शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

बारिश का मौसम का आनंद ही कुछ और है। इस मौसम की खूबी है ज़्यादा या कम दोनों नापसंद हैं। हर कोई बारिश को अपने अंदाज़ से चाहता है। काम पर जाते वक्त नहीं क्योंकि कपड़े भीग जायेंगे। घर लौटने के बाद ताकि एक गरम प्याला चाय का आनंद लिया जाय। परंतु अक्सर ऐसा नहीं होता है जैसा कि हम चाहते हैं। कुछ अपने कैरियर की तरह। हम लोगों से सलाह लेतें हैं कैरियर के विषय में। कोशिश करते हैं। कुछ लोगों को सफलता भी मिलती है। लेकिन कुछ दिनों के बाद एक प्रश्न उभरता है -क्या मैंने सही निर्णय लिया है ? बस शुरू हो जाता है दिल और दिमाग का द्वन्द -दिल कुछ चाहता है ;दिमाग कुछ और ही बताता है।
पिछले महीने मुझे करीब १००० से ज्यादा युवा और उनके अभिभावकों के साथ कैरियर के विषय में चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने कई बातें बताई जो कि उनको अच्छा लगा और उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया आप लोगों के साथ भी उन बातों का ज़िक्र करूँ इस माध्यम से।
जिसका कैरियर , जीवन उसका - कैरियर का चयन युवा को खुद करना चाहिए। सलाह चाहे किसी से भी ले। ज़िन्दगी उसको जीना है, सलाहकार को नहीं। अभिभावक अपना असम्पूर्ण सपने को अपने बच्चे के माध्यम से परिपूर्ण करने का प्रयास ना करे। ज़िंदगी में कभी भी यह ना बोल सके कि मैंने किया चूँकि आपने कहा था या नहीं किया क्योंकि आपने नहीं करने दिया। मैं सलाम करता हूँ उन माता -पिता को जिन्होंने अपनी बेटिओं को फाइटर पायलट बनने से नहीं रोका क्योंकि कोई महिला इसके पहले फाइटर पायलट नहीं बनी थी।
कैरियर उसे बनाओ जो कि आपकी दिलचस्पी हो -फिर आप कभी काम पर नहीं जाओगे क्योंकि वही आपका पैशन है। 'प्यार करता है जानवरों से , और शादी करने चला है मशीनों से। 'एक हिट फिल्म का यह डायलाग इस बात को सहज तरीके से पेश करता है।
क्या आपको पता है कि आपकी ख़ुशी किस कैरियर में है ?इस प्रश्न का सही जवाब आपके लिए बहुत महत्व्पूर्ण है। यह समय और ज़िन्दगी के सफर के दौरान बदल सकता है। ज़िन्दगी में अग्रसर होने के दौरान इसका समझ जरूरी है। इसी के जरिये आपका चयन सही रहेगा।
कौआ कभी भी हंस की चाल नहीं चल सकता है -आप केवल एक बेहतर आप बन सकते हो। कोई दूसरा नहीं। अगर किसी से आप को प्रेरणा मिलती है तो उनका अनुकरण करो , नक़ल नहीं। अपने प्रतिभा और काबिलियत पर गौर करो और उसी के बल पर अपने कैरियर का निर्धारण करो।
सफलता और प्रसिध्धता में फर्क है -प्रसिद्द होने के लिए आपको अच्छे काम ही करने पड़ेंगे , ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। गलत काम करने के वजह से भी कई इंसान प्रसिद्द हुए हैं। आपके परिवार में , समाज में , मित्रों में आप कई लोगों को जानते होंगे जो कि सफल हैं , प्रसिद्द नहीं। कैरियर में सफल होना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। सफलता आपको एक दिन प्रसिद्द भी बना सकती है।
दिल की सुनो , दिमाग से सफर तय करो - अकसर हम अपनी दिल की बात को दबा देतें हैं -खास कर जब हमारा कैरियर का चयन unconventional होता है। दो कारन मैंने देखा है इसके लिए -लोगों का ना प्रोत्साहन करना और इसके कारण मन में असफल होने का डर -fear of failure- किसी भी इंसान का प्रगति के पथ पर सबसे कठिन बाधा। कोई भी अपनी ज़िन्दगी डरते हुए या मरने के डर से नहीं जी सकता है। डरिये मत अपने कैरियर के चयन में। ज़रा सोचिये उस शेफ के बारे में जो कि टीवी पर खाना खज़ाना के माध्यम से लोगों का दिल जीत लिया है। करीब तीस साल पहले जब उन्होंने इस कैरियर का चयन किया उस वक़्त और आज भी हमारे घरों में खाना घर की महिलाएं ही बनाती हैं।
हमारा competition हम खुद हैं -अपने दिमाग में हम निर्णय कर लेते हैं क्या संभव है और क्या असंभव। अकसर बिना कोशिश किए हुए। और यहीं हम हार जातें हैं , अपने आप से। हमारा एक कम्फर्ट जोन होता है। उसके बाहर निकलना जरूरी है ,खुद के औकात को परखने के लिए। वही फ़ैल करने का डर हमारे दिमाग का सबसे कठिन बाधा है।
निडरता के साथ ज़िन्दगी का आनंद लीजिए। आज का मज़ा लीजिए। कल किसीने नहीं देखा है। बारिश में भींगने में मज़ा आता है तो जी भर कर भीगें ,जुकाम होने की चिंता में बारिश को ना गवां दीजिये।
अगले महीने सफल वयक्तिओं के जीवन से मिली सात मन्त्रों का ज़िक्र करूँगा कैरियर के संधर्व में।  तब तक खुश रहिए और मानसून के रोमांस का आनंद लीजिए। 

शुक्रवार, 3 जून 2016

नमस्कार। पिछले महीनें में आपने टेलीविज़न पर कई सारे अवार्ड्स का आनंद उठाया होगा। 2015 हिंदी फिल्मों के लिए एक बहुत ही सफल साल रहा। कई तरह के फिल्मों को दर्शको ने पसंद किया और प्रोत्साहित किया। फिल्म कम्युनिकेशन का एक अनोखा मिसाल है। मैंने पिछले महीने आँखों से सुनने का ज़िक्र किया था। फिल्में इस 'आँखों से सुनने 'का एक माध्यम है। ज़रा सोचिये -हम फिल्मों में परदे पर वही देखते हैं जो फिल्म का डायरेक्टर दर्शकों को कैमरा के ज़रिये दिखाता है। कैमरा का एंगल , वस्तु या इंसान से उसकी दुरी या नज़दीकी दर्शकों के लिए अलग -अलग भावनाओं का कारण बन जाता है। इसके साथ अभिनेता या अभिनेत्री का चेहरा और बोलने का अंदाज़ दर्शकों का सम्पूर्ण मनोरंजन करता है।
बॉलीवुड के सहनशाह का उनकी बेटी के साथ अपने कब्ज़ को लेकर चिंता और वार्तालाप ने एक बहुत ही सेंसिटिव टॉपिक को बखूबी दर्शाया है। उनका कम्युनिकेशन का अंदाज़ इस फिल्म में उनके किसी और फिल्म से काफी हटके है। यही एडजस्टमेंट, उनके कम्युनिकेशन में, उनको तरह -तरह के रोल में मदत करता है।
2015 , परंतु एक 'मुन्नी 'का है। भाईजान के कंधे पर सवार होकर उन्होंने सब का दिल जीत लिया है। मुन्नी फिल्म के चरित्र में बोल नहीं सकती है। आपने अगर फिल्म देखी होगी (अगर नहीं देखा है तो ज़रूर देखिये ) तो आपने भाईजान के फ़्रस्ट्रेशन को ज़रूर महसूस किया होगा जब वो फिल्म के शुरू में मुन्नी से बात कर रहें हैं लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि मुन्नी उनका बात समझ पा रही है या नही। कम्युनिकेशन में सुनने वाले का फीडबैक कम्युनिकेशन को सम्पूर्ण करता है। जैसा मैंने पिछले महीने ज़िक्र किया था -लोग अपनी आँखों से और अपने चेहरे से यह फीडबैक देते हैं। इसलिए कम्युनिकेशन के वक़्त दुसरो के आँखों में देखना -जिसे हम eye contact कहते हैं -एकदम ज़रूरी है। अक्सर हम किसी को अप्रिय बात बताते वक़्त उनकी आँखों से अपना नज़र हटा लेते हैं।  यह गलत है। कम्युनिकेशन का प्रभाव कम हो जाता है।
फिल्म में एक समय के बाद मुन्नी कम्यूनिकेट करना शुरू कर देती है। कैसे ? अपने इशारो से और अपने चेहरे के माध्यम से। उन्होंने  कितनी बखूबी से कई भावनाओं को दर्शाया है। बिना एक शब्द बोल कर। मैं इस फिल्म के निर्देशक को सलाम करता हूँ उनकी समझ पर।  कम्युनिकेशन की बारीकियों का और उनके प्रयोग का। उन्होंने मुन्नी के ज़रिये कम्युनिकेशन में response के महत्व को पेश किया है। रेस्पोंस सफल कम्युनिकेशन के लिए अत्यंत ज़रूरी है। इसके बिना आप सफल नहीं हो सकते हैं। समझाता हूँ। विस्तार में।
कभी आपने दोस्तों के बीच बातचीत के दौरान यह सुना है -"अच्छा तू बोल ले ,फिर मैं react करता हूँ "? जब विचार नहीं मिलते हैं और किसी विषय पर उत्तेजक चर्चा होती है ,तब हम रिएक्ट करते हैं ,रेस्पोंड नहीं। और इसी कारण कभी -कभी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। और रिश्ते से क्या बनता है ? आपका ब्रैंड !
response और react में फर्क क्या है ? फर्क आपके अंदर के भावनाओं का है। जो कि बोलते वक़्त आपके कम्युनिकेशन के प्रभाव का 93 प्रतिशत  है। याद है ना ५५-३८-७ का फार्मूला। जो पहली बार मुझसे मिल रहे हैं उनके लिए यह बताना चाहूंगा कि कम्युनिकेशन का प्रभाव ५५%निर्भर करता है कम्यूनिकेटर के बॉडी लैंगुएज पर ; ३८% बोलने के अंदाज़ या टोन पर और शब्दों का असर केवल ७ % है।
जब कोई रिएक्ट करता है तो उनमे एक नेगेटिव फीलिंग होती है जिसके कारण उनका बॉडी लैंगुएज और टोन बिगड़ जाता है और कम्युनिकेशन receive करने वाले को बुरा लगता है। रेस्पोंस में यह नेगेटिव फीलिंग्स नहीं रहता है जो कि कम्युनिकेशन को प्रोत्साहित करता है और आगे बढ़ाने में मदत करता है। आप रेस्पोंड करना चाहते हैं तो इन चीजों का ख्याल अवश्य रखें।
पहली बात -सुनिए -एक्टिव लिसनिंग (जिसके विषय में मैंने पिछले महीने चर्चा की थी )के ज़रिये।
दूसरी बात -समझिए -बोलने वाला क्या बोलना चाहता है। क्या आप वह सुन पा रहे हो जो वह नहीं बोल रहा है ? इसके लिए बोलने वाले का बॉडी  लैंगुएज और बोलने के टोन पर गौर करना पड़ेगा।
तीसरी बात -अगर ज़रुरत हो  तो प्रश्न पूछिए ताकि आपकी समझ में कोई गलती ना हो। अक्सर बोलने वाला कुछ बोलना चाहता है और समझने वाला कुछ और समझता है। और इसी कारन रेस्पोंड के वजाय रिएक्ट कर जाता है।
चौथी बात -भावनाओं को समझिए। बोलने वाले का। किस परिस्थिति या संधर्व में बातचीत हो रही है इसका ख्याल रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
पांचवी और अंतिम बात -अपने भावनाओं को वश में रख कर ; सही शब्दों का चयन के साथ (याद है दो महीने पहले मैंने इसकी चर्चा की थी ) आपको रेस्पोंड करना पड़ेगा। अगर आप उनकी भावनाओं की समझ को अपने कम्युनिकेशन में प्रदर्शित कर सको तो आप एक अव्वल दर्जे का कम्यूनिकेटर बन सकते हो।
ज़िन्दगी में रिश्तों को , और उसके माध्यम से ,अपने ब्रैंड को आगे बढ़ाने के लिए रेस्पोंस का कोई विकल्प नहीं है। जो पाठक मेरे साथ पहली बार मिल रहें हैं , और मेरे ज़िक्रे किये हुए कुछ पिछले लेख को पढ़ना चाहते हैं उनके लिए मैं सूचित करना चाहता हूँ की आप पिछले कई महीनों के inextlive के प्रथम सोमवार का संस्करण  में आपको doc -u -mantra मिल सकता है।
आपके 'रेस्पोंस 'के इंतज़ार में रहूंगा। रिएक्ट मत कीजिये। ज़िंदगी से और आनंद उठाइये। रिश्ते बनाकर ;सवँरकर और ब्रैंड को आगे बढ़ा कर। फिर मिलेंगे।  अगले महीने पहले सोमवार को। खुश रहिये। 

रविवार, 10 अप्रैल 2016

मेरे ज़िंदगी में दो बॉस हैं।  एक अपनी बीवी जो कि घर में बॉस है और एक दूसरे की बीवी, मेरे ऑफिस की सीनियर कोलीग , नीना , जो कि ऑफिस में मेरा  बॉस है। मेरे दोनो बॉस मेरी गलतियाँ ढूढ़ने में माहिर हैं। कुछ दिन पहले मैं सुबह ऑफिस पहुँचने पर नीना ने मुझे किसी इ मेल के विषय में अवगत कराया।  मुझे याद नहीं कि मैंने क्या बोला या नही बोला । अचानक मुझे महसूस हुआ कि नीना शायद किसी कारण उदास या नाराज़ है। पूछने पर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने  सुबह में उनकी बात को ठीक से नहीं सुना था। जिसके कारण वह मेरे रेस्पोंस से खुश नही थी।
इस घटना का ज़िक्र मैंने कम्युनिकेशन के सबसे महत्वपूर्ण स्किल के उदाहरण स्वरुप किया -'listening' स्किल। आपको अगर अपने कम्युनिकेशन के ज़रिये अपना ब्रैंड को आगे बढ़ाना है तो आपको अपना लिसनिंग स्किल को विकसित करना पड़ेगा। जो वयक्ति बेहतर सुनता है वह सदा  बोलने वाले से बेहतर कम्यूनिकेटर होता है। ऊपर वाले ने हर इंसान को एक ज़ुबान और दो कान दिया है। इफेक्टिव कम्यूनिकेटर बनने के लिए जितना बोलो उसका दुगना सुनो। यही सफलता का गोलडेन नियम या रूल है।
अंग्रेजी भाषा में दो शब्दों का एक ही हिंदी अनुवाद है -सुनना। ये दो अंग्रेजी शब्द हैं -hearing और listening . फिर हम hearing स्किल की बात क्यों नहीं कर रहे हैं ? listening स्किल की बात क्यों कर रहे हैं ? क्योंकि hearing और listening में सुनते वक्त अपने दिमाग के 'ना प्रयोग' और 'प्रयोग' करने का फ़र्क है। मैंने शुरुआत में जिस घटना का ज़िक्र किया उसमें मैंने hearing किया था , लिसनिंग नहीं। क्योंकि नीना को यह महसूस हुआ कि मैंने उसकी बात ध्यान के साथ नहीं सुना। यही तात्पर्य वाली बात है -जब भी आप listen करोगे आप के साथ कम्यूनिकेट करने वाला आपका listening महसूस करेगा।
ना कुछ बोलने से ही लिसनिंग नहीं होता है। आपने अकसर लोगों को यह कहते हुए सुना होगा -एक कान से सुनना और दूसरे से निकाल देना ! hearing हम अपने कानों से करते हैं। listening- कान ,आँख ,चेहरा ,ज़ुबान और सबसे महत्वपूर्ण, अपने दिमाग से करते हैं।
विस्तार में बात करते हैं। listening का सर्वश्रेष्ठ तकनीक active listening के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब यह है कि बोलने वाले को यह समझ में आता है कि सुनने वाला उसको ध्यान से सुन रहा है। आप कैसे अपना active listening स्किल को विकसित करोगे ?

  1. आँखों से सुनो , केवल कानों से नहीं। जो बोल रहा है , सुनते वक़्त उसके साथ eye contact बरकरार रखो। उनके चेहरे पर ध्यान दो। उनके चेहरे पर नज़र रखो। चेहरा शब्दों से ज़्यादा बोलता है। आपको याद होगा -शब्दों का प्रभाव केवल ७ % है। body language का ५५ %. 
  2. बोलने वाला क्या बोल रहा है , महत्वपूर्ण है।  कैसे बोल रहा है , उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आपको याद होगा बोलने का अंदाज़ पर ३८ % प्रभाव निर्भर करता है। ध्यान से सुनो। 
  3. दिमाग को alert रखो। जैसे वक्ता बोल रहा है ,दिमाग के ज़रिये उनकी बातों को सुनो। समझने का कोशिश करो। बोलने वाले के  भावनाओं को अनुभव करो। 
  4. अपने चेहरे के माध्यम से बोलने वालो को समझाओ कि आप उनके बोलने के साथ हो। अपने सर का हलके से हिलाना यह समझाता है कि आप उनकी बात समझ रहे हो। बोलने वाले के बातों को सुन कर आपकी प्रसन्नता, उदासी अथवा नाराज़गी आपके चेहरे के ज़रिये बोलने वाले को समझाइये। इफेक्टिव कम्यूनिकेटर आपके चेहरे के active listening के ज़रिये आपके दिल की बात को सुन और समझ पाएगा। 
  5. अकसर सुनते वक़्त हम बोलने वाले को प्रोत्साहित करते हैं कुछ छोटे छोटे शब्दों के ज़रिये या कुछ आवाज़ के माध्यम से। 'हूँ ','अच्छा ','और ','फिर '-इस तरह के कुछ शब्द और आवाज़ हैँ। इनके कारण बोलने वाला प्रोत्साहित होता है क्योंकि आप उनको यह बता रहे हो कि आप  उनकी बातों को सुन रहे हो।Listening के माध्यम से आप बोलने वाले का सम्मान करते हो। उनके महत्व को समझाते हो। उनको एक फीडबैक देते हो जो कि किसी भी इफेक्टिव कम्युनिकेशन के लिए आवश्यक है। बिना फीडबैक के कारण बोलने वाले को यह नहीं पता चलता है कि सुनने वाला सुन रहा है या नहीं। आप खुद कम्यूनिकेट करते वक़्त सुनने वाले से फीडबैक चाहते हो या नहीं ? कम्यूनिकेट करते वक़्त सुनो ज़्यादा। बोलो कम। तब ही बोलो जब ज़रूरत हो। उतना ही बोलो , जितना की पर्याप्त हो। यही इफेक्टिव कम्युनिकेशन का मूल तकनीक है। कभी आपने सोचा है कि आप बोलते वक़्त वही बोल सकते हो , जो कि आप जानते हो। सुनोगे ध्यान के साथ तो शायद कुछ सीख सकते हो जो कि आप नही जानते हो। जो बोल रहा है ,वह जानता है। listening में ही फायदा है। एक नहीं अनेक। मैं आपसे सुनने का इंतज़ार करूँगा। फेसबुक के माध्यम से। आप मेरे साथ twitter के ज़रिये भी वार्तालाप कर सकते हैं। मैं एक 'active ' listener हूँ। इंतज़ार करूँगा।   

बुधवार, 9 मार्च 2016

"बड़े बड़े देशों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं। "कभी कभी कुछ जीतने के लिए कुछ हारना पड़ता है और कुछ हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं। "हम शरीफ क्या हुए पूरी दुनिया ही बदमाश बन गयी। "
हमारे बॉलीवुड के बादशाह ने इन डायलॉग्स को अमर बना दिया। शब्दों का चयन और उनके बोलने के अंदाज़ ने इन डायलॉग्स को इतना स्मरणीय बनाया। कोई भारी भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं है किसी भी डायलाग  में। सुनने वालों को उनकी बातों को समझने में कोई असुविधा नहीं होंगी। तीन 'V' का कमाल है -Verbal , Vocal और Visual
किसी भी कम्युनिकेशन का इम्पैक्ट इन तीन 'V ' पर निर्भर करता है। इन पर थोड़ा चर्चा करते हैं।
Verbal - यह है शब्दों का चयन और प्रयोग। आपके चुने हुए शब्द सुनने वालों को दुःख या ठेस पहुंचाता है या सुकून ? एक उदाहरण लीजिये। अगर कोई आपको झूठ बोल रहा है और आपको उसको यह बताना चाहते हो  तो आप दो तरह से बोल सकते हो। एक -"आप झूठ बोल रहे हो। " दो -"आप सच नहीं बोल रहे हो। "एक ही सन्देश है , सुनने का प्रभाव अलग होगा।
प्रभाव शब्द से एक प्रश्न दिमाग में आया है। क्या आप यह बता सकते हैं की कम्युनिकेशन ग्रहण करने वाले पर शब्दों का प्रभाव या इम्पैक्ट कितना प्रतिशत होता है ? शत प्रतिशत? पचास प्रतिशत? या उससे ज़्यादा या कम ? सही जवाब सुन कर आप अचम्भित हो जायेंगे। ....... केवल ७ प्रतिशत !जी हाँ , आपने सही पढ़ा है। केवल सात प्रतिशत। जब हम किसीको हाथ के इशारे से अपने पास बुलाते हैं और वह व्यक्ति हमारे पास आ जाता है तो शब्दों का तो प्रयोग ही नहीं होता है !
इसी हाथ हिलाकर पुकारने के ऊपर और थोड़ा गौर फरमाये। आपने ख्याल किया होगा कि आप अपना हाथ उतने ज़ोर से हिलाते हैं जितना जल्दी आप उनको आपके पास आने का सन्देश पहुँचाना चाहते हैं। वह वयक्ति आपके हाथ के इशारे पर जल्दी या समय लेकर आपके पास पहुँचता है। आपका कम्युनिकेशन केवल Visual माध्यम से है।
Visual अर्थात जो दिखता है। कितना प्रतिशत है इसका प्रभाव? ५५  प्रतिशत। सबसे अधिक। इसके अंतर्गत काफी चीजें आती हैं। सहज भाषा में आपका वेशभूषा; खड़े होने का या बैठने का अंदाज; चेहरे पर जो दिखता है आपके कम्युनिकेशन का  ५५  % इम्पैक्ट बनाता है। शोले में आपको वह दृश्य याद है? जय भैंस पर सवार होकर मस्ती करते हुए अचानक राधा को उसकी ओर देखते हुए देख लेता है। राधा मुस्कुराती है और जय लज्जा के कारन भैंस से तुरंत उतर जाता है। अपने चेहरे के जरिये जय जिस तरह अपनी चाहत का ज़िक्र करता है वह visual कम्युनिकेशन का एक बेहतरीन मिसाल है। आप चाहो तो अपने याददाश्त को ताज़ा करने के लिए एक बार you tube में फिर इस सीन को देख सकते हो। ज़रूर देखिये। बहुत कुछ सीखिएगा।
अपने बाहों को फैलाकर हमारे बादशाह एक निमंत्रण सा करते हैं उनमे समां जाने के लिए। इसी visual कम्युनिकेशन  के ज़रिये उन्होंने कितने के दिलों में अपना स्थान बना लिया है। ८ से ८० तक के उम्र का। यह बाहें फैलाना उनका एक सिग्नेचर बन गया है।
हम वापस चले जाते हैं इस लेख के शुरू के डायलॉग पर। अनुरोध करूँगा एक बार फिर देख लीजिये। राहुल, विकी और  काली को देखिये और सुनिए। उनके बोलने के अंदाज़ पर गौर कीजिये। यही अंदाज़ कम्युनिकेशन का vocal अंश है जिस पर कम्युनिकेशन का ३८ %इम्पैक्ट है।
किसी गलती के लिए माफी माँगते वक़्त आप किस अंदाज़ में सॉरी बोलते हैं आपके प्रायश्चित के गहराई को प्रदर्शित करता है। इस संदर्भ में मै एक बहुत आवश्यक तथ्य का ज़िक्र करना चाहता हूँ। मैंने यह देखा है कि कुछ लोग अपने कम्युनिकेशन का अंदाज़  किससे कम्यूनिकेट कर रहें हैं ,उसके ऊपर निर्धारित करते हैं। यह ठीक नहीं है। बच्चा ,बूढ़ा ,अमीर ,गरीब ,मर्द ,औरत ,मालिक ,नौकर -आप किसके साथ बात कर रहें हैं उस पर आप तय नहीं कर सकते हैं कि आपके बोलने का अंदाज़ क्या होगा।
हर इंसान चाहता है कि उसके साथ लोग इज्जत के साथ पेश आएं। इज्जत के साथ कम्यूनिकेट कीजिये; लोग आपके साथ इज्जत से पेश आएंगे। 'इज्जत पाने के लिए ,इज्जत करना पड़ेगा ' शायद भविष्य में किसी फिल्म में आप बादशाह से सुनिएगा। इंतज़ार मत कीजिये, तब तक। शुरू कर दीजिये कम्युनिकेशन का ५५ -३८ -७ का फॉर्मूला। फिर देखिये आपका ब्रैंड कैसे तेजी से रिश्ता बनाता जाता है। याद है ना -ब्रैंड का परिभाषा ?रिश्ता , चॉइस का।
आनंद लीजिये अपने कम्युनिकेशन के क्षमता का। मुझे जरूर लिखिएगा आपके कम्युनिकेशन के सफलता के विषय में। मुझे बेहद ख़ुशी होगी। इंतज़ार करूँगा।

बुधवार, 2 मार्च 2016

"मेरे पास बिल्डिंगें हैं ,मकानें  हैं  ,गाड़ियाँ हैं ,तुम्हारे पास क्या है ?"कुछ क्षणों के बाद इस प्रश्न का उत्तर मिलता है। "मेरे पास माँ है। "
१९७५ साल में बनी दीवार फिल्म ने कम्युनिकेशन को एक नया दर्ज़ा दिया। सलीम -जावेद के लाजबाब डायलाग को ऐतिहासिक बनाने का श्रेय बॉलीवुड के सहनशाह के अभिनय क्षमता और कम्युनिकेशन स्किल्स , दोनों को प्राप्त है। अपने 'सहनशाह 'के ब्रैंडिंग तक पहुँचने में उनके कम्युनिकेशन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज और अगले कुछ मुलाकातों  में, मैं आपके साथ कम्युनिकेशन और उसका आपके अपने ब्रैंडिंग पर प्रभाव के बारे में चर्चा करूँगा । जैसा कि मैंने आपको पहले वादा किया था।
पिछले हफ्ते सहनशाह ने एक इंटरव्यू में आनंद फिल्म के शूटिंग के दरमयान डायरेक्टर हृषीकेश मुखेर्जी के एक सलाह का ज़िक्र किया है। कम्युनिकेशन में ठहराव का महत्व। 'मेरे पास माँ है ' के पहले कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बिना कम्युनिकेशन का इम्पैक्ट नहीं बनता। ना कुछ बोलना कभी -कभी बहुत कुछ बोलने से भी ज़्यादा प्रभावशाली हो सकता है। अपने ब्रैंड को आगे बढ़ाने के लिए अपने कम्युनिकेशन में ठहराव को स्थान दीजिये और उसका प्रभावशाली उपयोग  कीजिये।
कम्युनिकेशन आखिर है क्या ? आज शुरू से हम कम्युनिकेशन , जो कि एक अंग्रेजी शब्द है , उसका प्रयोग क्यों कर रहें हैं ? हम उसकी जगह 'बातचीत' शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहें हैं ? क्यूँकि सिर्फ बातें करना कम्युनिकेशन नहीं है।
कम्युनिकेशन को आप अच्छा या ख़राब नहीं बोल सकते हैं। कम्युनिकेशन या तो  'इफेक्टिव' है अथवा नहीं। कम्युनिकेशन तभी सार्थक या सफल होता है जब जिसके उद्देष्य से कम्युनिकेशन किया गया है ,वह इंसान या जानवर उसे उसी तरह से समझे जो कि कम्यूनिकेट करने वाले का मकसद है। घर में लोग पालतू कुत्ते को बुलाने के लिए अपने मुँह से कुछ आवाज़ करते  हैं  और कुत्ता अपना दुम हिलाता हुआ चला आता है। इस उदाहरण से यह प्रमाणित होता है कि कम्यूनिकेट करने के लिए आपको उस भाषा का साथ लेना पड़ेगा जो कि वह समझ सकता है जिसके साथ आप कम्यूनिकेट करना चाहते हैं।
भाषा के विषय में चर्चा करते हुए मुझे एक अनुभव  का ज़िक्र करना ज़रूरी है। एक अरबपति व्यापसायी ने मुझे एक बार उनकी कम्युनिकेशन को बेहतर बनाने में मदत करने के लिए बुलाया था। उनकी समस्या थी कि उन्होंने कभी ज़िंदगी में अंग्रेजी नहीं सीखी थी। जिसके कारण वाणिज्यिक सभा में उन्हें भाषण देने में हिचकिचाहट होती थी। मैंने उन्हें केवल यही समझाया कि सभा में लोग उनको उनकी व्यापसायिक सफलता के विषय में सुनने के लिए एकत्रित होते थे ना कि उनके भाषा के ज्ञान को सुनने के लिए। मैंने उन्हें हिंदी में भाषण देने में प्रोत्साहित किया। उसके अलावा मैंने उन्हें 'बोलने 'और 'कम्यूनिकेट 'करने के बीच क्या फर्क है समझाया। आज उनको एक प्रतिष्ठित वक्ता के हैसियत से लोग उनका सम्मान करते हैं। उनका अपना एक ब्रैंड बन गया है।
हमने इस उदाहरण से क्या सीखा है ? पहली बात आप अपना भाषण उस भाषा में रखो जिसमे आप सक्षम हो। दूसरी बात सरल शब्दों का प्रयोग करो। तीसरी बात अपने बोलने के रफ़्तार पर ध्यान रखो। इतना तेज़ मत बोलो कि आपके श्रोता को आपके साथ रहने में असुविधा हो या इतने धीरे मत बोलो कि आपको सुनने वालों को नींद आ जाये !चौथी बात सही भावनाओँ के साथ बोलो। नहीं तो लोग आपके साथ नहीं रहेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण है कि आप उतना ही बोलो जितना ज़रूरत है। आपके भाषण के लिए निर्धारित समय में अपना व्यक्तव्य ख़तम करना एक अच्छे भाषण दाता का परिचय है।
कम्युनिकेशन का मूल मंत्र है कि आप जो बोल रहे हो ,वह महत्वपूर्ण है ;उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है आप उसे किस तरह या अंदाज़ से बोल रहे हो !
'कितने आदमी थे ?'- बोलने के अंदाज़ ने हमें गब्बर का चरित्र से मोहित किया। इसके आगे मैं क्या मिसाल दूँ आपको सचेतन करने के लिए ?
अपने बोलने के अंदाज़ पर गौर कीजिये। बोलते वक़्त भावनाओं का ख्याल रखिये। यह आपके ब्रैंड को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम है। अगर गब्बर अपना ब्रैंड बनाने में सफल हो सका है ;आप कैसे सफल नहीं होगे?गब्बर तो विलेन था , आप तो हीरो हो !
खुश रहिये। अगले महीने फिर मुलाकात होगी आपके साथ  कम्यूनिकेट करने के लिए।
कैसा लगा ?मेरे साथ फेसबुक पर ज़रूर कम्यूनिकेट कीजिये। इंतज़ार करूंगा। 

रविवार, 15 नवंबर 2015

त्योहार का समय कैसा बीत रहा है आपका ?हमारे देश का एक महत्वपुर्ण त्योहार , दशहरा, लोग रावण का पुतला जला कर करते हैं। अच्छे का बुरे पर विजय का यह सबसे बड़ा प्रतिक है। मैं पिछले दिनों विदेश के सफर पर था। लंबे सफर का बेहतरीन दोस्त हवाई जहाज का एंटरटेनमेंट चैनल है -मैंने इस सफर के दौरान तीन फिल्में देखी-दो हिंदी और एक अंग्रेजी। तीनो फिल्मों में हीरो चाहे कुछ भी करे दर्शकों का समर्थन और सहानुभुति हर वक़्त हीरो के पक्ष में होता है। मेरे अनुसार हीरो नेगेटिव भुमिका में भी ऐसा स्क्रिप्ट पर राज़ी होता है जिसमे उसका हीरो का इमेज हर वक़्त बरक़रार रहे। क्योंकि यही उसका अपने फैंस के साथ रिश्ता है। हर फिल्म के ज़रिये हीरो यह रिश्ता और मज़बूत करने का प्रयास करता है। यही रिश्ता उसका ब्रैंड और उसके बारे में फैंस का सोच उसका ब्रैंड इमेज है।
पिछले महीने मैंने इसी कॉलम में ब्रैंड को एक रिश्ता बताया था। रिश्ता चॉइस का। मजबूरी का नहीं। आज और अगले दो महीनो में मैं ब्रैंड्स के CDE के बारे में आपसे बातचीत करूँगा। Creation -Development -Engagement किसी भी ब्रैंड का तीन मूल प्रयास है। आज मैं आपसे Creation के विषय में बातचीत करूँगा।
पिछले महीने  मैंने अपने आपको एक ब्रैंड के हैसियत से सोचने के लिए अनुरोध किया था।  आपने अपने विषय में सोचा है ? क्या सोचा है आपने ? किसी भी ब्रैंड के लिए तीन सत्य का मूल्यांकन करना अति आवश्यक है :

  • अपने आपको एक ब्रैंड के हैसियत से आप क्या सोचते हैं से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि आपको जानने वाले आपके विषय में क्या सोचते हैं। 
  • मज़े वाली बात यह है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचेंगे यह सम्पूर्ण आप पर निर्भर करता है। 
  • अगर आप ब्रैंड को रिश्ता मानते है तो इस बात से आप जरूर सहमत होंगे कि रिश्ते बनाने में रिश्ता तोड़ने के वनिस्पत कहीं ज़्यादा समय और प्रयास लगता है। ब्रैंड बनने में बहुत समय लगता है , टूटने में कुछ नही। 
अपना ब्रैंड बनाने के लिए आप क्या -क्या कर सकते हैं ?
पहली बात - कोई भी ऐसा ब्रैंड नहीं है जो कि हर कोई को भाता है। हर ब्रैंड का एक अपना रिलेशनशिप सर्कल होता है। हर इंसान का तीन सर्कल होता है -प्राइमरी ,सेकेंडरी और टर्शियरी। अपने इर्द गिर्द लोगों पर गौर फरमाइए -परिवार , कुछ दोस्त, रिश्तेदार और कुछ लोग जिनके साथ आपका प्रोफेशनल रिश्ता है आपके प्राइमरी सर्कल के सदस्य हैं। सेकंडरी सर्कल में इसी तरह के वो लोग हैं जिनके साथ आप उतने करीब नहीं हैं। टर्शियरी में इस तरह के लोग आते हैं जिनसे आपको किसी कारण रिश्ता जोड़ना परता है। जैसे हमारी उम्र बढ़ती है इन सर्कल्स के लोग बदल जाते हैं। स्कूल से कॉलेज से नौकरी ;बचपन से युथ से शादी शुदा -ज़िन्दगी के साथ हमारे रिश्ते बदलते रहते हैं। आपके सफर में आप इस वक़्त किस मुकाम पर हैं ? -आपके रिलेशनशिप सर्कल में कौन किस जगह है ?याद रखिएगा दुनिया में वही ब्रैंड हुआ है जिसने अपने रिलेशनशिप सर्कल को सही समझा है और रिश्ता बनाने का सच्चा प्रयास किया है। आपका अपना I Next इसका एक बेहतरीन मिसाल है।
दूसरी बात - इस रिश्ते में मेरा क्या है ? कहा जाता है कि माता -पिता का अपने बच्चों के प्रति प्यार निःस्वार्थ होता है। इसके अलावा हर रिश्ते का कोई न कोई मकसद होता है। आपका खुद का ब्रैंड बनाने के लिए आप जिनसे रिश्ता बनाना चाहते हैं उनका इस रिश्ते से क्या फायदा है ? ब्रैंड बनाते वक़्त आपको अपने साथ उनके लिए भी सोचना पड़ेगा जिनके दिल में अपना जगह बनाना चाहते हैं। मैं आपके साथ एक रिश्ता बनाने का प्रयत्न कर रहा हूँ। आपको इससे क्या मिल रहा है ? मेरी चेष्टा है कि अपने ज़िन्दगी के तज़ुर्बे से मिले सीख आपके साथ शेयर करूँ जिससे आपको अपनी ज़िन्दगी के सफर में अधिक आनंद मिले। क्या मैंने कुछ सफलता पाया है ?इस समय आप सभी मेरे प्राइमरी सर्कल के सदस्य हैं। जिनको आप मेरे बारे में बताएँगे वो मेरे लिए सेकेंडरी सर्कल में हैं।
तीसरी बात -आपका अपने ब्रैंड का परिचय या आइडेंटिटी क्या होगा ? इस सफर में मुझे एक दिलचस्प व्यक्ति से मिलने का मौका मिला। उन्होंने अपना नाम Rav Kalsi बताया। भारतीय दिखने वाला यह व्यक्ति बचपन से विदेश का  निवासी है। मैं  Rav शब्द का अर्थ समझ नहीं पा रहा था। पूछने पर उन्होंने हसते हुए मुझे समझाया -उनका नाम रविन्द्र है जो कि Rav बना दिया है उन्होंने। मैंने मज़ाक में उनको धन्यवाद कहा मेरी गलतफैमी दूर करने के लिए -मैं तो Rav को रावण का शोर्ट फॉर्म समझ रहा था!आपने लोगों को अपने बच्चों का नाम राम या लक्ष्मण रखते हुए सुना होगा ;रावण , कभी नहीं। यही राम और रावण के ब्रैंड का फर्क है। क्या आपको अपने नाम पर गर्व है ?
मैंने आपके साथ अपने प्रथम मुलाकात में इस बात की चर्चा की थी कि हम सबका नाम , उम्र इत्यादि हमारी पहचान है -हम नहीं। हम कैसे इंसान हैं हमारे नाम से नहीं कर्म से जाने जाते हैं। खुद को समझना और अपनी काबिलियत को ध्यान में रखते हुए अपने ब्रैंड आइडेंटिटी को निर्धारण करना एक बुद्धिमान इंसान की निशानी है। अक्सर लोग कौआ होकर हंस कि चाल चलने की कोशिश में व्यर्थ होते हैं। आपकी सफलता आप बनके रहने में ही है। हर इंसान का एक इंडिविजुअलिटी है -वही उसका ब्रैंड आइडेंटिटी निर्धारित करता है। एक उदाहरण -
राहुल द्रविड़ ने वीरेंद्र सेहवाग के साथ कई बड़ी साझेदारियां निभाई। पाकिस्तान में एक टेस्ट मैच में दोनों ने पहले विकेट के लिए एक बार ४०० से अधिक रनों की एक यादगार साझेदारी निभायी थी। मैच के अंत में राहुल ने संवादिको को एक बहुमुल्य बात कही -"मैं सेहवाग नहीं हूँ ;ना ही  उसके तरह उतनी जल्दी रन बनाने की क्षमता मुझमे है। दूसरी छोर पर खड़े होकर मैंने एक हाइलाइट्स का आनंद उठाया और अपनी काबिलियत के अनुसार बल्लेबाज़ी की-केवल  सेहवाग को ज़्यादा गेंदों का सामना करने का मौका दिया। "
कभी खुद को बेहतर समझने के लिए किसी दूसरे का सहायता लेना पर सकता है। ऐसे व्यक्ति से सहायता लीजिये जो कि निःस्वार्थ आपकी सहायता करे। अपने प्राइमरी सर्कल का चयन सावधानी से कीजिये। क्योंकि  अंग्रेज़ी में एक कहावत है - A man is known by the company he keeps . हर इंसान 'अपने जैसों 'का संगत अधिक पसंद करता है।
चौथी बात -आपका ब्रैंड क्या वादा करता है ?इसे हम ब्रैंड प्रॉमिस कहते हैं। जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा। जैसे -जैसे आपका ब्रैंड बनता जाएगा , लोग आपसे उम्मीद करने लगेंगे। कपिल शर्मा टीवी पे दिखे या दोस्तों के बीच हो -हर वक़्त सब यही उम्मीद करते हैं कि वह लोगों को हसायेगा। मेरा नाम जोकर फ्लिम के ज़रिये राज कपूर ने जोकर के व्यक्तिगत जीवन के परिहास को वाकायदा दर्शाया है। आप अपने मित्रों में कुछ पर औरो कि तुलना में अधिक भरोसा करते होंगे। क्यों ? जिन पर आपका विश्वास ज़्यादा है ,उसने अपना  ब्रैंड प्रॉमिस अर्जन किया है अपने कर्तव्य से। आप किस प्रॉमिस के लिए जाने जायेंगे ?तय कीजिये। इस निर्णय के बिना आपका खुद का ब्रैंड बन नहीं सकता।
पाँचवी बात -"One never gets a second chance to create the first impression ."मेरे एक विदेशी बॉस ने मुझे यह बात १९९२ के शुरुआत में बताई थी। जितने रिलेशनशिप्स सफलता पूर्वक बनते उतना ही ब्रैंड मजबूत बनता है। इस सफर कई अनजान साथी बनेंगे ;कितने साथी साथ छोड़ देंगे। किसी के साथ आपका पहला इम्प्रेशन दो चीज़ों पर निर्भर करता है -आपका ग्रूमिंग और आपका कम्युनिकेशन। ग्रूमिंग केवल आपका वेश भुषा ही नहीं है -आपके बाल , पर्सोनल हाइजीन ,खड़े होने का स्टाइल -सब कुछ ग्रूमिंग का एक अभिन्न अंग है। गोविंदा का ग्रूमिंग अनिल कपुर से भिन्न है। उतने रंग -बिरंगी कपड़ो के बिना हम गोविंदा को सोच ही नहीं सकते हैं -हम उनके उसी रूप को सराहते हैं। क्या हम और आप उतने रंगीन हैं ?
कम्युनिकेशन ज़िंदगी का एक अति महत्वपूर्ण स्किल है। भाषा पर दखल ही केवल एक इफेक्टिव कम्यूनिकेटर नहीं बनाता है। हम भविष्य में कभी आपके साथ इस विषय पर विस्तृत चर्चा करेंगे। फिलहाल इतना बताना ज़रूरी है कि आप जो बोलते हैं वह महत्वपूर्ण है ;उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि आप किस तरह से बोल रहे हैं। अनुपयुक्त कम्युनिकेशन रिश्ते टूटने का  सर्वाधिक कारण माना जाता है। अगर ब्रैंड रिश्ता बनाना है तो कम्युनिकेशन को आप कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। स्वामी विवेकानंद के शिकागो लेक्चर को  कम्युनिकेशन का एक उत्कृष्ट  उदाहरण माना जाता है जिसके जरिये उन्होंने विश्व के अन्य देशों के निवासियों को अपना बना लिया था। यही रिश्ता बनाना ब्रैंडिंग का मूल मंत्र है। आप अपने आप को कम्युनिकेशन  स्किल पर कितना प्रतिशत मार्क्स देंगे ?
आज यहीं समाप्त करते हैं। हर त्योहार का अपना ब्रैंड है। ईस्टर क्रिसमस से अलग है जैसे मुहर्रम ईद से। दशहरा अच्छे का बुरे पर जीत की ख़ुशी है तो दीपावली घर वापस आने की ख़ुशी। आपको आगाम शुभकामनायें। आनंद लीजिये संभल कर-यह आपके ब्रैंड से आपके प्राइमरी सर्कल के सदस्यों की चाहत होगी। वादा कीजिये कि एक बार आपने कमिटमेंट कर दी तो आप … .....


गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

नमस्कार।  शॉपिंग किया आपने -आने वाले फेस्टिव समय के लिए ? क्या खरीदेंगे इस बार ?कितने ब्रैंड्स के चॉइस है हम सबके पास। इस ज़माने में हर इंसान सर से पैर तक अपने आप को ब्रैंड्स के ज़रिये सजाता है।

क्या ब्रैंड्स में आपकी दिलचस्पी है ?मेरे लिए ब्रैंड्स का अध्यन एक महत्वपूर्ण विषय है जो कि मुझे हर वक़्त चैलेंज करता है। मैंने सोचा कि आज आपके साथ ब्रैंड्स के विषय में थोड़ा चर्चा करूँ।

आप में कई लोगों ने ब्रैंड के बारे में पढ़ा होगा और आप उनके डेफिनिशन से वाकिफ होंगे। किसी भी ब्रैंड का एक नाम होता है ; परिचय होता है और किसी भी ब्रैंड से  उनके विषय में जानने वाले लोगों का एक एक्सपेक्टेशन या उम्मीद होता है। जब तक ब्रैंड इस उम्मीद पर खरा उतरता है तब तक उसकी चाहत बरक़रार रहती है अन्यथा लोग उस ब्रैंड का साथ छोड़ देते है।

अगर आप थोड़ा सा और सोचें तो ब्रैंड एक रिलेशनशिप या रिश्ता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रिश्ता एक चॉइस का रिश्ता है। अच्छा लगना और पसंद करना या नापसंद करना दोनों चॉइस का रिश्ता है। इसी कारण केवल सबसे सस्ता ब्रैंड ही केवल नहीं बिकता है। उदाहरण स्वरुप आप मोबाइल हैण्डसेट के ब्रैंड्स को देखिये।  कुछ हज़ार रुपयों से लेकर लाख  रुपये से ऊपर का भी मोबाइल हैंडसेट्स मार्केट में उपलब्ध हैं।

आप अपने हिंदी सिनेमा के कलाकारों को देखिये। हर कलाकार की एक पहचान या आइडेंटिटी या पर्सनालिटी है। हमारी उम्मीदें उनसे उनके इस पर्सनालिटी पर निर्भर करता है। दीपिका से हमारी उम्मीद विद्या से अलग है जैसे कि सलमान का अनुपम  से। कुछ ब्रैंड पर्सनालिटीज सिमिलर हो सकते हैं ; सेम नहीं। इसी कारण जो कलाकार अलग -अलग किरदार निभा सकता है उतना ही उसे वर्सटाइल माना जाता है।

अगर आप देवी -देवताओं को देख़ो तो शिव जी गणेश जी से कहीं अलग है। उनके भक्त भी अलग हैं।  भक्तों का करैक्टर भी सिमिलर होता है।

कभी आपने ये महसूस किया है कि आप भी एक ब्रैंड हेँ ? आपका नाम है ;परिचय है ; लोगों के साथ रिश्ता है -वो सब कुछ है आप में जो कि किसी भी ब्रैंड में है ! आप अपने ब्रैंड को डेवेलप करने के लिए क्या कर रहें हैं ? आप में से कुछ ये सोच रहे होंगे कि जिन ब्रैंड्स का ज़िक्र मैंने किया है, सब फेमस या प्रसिद्ध ब्रैंड्स हैं। आप सक्सेस या सफलता को प्रसिद्धता से कंफ्यूज मत कीजिये।  प्रसिद्ध का तात्पर्य होता है कि अधिक लोगों ने उनके बारे में सुना है। गलत काम के लिए भी तो इंसान प्रसिद्ध बन जाता है। क्या ऐसे ब्रैंड से आप रिश्ता जोड़ना चाहोगे ?

आप में क्या है जो औरों में नहीं ?यही आपका 'ब्रैंड आइडेंटिटी ' या परिचय बन सकता है। "नेवर अंडर एस्टीमेट द पॉवर ऑफ़ द कॉमन मैन " !हम सब कॉमन होते हुए भी कैसे अन कॉमन बन सकते हैं? यही अपने खुद के ब्रैंड को आगे बढ़ाने का मंत्र है। जानना चाहते हैं ?अगले महीने के प्रथम दिन फिर आपसे मुलाकात होगी। तब इस संधर्व में हम आलोचना करेंगे.

तब तक खुश रहिए। नवरात्री, दुर्गा पूजा और दशेहरा की अग्रिम शुभकामनाएं आपको और आपके अपनों को। दिवाली से पहले फिर मिलेंगे।