बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

नमस्कार। त्योहारों का मौसम आ चुका है। आप सभी को धनतेरस और दिवाली के लिए अग्रिम शुभकामनाएं। उम्मीद करता हूँ कि नवरात्रि और दशहरा आपके लिए मंगलमय रहा है। हम इन त्योहारों के समय अक्सर लोगों में नए कपड़े बांटते हैं ताकि हर कोई त्यौहार में शामिल हो सके। यह हमारे उन लोगों के प्रति दया प्रदर्शन करने का तरीका है जिनका आर्थिक अवस्था शायद उतना अच्छा नहीं है।  आज का लेख इस दयालुता के विषय में है।  

13 नवंबर विश्व दयालुता दिवस (World Kindness Day) के हैसियत से मनाया जाता है।  

मन में एक सहज सा सवाल उठता है। आखिर संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संगठनों को साल में एक दिन को 'दयालुता' के नाम पर ब्रांड करने की जरूरत क्यों पड़ी? 

इतिहास के पन्नों को देखें तो 1998 में वर्ल्ड काइंडनेस मूवमेंट की शुरुआत के बाद इस दिन को मनाने की परंपरा बनी, ताकि दुनिया भर के लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा ठहरकर समाज में सकारात्मकता और इंसानियत के धागों को देख सकें। लेकिन एक गहरे नजरिए से सोचें, तो क्या दयालुता जैसी बुनियादी मानवीय भावना को किसी एक तारीख के दायरे में बांधा जा सकता है? दयालुता कोई त्योहार नहीं है जिसे साल में एक बार मनाकर हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएं। यह तो हमारे भीतर बहने वाली एक निरंतर नदी है, जो अगर सूख जाए तो इंसानियत मरुस्थल बन जाएगी।

मनोविज्ञान और इंसानी व्यवहार का एक बेहद सीधा नियम है—हम में से कोई भी यह नहीं चाहता कि दूसरे हमारे साथ रूखा व्यवहार करें। जब हम किसी दुकान पर जाते हैं, तो उम्मीद करते हैं कि दुकानदार हमसे तमीज से बात करे। जब हम दफ्तर में होते हैं, तो चाहते हैं कि सहकर्मी हमारी बात को ध्यान से सुनें। यदि हर इंसान दूसरों से दया, करुणा और सम्मान की उम्मीद रखता है, तो यह कितनी अजीब बात है कि वही इंसान दूसरों के प्रति, या बेजुबान जानवरों के प्रति दयालु होना भूल जाता है। हम जो समाज को देते हैं, वही घूम-फिरकर हमारे पास वापस आता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे चारों तरफ मिठास हो, तो उसकी शुरुआत हमें खुद से ही करनी होगी।

दरअसल, दयालुता का सीधा संबंध हमारी भावनात्मक समझ  यानि Emotional Intelligence से है। जब तक हम सामने वाले की स्थिति, उसकी पीड़ा या उसकी खुशी को महसूस नहीं कर पाते, तब तक हम उसके प्रति दयालु नहीं हो सकते। आज की इस जटिल और तनावभरी दुनिया में केवल तार्किक होना काफी नहीं है। अगर हम भावनाओं को समझदारी से इस्तेमाल करना नहीं सीखेंगे, तो जीवन की राह पर चलना बेहद मुश्किल हो जाएगा। किसी नाराज व्यक्ति पर चिल्लाने के बजाय उसकी परेशानी को समझना और शांत रहना भी दयालुता का ही एक रूप है, जिसे हम भावनात्मक बुद्धिमत्ता कहते हैं।

कहते हैं कि परोपकार और भलाई की शुरुआत हमेशा अपने घर से होती है (Kindness, like charity, begins at home)। अक्सर हम बाहर की दुनिया में बहुत भले और विनम्र बने रहते हैं, लेकिन घर लौटते ही छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाते हैं। हमें खुद से पूछना चाहिए—क्या हम अपने माता-पिता, जीवनसाथी या बच्चों के साथ उतने ही दयालु हैं जितने बाहरी लोगों के साथ होते हैं? क्या हम उस बुजुर्ग मां की बात को धैर्य से सुनते हैं, जो दिन भर हमारा इंतजार करती है?

घर के बाद बारी आती है उन लोगों की जो हमारी जिंदगी को आसान बनाते हैं। हमारे घर में झाड़ू-पोछा करने वाली दीदी, सुबह अखबार या दूध देने वाला लड़का, या सोसाइटी का वो गार्ड जो रात भर जागकर हमारी सुरक्षा करता है। क्या हम कभी उनके प्रति दयालु होते हैं? कभी-कभार उनसे प्यार से उनका हालचाल पूछ लेना, या चिलचिलाती धूप में उन्हें एक गिलास ठंडा पानी दे देना—यही तो सच्ची दयालुता है। इसके लिए किसी बड़े मंच या बड़े दान की जरूरत नहीं होती। हमारे दैनिक जीवन के छोटे-छोटे संवाद ही हमारी संवेदनशीलता को तय करते हैं।

बिना दयालुता के यह जीवन बेहद नीरस, कठिन और नीरस हो जाता है। आप चाहे जितनी भी सुख-सुविधाएं जुटा लें, जितनी बड़ी गाड़ियां खरीद लें, अगर आपके पास किसी के दर्द को देखकर पिघलने वाला दिल नहीं है, तो जीवन का आनंद अधूरा है। दयालुता का कोई विकल्प नहीं है। यह जीवन को न केवल जीने योग्य बनाती है, बल्कि इसे बेहद खूबसूरत और आनंदमयी भी बनाती है। 

आप सभी को आनंदमय और सुरक्षित दीवाली की शुभकामनायें। 

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