में अपने लिए या अपने कैरियर के लिए या अपने व्यवसाय के लिए कम से कम आने वाले तीन साल का गंतव्य नहीं दिख रहा हो ,आप उस सफर के लिए प्रस्तुति नहीं ले सकते हैं। यह जरूरी है ताकि आपको अचानक ऐसे परिस्थितिओं का सामना ना करना पड़े जिसके लिए आप तैयार ना हो। 

आप अपना विशन कैसे निर्धारित करेंगे। आइये बापू से सीखते हैं। बापू ने अहिंसा को क्यों अपना हथियार बनाया अंग्रेज़ों को भगा कर हमारे देश को आजादी दिलवाने के लिए। उन्होंने अपने ताकत को अपनाया। स्वतंत्रता के पहले हमारे पास ना ही थे हथियार ना थी सेना अंग्रेज़ो का मुक़ाबला करने के लिए। हिंसा वाली लड़ाई में अंग्रेज़ों का पल्ला भारी था ,और हमारा कमजोर। परन्तु हमारी जनसँख्या हमारी ताकत थी। बापू को केवल अपने नेतृत्व से लोगों को ललकारना था उनसे जुड़ने के लिए। दांडी यात्रा नमक के लिए शुरू हुआ। नमक के बिना खाना नहीं बन सकता। यह बात लोगों दिल ,दिमाग और पेट से जुड़ गया। बापू को यह भी पता था कि अहिंसा के आधार पर यह लड़ाई लंबा चलेगा। सफलता मिलने में समय लगेगा और अंग्रेज़ लोगों का मनोबल तोड़ने के लिए कुछ भी करेगा। इसी लिए लोगों को साथ बनाये रखने के लिए बापू ने खादी बनाना और पहनना शुरू कर दिया। खादी बनाने का चक्र स्वाधीनता का एक चिन्ह बन गया। लोगों के  स्वाभिमान को एक जबरदस्त प्रोत्साहन मिला। अंग्रेजी कपड़ों को बहिष्कार करके लोगों को एक अलग किस्म के स्वाधीनता का एहसास हुआ। 

अगर आप अपने विशन को निर्धारित करना चाहते हैं तो पहले अपना गंतव्य तय कीजिये। यह निर्णय दो चीज़ पर निर्भर है -आपका स्ट्रेंथ और भविष्य की संभावना। एक उदाहरण स्वरुप समझिये आपका एक दुकान है किराणा दुकान। आप मालिक हो और आप अगले तीन साल में अवसर लेना चाहते हो। आपका वारिस आपकी इकलौती बेटी है जो कि इस वक़्त शादी शुदा है और आपके पड़ोस में रहती है। इस वक़्त वह निर्णय ले पा रही है कि वह आपके दुकान की जिम्मेवारी संभालेगी या नहीं। आप क्या करोगे इस स्थिति में। यह तय करेगा आपके गंत्वय का सफर। जहाँ आपको यह पता होगा कि आपके लड़की का विकल्प होगा अगर वह जिम्मेवारी लेने से इंकार कर दे। यह होता है विशन तय कर लेने का फायदा। 

उम्मीद करता हूँ कि बापू के जन्मदिन के अवसर पर आप अपने ज़िन्दगी को एक विशन दोगे और उस दिशा में कदम बढ़ाओगे। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है। फिर मिलेंगे अगले महीने दशहरे के बाद। नवरात्री और दूर्गा पूजा के आप सबको अग्रिम बधाई। त्योहारों का समय आपके लिए मंगलमय हो। 

नमस्कार। इस वित्तीय वर्ष के छटे महीनें में आप का स्वागत। सितम्बर का महीना। शिक्षक दिवस का महीना। हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्मदिन के अवसर पर अपने  शिक्षक को प्रणाम। इस साल भारत के लिए शिक्षक वर्ग के लिए और भी खुश होने के कई कारण हैं। चंद्रयान की सफलता। भारत के युवा खिलाड़ी का शतरंज की दुनिया में अतुलनीय सफलता और विश्व एथलेटिक्स चम्पिओन्शिप्स में भारतीय प्रतियोगी का जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतना और रिले रेस में भारतीय टीम का फाइनल में हिस्सा लेना। इन सब सफलता के पीछे एक नहीं ,अनेक शिक्षक और गुरु का निस्वार्थ योगदान है। तो गुरु या शिक्षक कौन होता है और विद्यार्थी कौन है। इसी विषय पर आज का लेख है। 

खुद से प्रश्न कीजिये कि आपका गुरु कौन है। क्या जिन शिक्षक ने आपको स्कूल ,कॉलेज या किसी शिक्षा संस्थान में आपको पढ़ाया या सिखाया है केवल आपके शिक्षक हैं। शायद नहीं। उनके अलावा भी कुछ ऐसे इंसान होंगे जो शिक्षक नहीं होने के बावजूद आपको कुछ ना कुछ सिखाया है। यह इंसान कोई भी हो सकता है। परन्तु आपकी ज़िन्दगी में हर इंसान ऐसा नहीं हो सकता है। स्कूल या कॉलेज के मास्टरजी या अध्यापक से ऐसे लोग अलग कैसे हैं। फर्क है मजबूरी और स्वेच्छा के साथ स्वयं चुनने का। किसी भी मजबूरी के बिना। स्कूल में किसी भी विषय के अध्यापक को चुनने का विद्यार्थी का कोई हक़ नहीं होता है। नियुक्त किए हुए शिक्षक को स्वीकार कर लेना हम सब की मजबूरी है। परन्तु अध्यन के बाहर के गुरु का चयन हम खुद करते हैं बिना किसी मजबूरी का। 

हमारे इस गुरु के चयन में अपना स्वार्थ जुड़ा होता है। चाहे वह धार्मिक गुरु हो या काम के क्षेत्र का गुरु हो। हम उनको गुरु के दर्जे पे स्थापित करते हैं जिनसे हमें कोई फ़ायदा हो। यह किसी भी दृष्टिकोण से गलत नहीं है। किसी से सलाह लेना उस व्यक्ति को गुरु का दर्जा नहीं दिलवाता है। गुरु ऐसा इंसान होता है जिसके सन्दर्भ में आने से सुकून या मार्ग दर्शन मिलता है। मेरा मानना है कि गुरु शिष्य को नहीं ढूँढ़ता है। शिष्य गुरु को ढूंढ लेता है। 

गुरु और शिष्य का यह रिश्ता एक अंदरूनी विश्वास पर टिका होता है जिसका भीत है एक दूसरे के प्रति सम्मान। इसका तात्पर्य है कि गुरु को भी अपने शिष्य को और उनके भावनाओँ का सम्मान करना आवश्यक है। शिष्य उसी इंसान को गुरु का दर्जा देता है जिनसे वह लगातार सीख सकता है। अतः गुरु को अपने ज्ञान का सठीक प्रयोग करके शिष्य को उनके प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने में मदत करना पड़ता है। 

एक प्रश्न का जवाब देना मेरे लिए आवश्यक है। शिक्षक और गुरु में फर्क क्या है। जिंदगी में कोई भी इंसान आपका शिक्षक बन सकता है। परन्तु हर शिक्षक गुरु नहीं बन सकता है। शिक्षक ऐसा इंसान जिससे हम कुछ भी सीख सकते हैं। उदाहरण स्वरुप हम परिवार के बच्चोँ से इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के प्रयोग के विषय में काफी कुछ सीख सकते हैं। परन्तु उनको गुरु नहीं बनाते हैं। 

मूल विषय है सीखने का और मार्ग दर्शन का जरूरत। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका सोच होता है कि वह सब कुछ जानते हैं। और उन्हें किसी शिक्षक या गुरु से सीखने का कोई जरूरत नहीं है। यह सोच गलत और कुछ समय बाद उस इंसान के ज़िन्दगी के सफर में बाधा बन जाता है। हर किसी को गुरु का जरूरत नहीं पड़ सकता है परन्तु निरंतर शिक्षा और सीखने की आवश्यकता जरूर है। और इस सीखने में हम कहीं भी ,किसी से भी सीख सकते हैँ। केवल सीखने का जिज्ञासा जरूरत है। 

आज लेख के अंत में मैं अपने दोस्त के ९६ साल उम्र के माताजी का उल्लेख करना चाहता हूँ। छुटिओं में हम उनके कुछ दिनों के लिए ठहरे थे अपने परिवार के साथ। चूँकि वह दक्षिण भारत से है ,उन्होंने मेरी अर्धांग्नी को उत्तर भारत के पद्धति से दाल बनाने को कहा ताकि वह बनाने का तरीका देख सके और सीख सके। यह है सीखने का एक अनोखा मिसाल। सीखने में उम्र की कोई सीमा नहीं है। कोई लज्जा नहीं है। केवल किसी से भी सीखने का विनम्रता होना जरूरी है। 

शिक्षक दिवस के इस अवसर पर हर शिक्षक और गुरु को मेरा सादर प्रणाम। आप सब ने मुझको ज़िन्दगी में यहाँ तक पहुँचने में मदत किया है। मैं सदा आपका आभारी रहूँगा। 

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

नमस्कार। अगस्त का महीना। स्वाधीनता दिवस का महीना। आज़ादी का ७६ साल में हमारा भारत कदम रखा है। हमने आज़ादी का महोत्सव बखूबी मनाया है इस साल। सश्रद्ध प्रणाम उन सब वीर को जिन्होंने अपने तरीके से आज़ादी का जंग लड़ा जिसके कारण हम सबका जन्म आज़ाद भारत में हुआ। शायद हम सब किसी न किसी परिवार के विषय में जानते हैं जिनके किसी पूर्वज ने अपना भूमिका निभाया आज़ादी की लड़ाई में। सबसे महत्वपूर्ण विषय है कि लोगों ने अपने आप इस जंग में हिस्सा लिया -किसी ने उन्हें मजबूर नहीं किया। यह  निःस्वार्थ योगदान कुछ हद तक मजबूरी भी थी।  हमने कभी पराधीन होने का अनुभव महसूस नहीं किया है। जिन्होंने किया है एक ही बात कहा है पराधीनता के विषय में -दम घुटता है। हमने तो आज़ादी हासिल कर ली है। परन्तु क्या हम औरों के स्वाधीनता के विषय में जागरूक हैं ? आज का लेख का विषय है स्वाधीनता ,स्वाधीन देश में। 

जरा सोचिये। अगर आप नौकरी करते हैं तो यह बताईये कि क्या आपको कर्मस्थल में ऐसी सब स्वाधीनता मौजूद जो कि आपको अपने काम के लिए जरुरत है और जो की आपके कंपनी के लिए फायदेमंद है ? अगर आपको काम के क्षेत्र में ऐसी स्वाधीनता प्राप्त हो ,तो आप खुशकिस्मत हो। मेरा तजुर्बा कहता है कि अधिकतर लोगों को यह स्वाधीनता नहीं मिलता है। 

एक और उदाहरण लीजिये अपने घर से। अपने परिवार में महिलाओं को कितनी स्वाधीनता प्राप्त है ? और बच्चों को ? बच्चोँ की उम्र बढ़ती ही नहीं है ,अभिवावकों के नज़र में। अकसर हम पुरुष निर्णय लेते हैं कि किसको कितना स्वाधीनता प्राप्त होगा। हम कौन होते हैं इस अधिकार का हक़ जताने का। हमारे देश में यह एक बड़ी समस्या है। सरकार को भी बेटी बचाओ का अभियान चलाना पड़ता है। इस शताब्दी में लड़कियों ने काफी प्रगति की है -अपने कैरियर में और अपनी स्वाधीनता के लिए। कई क्षेत्र में सरकार का प्रयास भी सराहनीय है -जैसे भारतीय सेना में महिला फाइटर पायलट का नियोग। 

थोड़ी चर्चा करते हैं कि क्यों हम औरों को स्वाधीनता प्रदान करने से हिचकिचाते हैं - कर्मस्थल पर या घर में या समाज में। मेरा निष्कर्ष इस मुद्दे पर यह है कि हम किसी को स्वाधीनता देने से इंकार करते हैं क्योंकि हम  एक गलतफहमी के गुलाम है। हमारा सोच है कि किसी को स्वाधीनता देने से हमारा पॉवर घट जायेगा। अगर आगे वह हमारा बात ना सुने। अगर वह स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद हमारे हाथ से निकल जाए। 

पहला कदम क्या है दुसरों को स्वाधीनता प्रदान करने में। खुद को खुशकिस्मत समझना कि हमें ऐसा अधिकार है कि हम किसी को स्वाधीनता दे सकते हैं। इसके लिए अपने आप पर भरोसा रखना जरूरी होता है। अंग्रेजी में जिसे सेल्फ कॉन्फिडेंस कहते हैं।

दूसरा कदम है कि हम किसको स्वाधीनता दे सकते हैं। उसी को जिस पर भरोसा कर सकते हैं कि स्वाधीनता मिलने पर वह इंसान उस स्वाधीनता का नाजायज फायदा नहीं उठाएगा और उसमें क्षमता है कि वह अपना निर्णय खुद ले सकता है। हमने कई लोगों को स्वाधीनता मिलने के बावजूद स्वाधीनता स्वीकार करने का कॉन्फिडेंस नहीं दिखा पाता है। एक उदाहरण के तौर पर आपने कर्मक्षेत्र में कई ऐसे लोगों को देखा होगा जिनको किसी विषय में निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है परन्तु यह इंसान एक बार अपने बॉस से पूछ लेना चाहता है। ऐसा इंसान कभी भी काम के क्षेत्र में स्वाधीनता नहीं चाहता है। 

तीसरा कदम है स्वाधीनता प्रदान करने के बाद उसका मॉनिटरिंग करना। यह ऐसा नहीं हो सकता है कि उसका स्वतंत्रता घुटता महसूस हो। मान लीजिए आपने अपने बच्चे को कुछ जेब खर्च दिया है पहली बार। हर रोज़ आप यह नहीं पूछ सकते हो कि क्या ख़रीदा ,बिल दिखाओ। महीने में या हफ्ते में एक बार आप जरूर चर्चा कर सकते हो जेब खर्च मिलने की वजह से बच्चे को क्या फायदा हो रहा है और वह उस पैसे का इस्तेमाल कैसे कर रहा है। बहुत सारे अभिभावक यह जान कर अचंभित हो जाते हैं जब बच्चे उन्हें यह बताते हैं कि जेब खर्च का संचय करके कुछ नया खरीदना चाहते हैं। 

यह महीना रक्षा बंधन के त्यौहार का पुण्य महीना है। जिनके ज़िन्दगी में बहनें हैं उन्हें सोचना चाहिए कि इस अवसर अपने बहन को कौन सा स्वतंत्रता देंगे या दिलायेंगे। यह आपके बहन के लिए सबसे उमदा उपहार होगा। सोचिये और कीजिए। हमारे स्वाधीनता दिवस के लिए आप सब को अग्रिम बधाई। स्वतंत्र रहिये और दूसरोँ के स्वतंत्रता का सम्मान कीजिए। अपने जीवन से आपको और अधिक आनंद मिलेगा। 

बुधवार, 28 जून 2023

नमस्कार। इस साल के छह महीने गुज़र गए। आधा समय चला गया। आपने इन महीनों में क्या हासिल किया है ?वक़्त ऐसे ही बीत जाता है। अचानक हमें महसूस होता है कि वक़्त गुज़र गया परन्तु हमने कुछ नहीं किया है और पश्चाताप करते हैं। इससे कोई फायदा नहीं होता है। हमें इस वक़्त का फायदा उठाना जरूरी है। इसके लिए निर्णय लेने में हिचकिचाने से मौका हाथ से निकल जाता है। और इसी में हारने का दुःख या जीतने का आनंद होता है। शायद आप २०११ साल में मुंबई में आयोजित विश्व कप क्रिकेट के फाइनल मुक़ाबले में भारत और श्री लंका के मैच को नहीं भूल गए हैं। हमारे कप्तान कूल ने बैटिंग क्रम बदल कर हमें जीत हासिल करने में मदत की। इसके विषय उन्होंने अपने निर्णय के पीछे का कारण भी बताया है। 

आज का लेख हमारे कप्तान कूल के नेतृत्व के विषय में है। पहली वजह इस विषय का है ७ जुलाई -हमारे कप्तान का जन्मदिन। बधाई हो आपको। स्वस्थ रहें और मार्ग दर्शक बने रहें हम सब का। दूसरा कारण इस विषय के चयन के पीछे है उनका इस साल आई पी एल में अपने टीम को चैंपियन बनाना। उनकी टीम को किसी भी क्रिकेट के पंडित ने टूर्नामेंट के शुरू में फेवरिट का तक्मा नहीं दिया क्योंकि उनकी टीम उतनी मजबूत नहीं थी। और इसी वजह से उनकी टीम के इस जीत पर हम सब आश्चर्यचकित रह गए। 

क्या गुण हैं हमारे कप्तान कूल के जो उन्हें इतना सफलता दिलाता है। मुझे पता है कि ऐसी चर्चा काफी हुई है। मैंने भी इस विषय पर लिखा है। फिर इस बार क्या नया है। इस लेख में मैं तीन  नए गुण का ज़िक्र करूँगा जो शायद आप पहली बार सुनोगे। 

उनकी मुस्कान -हमारे कप्तान कूल के होठों पर एक मुस्कान हमेशा मौजूद होता है। इस मुस्कान का असर उनके टीम पर और उनके साथ जो जुड़ते हैं उन पर एक मोह बन जाता है। एक इंसान कब ऐसा कर सकता है। तभी जब वह खुद अंदर से विचलित नहीं होता है। और खेल के मैदान में किसी भी खिलाड़ी का सबसे ज़्यादा टेंशन किस विषय का होता है -खेल में हार जाने का। जो भी इंसान इस बात से समझौता कर ले कि किसी भी खेल में हार और जीत एक ही सिक्के के दो पहलु हैं ,वही हार से कभी नहीं डरेगा। और इसी डर के दूर होने पर एक सुकून आता है , अंदर से , जो कि खिलाड़ी को और लीडर की हैसियत से टीम को रिलैक्स करने में मदत करता है। टेंशन करने से परफॉरमेंस ख़राब होने का संभावना बढ़ जाता है। परिणाम पर किसी का कंट्रोल नहीं है। अपने मेहनत पर १०० प्रतिशत कण्ट्रोल है। कप्तान कूल खुद और अपने टीम को मेहनत पर ही फोकस करने पर मजबूर करता है।  

अपने निर्णय पर विश्वास -चाहे परिणाम कुछ भी हो। इस साल आई पी एल के एक मैच में उन्होंने टॉस जीतने के बाद पहले बैटिंग करने का निर्णय लिया। यह मैच उनकी टीम बुरी तरह से हार गई। मैच के अंत में वही मुस्कान और कमेंटेटर ने जब पूछा कि शायद पहले बैटिंग करने का निर्णय सही नहीं था।  इस बात का कोई दुःख है। कप्तान ने बैटिंग करने के सिद्धांत के पीछे का कारण बताया। फिर बताया कि मैच के दौरान पिच का रुख बदल गया जो उन्होंने सोचा नहीं था। ऐसा होता है और इस हार का उनका कोई गम नहीं है। 

अपनी और टीम के हर सदस्य के काबिलियत को समझना और उसके अनुसार रणनीति का चयन और प्रयोग करना। आपने ख्याल किया होगा कि इस साल के आई पी एल में कप्तान ने खुद को बैटिंग क्रमांक में काफी नीचे उतार दिया था। उनको टीम में अपना भूमिका क्या है इसका सही निर्णय उन्होंने किया था। पहली जिम्मेवारी नेतृत्व , दूसरी विकेट कीपिंग और तीसरा धुआंधार बल्लेबाज़ी।  उनको मालूम है कि टीम के अन्य सदस्य उनसे पहले बैटिंग करेंगे क्योंकि उसी में टीम का भला है। इंग्लैंड के टेस्ट टीम के बर्तमान कप्तान और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आल रॉउंडर जब चोट की वजह से बोलिंग ना कर सके तो उनके जगह पर कप्तान कूल ने ऐसे बल्लेबाज़ को मौका दिया जिनका प्रदर्शन पिछले तीन सालों में इतना ख़राब था कि कोई भी टीम इस खिलाड़ी को नहीं खरीद रहा था। इस खिलाड़ी एक नया अवतार हम सब ने देखा। कप्तान ने इस निर्णय के विषय में क्या कहा ? चूँकि विपक्ष के हर टीम में कई सारे तेज़ गति के गेंदबाज़ थे जो कि पारी के शुरू में गेंदबाज़ी करेंगे ,उन्हें अपने टीम में तीन नंबर पर ऐसा एक बल्लेबाज़ जरूरत था जो कि तेज़ गेंदबाज़ों को खेलने में माहिर हो। उन्होंने इस बल्लेबाज़ को ऐसा समर्थन दिया जिसके कारण ना ही इस बल्लेबाज़ ने अपनी टीम के चैंपियन बनने में अहम् भूमिका निभाई , उन्होंने भारतीय टेस्ट टीम में अपनी वापसी भी की। यही है कप्तान कूल का नेतृत्व में खेलने का परिणाम। 

कप्तान कूल -आपको जन्मदिन बधाई हो। आप शायद अगले कुछ वर्षों में अवसर लोगे खिलाड़ी के हैसियत से। परन्तु पिकचर अभी बहुत बाकी है कप्तान। हमें इंतेज़ार रहेगा कप्तान कूल के अगले अवतार का। स्वस्थ और खुश रहिए। यह हम सब की दुआ है।